लखनऊ: क्षत्रिय पत्रकार सम्मेलन: जातीय गोलबंदी या आंतरिक सुधार?
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
क्षत्रिय पत्रकार सम्मेलन: जातीय गोलबंदी या आंतरिक सुधार?उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद क्षत्रिय राजनीति को नया उठान मिला है। हाल ही में क्षत्रिय विधायकों की बैठकों के बाद अब लखनऊ में क्षत्रिय पत्रकारों का सम्मेलन आयोजित हो रहा है, जिसमें देश के कई वरिष्ठ पत्रकार शामिल होंगे। यह आयोजन मात्र एक सामूहिक जुटान नहीं, बल्कि भारत की राजनीति, समाज और मनोविज्ञान में जातीय पहचान के बदलते आयामों की ओर संकेत करता है।
राजनीतिक दृष्टिकोण
भारत की राजनीति का आधार हमेशा से जाति और धर्म रहा है। नेता इन पहचानों के सहारे ही वोटबैंक तैयार करते हैं और सत्ता में बने रहते हैं। ऐसे में यदि कोई जातीय समूह स्वयं का आत्मनिरीक्षण करता है और आंतरिक सुधार की दिशा में सोचता है तो इसे एक सकारात्मक गोलबंदी कहा जा सकता है। लेकिन खतरा यह भी है कि यह गोलबंदी धीरे-धीरे सत्ता-प्राप्ति का हथियार न बन जाए। अगर यह सम्मेलन शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुधार पर केंद्रित रहता है तो यह राजनीति में एक नई तरह का योगदान देगा, लेकिन यदि यह केवल राजनीतिक दावेदारी को मजबूत करने का मंच बनता है, तो यह वही पुरानी जातिवादी राजनीति होगी जिसे खत्म करने की जरूरत है।
सामाजिक दृष्टिकोण
भारतीय समाज में जाति अभी भी एक कठोर वास्तविकता है। क्षत्रिय समाज में भी पारंपरिक गौरव और सामंतवादी सोच गहरी है। इस सम्मेलन की अहमियत तब है जब पढ़ा-लिखा वर्ग आगे बढ़कर समाज को नशे, अपराध, दहेज और बाल विवाह जैसी बुराइयों से मुक्त करने का संकल्प ले। बेटियों को शिक्षा और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ाने की सोच वास्तव में सामाजिक सुधार का एजेंडा है। यही दिशा समाज को प्रगतिशील बनाएगी और जातीयता के विष को धीरे-धीरे कम करेगी।
पारिवारिक दृष्टिकोण
आज के क्षत्रिय परिवार जिस सबसे बड़ी चुनौती से जूझ रहे हैं, वह है बेरोजगारी और नशे की प्रवृत्ति। युवाओं का अपराधीकरण और पारिवारिक टूटन इन्हीं कारणों से हो रहा है। सम्मेलन अगर इस पर चर्चा करके परिवारों को मजबूत बनाने के उपाय सुझाता है तो इसका लाभ आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचेगा। पारिवारिक ढांचे में स्त्रियों की शिक्षा और आत्मनिर्भरता पर बल देना ही समाज के भीतर स्थायी परिवर्तन ला सकता है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण
जातीय गोलबंदी की सबसे बड़ी समस्या है "हम बनाम वे" की मानसिकता। जब कोई जाति या समुदाय केवल अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए संगठित होता है तो यह मनोवैज्ञानिक असुरक्षा और आक्रामकता को जन्म देता है। इतिहास में क्षत्रियों के आपसी द्वंद्व ने यही दिखाया है कि सबसे बड़ा शत्रु वही रहा है जो अपने ही समाज का हिस्सा था। इस आक्रामक प्रवृत्ति को खत्म कर यदि आत्मविश्वास, सहयोग और सकारात्मक आत्मचिंतन की भावना लाई जाए तो यह सम्मेलन मनोवैज्ञानिक रूप से भी एक हीलिंग प्रोसेस साबित हो सकता है।
लखनऊ का क्षत्रिय पत्रकार सम्मेलन केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक परीक्षण की घड़ी है। क्या यह सम्मेलन आंतरिक सुधार और सकारात्मक ऊर्जा का मंच बनेगा, या फिर यह राजनीति की जातीय बिसात पर सिर्फ एक और चाल सिद्ध होगा? यह तय करेगा कि क्षत्रिय समाज भारत के लोकतांत्रिक विकास में रचनात्मक भूमिका निभाता है या फिर वही पुरानी जातिवादी खाईयों को और गहरा करता है।