बच्चों में बढ़ती हिंसा: एक सामाजिक, पारिवारिक और राजनीतिक चेतावनी।
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
बच्चों में बढ़ती हिंसा: एक सामाजिक, पारिवारिक और राजनीतिक चेतावनीबीते कुछ दिनों में गुजरात, उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड से आई तीन भयावह घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया है। स्कूलों में हुई इन वारदातों में छात्रों ने अपने ही सहपाठी की हत्या कर दी या शिक्षक पर गोली चला दी। यह घटनाएँ केवल आपराधिक मामले नहीं हैं, बल्कि हमारे समाज, परिवार, शिक्षा-व्यवस्था और राजनीति के लिए गहरी चेतावनी हैं।
1. राजनीतिक परिप्रेक्ष्य: कानून, नीतियाँ और सत्ता का रवैया
इन घटनाओं का एक बड़ा आयाम यह है कि राज्य और केंद्र की सरकारें शिक्षा को किस नज़र से देखती हैं।
विद्यालयों में सुरक्षा और काउंसलिंग की प्रणाली लगभग न के बराबर है। जब स्कूलों को केवल परीक्षा परिणाम और बोर्ड की रैंकिंग तक सीमित कर दिया जाए, तब बच्चों की भावनात्मक और मानसिक ज़रूरतों की उपेक्षा हो जाती है।
राजनीतिक दलों के लिए शिक्षा कभी चुनावी मुद्दा नहीं रही। वे छात्रों को बेहतर नागरिक बनाने की बजाय भीड़ जुटाने, रैलियों और जुलूसों में उपयोग करने पर ज्यादा ध्यान देते हैं।
जब सत्तारूढ़ दल धार्मिक या राजनीतिक आयोजनों में नाबालिगों को खुली छूट देते हैं और हिंसात्मक व्यवहार को "जुनून" या "शौर्य" कहकर महिमामंडित करते हैं, तो बच्चों में यह संदेश जाता है कि आक्रामकता ही सामाजिक स्वीकृति का माध्यम है।
यहाँ प्रश्न उठता है कि क्या हमारे जनप्रतिनिधि अपने भविष्य यानी बच्चों की सुरक्षा और मानसिक विकास के प्रति ईमानदार हैं, या केवल उन्हें अपने राजनीतिक एजेंडे का ईंधन बनाए रखना चाहते हैं?
2. सामाजिक परिप्रेक्ष्य: हिंसा का सामान्यीकरण
समाज में हिंसा अब असामान्य नहीं रही, बल्कि वह मनोरंजन और सामूहिक व्यवहार का हिस्सा बन चुकी है।
टीवी, ओटीटी और सोशल मीडिया पर हिंसा को ग्लैमराइज़ किया जाता है। बच्चे इसे देखकर हिंसा को "सामान्य" मान लेते हैं।
क्रिकेट मैच से लेकर धार्मिक जुलूस तक में झगड़े और मारपीट की घटनाएँ अब "रोज़मर्रा" की बात हो गई हैं।
जब समाज खुद हिंसक भाषा, नफ़रत और ध्रुवीकरण पर ताली बजाता है, तो बच्चे वही सीखते हैं।
सवाल यह है कि हम बच्चों को किस समाज का हिस्सा बना रहे हैं—एक ऐसा समाज जहाँ तर्क और संवाद की जगह केवल चाकू और बंदूक बोलते हैं?
3. पारिवारिक परिप्रेक्ष्य: टूटते रिश्ते और संवादहीनता
घर, जो बच्चों का पहला विद्यालय होता है, आज संवादहीन होता जा रहा है।
माता-पिता की व्यस्तता, आर्थिक दबाव और अलगाव ने बच्चों को अकेला कर दिया है।
पहले जहाँ परिवार में बड़े-बुजुर्ग बच्चों के मार्गदर्शक होते थे, वहीं अब न्यूक्लियर परिवारों में बच्चों के लिए रोल मॉडल सिर्फ मोबाइल और टीवी बन गए हैं।
जब बच्चों की भावनाओं पर ध्यान नहीं दिया जाता, तो वे निराशा और गुस्से को हिंसा में व्यक्त करते हैं।
इस दृष्टि से यह प्रश्न उठाना ज़रूरी है कि क्या हम केवल बच्चों की भौतिक ज़रूरतें पूरी कर रहे हैं या उनके मनोवैज्ञानिक विकास के लिए भी समय और सहारा दे रहे हैं?
4. मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य: किशोरावस्था, दबाव और डिजिटल प्रभाव
किशोरावस्था संवेदनशील दौर होता है, जहाँ ऊर्जा और भावनाएँ असंतुलित रहती हैं।
सोशल मीडिया के "चैलेंज" और "ट्रेंड" बच्चों में तत्काल प्रतिक्रिया और आक्रामकता को बढ़ावा देते हैं।
स्कूलों में काउंसलिंग की कमी, मानसिक स्वास्थ्य पर चर्चा का अभाव और अनुशासन को केवल "डंडे" से लागू करना बच्चों को और विद्रोही बना देता है।
कई बार शिक्षक और अभिभावक भी अपमानजनक भाषा या व्यवहार से बच्चों को और आक्रामक बना देते हैं।
यहां सबसे बड़ा खतरा यह है कि बच्चा अपने अहं या अपमान को "जीवन-मरण" का सवाल मान लेता है और हथियार उठाने में देर नहीं करता।
हमें किस ओर जाना है?
ये घटनाएँ केवल पुलिस या न्यायालय की समस्या नहीं हैं। यह परिवार, समाज और राजनीति की संयुक्त विफलता है।
सरकार को शिक्षा में भावनात्मक परामर्श (काउंसलिंग), स्कूलों में कड़े सुरक्षा प्रावधान और हिंसात्मक कंटेंट पर सख्त सेंसरशिप लागू करनी होगी।
समाज को बच्चों के लिए संवाद और सह-अस्तित्व की संस्कृति बनानी होगी।
परिवार को बच्चों के साथ समय बिताने और उन्हें केवल "अच्छे अंक" से नहीं, बल्कि "अच्छा इंसान" बनाने की जिम्मेदारी उठानी होगी।
और सबसे बढ़कर, हमें यह तय करना होगा कि हम अगली पीढ़ी को कैसा भारत देना चाहते हैं—हिंसा का या सह-अस्तित्व का।