अयोध्या: अयोध्या में पापमोचन शिलालेख पुनः प्रतिष्ठित: इतिहास की पुनरावृत्ति और संरक्षण की चेतावनी।

लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 

अयोध्या में पापमोचन शिलालेख पुनः प्रतिष्ठित: इतिहास की पुनरावृत्ति और संरक्षण की चेतावनी

अयोध्या की पवित्र धरा पर भगवान् पापमोचन का पुरातात्त्विक शिलालेख पुनः अपने मूल स्थान पर प्रतिष्ठित हो गया है। यह केवल एक पत्थर की वापसी नहीं, बल्कि अयोध्या की ऐतिहासिक स्मृति की पुनर्प्राप्ति है।

 शिलालेखों का उद्भव और महत्व

सन 1902 में अयोध्या धाम के पौराणिक स्थलों की पहचान और संरक्षण हेतु तत्कालीन ब्रिटिश जिलाधिकारी ने “एडवर्ड अयोध्या तीर्थ विवेचनी सभा” का गठन किया था। बिन्दुगद्दी पीठ के प्रयासों से 148 शिलालेख स्थापित हुए। इन शिलालेखों ने न केवल अयोध्या की तीर्थ-परम्परा को प्रमाणित किया बल्कि समय बीतने के साथ ये पुरातत्त्व के अमूल्य साक्ष्य बन गए।


 उपेक्षा और विडम्बना

दुर्भाग्य से स्वतंत्र भारत में इन शिलालेखों को वह संरक्षण नहीं मिला जिसकी वे अपेक्षा रखते थे। अनेक शिलालेख या तो नष्ट हुए या विस्थापित कर दिए गए। हाल ही में 77वाँ शिलालेख, जो भगवान् पापमोचन से सम्बद्ध है, सुंदरीकरण योजना के अंतर्गत अपने स्थान से हटा दिया गया।

 सामाजिक और धार्मिक पहल

महन्त मैथिली रमण शरण जी तथा महन्त रामदास जी ने इस विस्थापन का संज्ञान लेकर स्थानीय प्रशासन को सक्रिय किया। परिणामस्वरूप, प्रशासन की तत्परता से यह शिलालेख पुनः अपने स्थान पर स्थापित हुआ। यह घटना न केवल श्रद्धालुओं के लिए संतोष का विषय है, बल्कि इस तथ्य का भी प्रमाण है कि समाज और प्रशासन मिलकर इतिहास की रक्षा कर सकते हैं।


 संरक्षण की चुनौती

आज जब अयोध्या अभूतपूर्व विकास की ओर अग्रसर है, यह प्रश्न और प्रासंगिक हो जाता है कि कहीं यह उत्थान अयोध्या के मूल स्वरूप को विस्थापित न कर दे।

विष्णुहरि का पत्थर कहाँ है?

शतबलि का शिलालेख पार्किंग की भेंट चढ़ जाएगा या संरक्षित होगा?

 लुप्त और खंडित शिलालेखों की सुधि कौन लेगा?

ये प्रश्न केवल प्रशासन के लिए नहीं, बल्कि प्रत्येक अयोध्यावासी के लिए भी विचारणीय हैं।


 ऐतिहासिक संदर्भ

ब्रह्मचारी गुरुजी ने शिलालेखों की आधारभूत सूची तैयार की थी। आचार्य रामदेवदास शास्त्री ने उस पर आधारित ग्रन्थ लिखे। गीताप्रेस ने रुद्रयामल और स्कन्दपुराण के अयोध्या माहात्म्य का अनुवाद प्रकाशित करते समय उस सूची को भी प्रकाशित किया। यह सूची आज भी अयोध्यावासियों के लिए मार्गदर्शक है।

एक सामाजिक धर्म

शिलालेख मात्र पत्थर नहीं, वे पौराणिक मानचित्र के संकेतक हैं। उनका स्थान परिवर्तन अयोध्या की आत्मा के साथ अन्याय है। संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं; यह प्रत्येक अयोध्यावासी का धर्म है।

अतः आवश्यक है कि—

 पार्षद, ग्राम प्रधान और चौकी इंचार्ज अपने क्षेत्र के शिलालेखों और तीर्थों की पहचान करें।

स्थानीय समाज इन्हें “सजावटी वस्तु” न मानकर इतिहास के जीवित दस्तावेज समझे।

एक सामूहिक जन-अभियान चलाकर अयोध्या के मूल स्वरूप को सुरक्षित रखा जाए।

भगवान् पापमोचन का शिलालेख पुनः प्रतिष्ठित होना इसी दिशा में एक शुभ संकेत है। इसके लिए सभी साधक, महन्तगण और जिला प्रशासन साधुवाद के पात्र हैं। यह घटना हमें स्मरण कराती है कि अयोध्या को बचाना है तो अयोध्यावासियों को स्वयं आगे आना होगा।