अयोध्या: संवैधानिक संकल्पना और वास्तविकता के बीच।
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
अयोध्या: संवैधानिक संकल्पना और वास्तविकता के बीच1. आधारभूत संरचना की विफलता
राम पथ और आसपास की सड़कें
रामपथ, जो राम मंदिर प्रांगण तक जाने वाला प्रमुख मार्ग है, बारिश के दौरान कई स्थानों पर धंस गया और वहां जलभराव हुआ। यह स्थिति स्पष्ट रूप से जल्दबाजी में किए गए अधूरे निर्माण और कमजोर योजना का परिणाम था। कई अधिकारियों को इस त्रुटि के लिए निलंबित भी किया गया था।
रेलवे स्टेशन और आसपास का पानी में डूबना
अयोध्या धाम रेलवे स्टेशन के पास जलभराव की घटनाएँ दर्ज की गईं। हालांकि कुछ सोशल मीडिया आरोपों को रेलवे और PIB ने स्पष्ट कर दिया कि गिरा हुआ बाउंड्री वॉल पुराने स्टेशन का था, और इसकी वजह निजी निर्माण व जलभराव था— नए स्टेशन की अबाधित संरचना।
राम मंदिर में पानी का रिसाव
अयोध्या मंदिर के “मंडप” में बारिश के दौरान पानी टपकने की घटनाएँ हुईं। अधिकारियों ने इसे अधूरे निर्माण कार्य का पक्ष लेकर समझाया, लेकिन इसका संकेत स्पष्ट है कि जब आस्था की ऐसे मंदिरों में यह त्रुटियाँ हो सकती हैं, तो अन्य बुनियादी ढांचे की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
2. स्वास्थ्य सेवाओं में त्रासदी: संवैधानिक अधिकारों पर आघात
अस्पताल में बेड और ऑक्सीजन की कमी
हाल ही में अयोध्या के एक सरकारी अस्पताल में एक 12 वर्षीय बालक को उपलब्ध बेड और ऑक्सीजन की कमी के चलते भर्ती नहीं किया गया, और इलाज न मिलने पर उसकी मृत्यु हो गई—यह घटना संवैधानिक अधिकारों की अवहेलना का दुखद उदाहरण है।
न्यायालय और संविधान स्पष्ट रूप से जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) को केवल अस्तित्व तक सीमित नहीं रखता, बल्कि “सम्मानजनक जीवन” और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता को भी शामिल करता है।
भविष्य की तैयारी और आधिकारिक प्रयास
राजर्षि दशरथ मेडिकल कॉलेज में एक 110-बेड का ट्रॉमा सेंटर मई 2025 तक पूरा होने का लक्ष्य लेकर बनाया जा रहा है, जिसमें 60-बेड का इमरजेंसी विभाग शामिल होगा। यह कदम स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है।
अलावा में, जिला अस्पताल में वर्तमान में 152 में से कई बेडों पर ऑक्सीजन पहुँचाने की तैयारी चल रही है—यह एक सुधारात्मक पहल लेकिन संजीदा दूरी बताती है।
3. पर्यावरण और दीर्घकालिक योजनाएँ
तिलोदकी गंगा का पुनरुद्धार योजना
पर्यावरण संरक्षण और जल समस्या को ध्यान में रखते हुए, यूपी सरकार ने तिलोदकी गंगा नदी को पुनर्जीवित करने की पहल आरंभ की है। इसके तहत 7 किमी की प्रथम चरण की सफाई और बाद में वृक्षारोपण की योजनाएं शामिल हैं। यह एक स्थायी पहल है, लेकिन समयनिष्ठ अमल अभी बाकी है।
‘आस्था पथ’ का निर्माण
भक्तों और पर्यटकों की सुविधा के लिए अयोध्या में 225-मीटर लंबे “आस्था पथ” का निर्माण हो रहा है, जिसमें आधुनिक ड्रेनेज सिस्टम, पानी की आपूर्ति, सड़क, स्ट्रीट लाइटिंग आदि शामिल हैं—जो कि मौसमी चुनौतियों से निपटने के लिए महत्त्वपूर्ण है। यह परियोजना अगस्त 2025 तक पूरी होने की योजना है।
अन्ततः
अयोध्या—एक धर्म और आस्था का प्रतीक—वास्तव में संवैधानिक मूल्यों का परीक्षण स्थल भी बन गया है। जहाँ एक ओर मंदिर-संबंधी और पवित्र आधारभूत संरचना तेज़ी से विकसित हो रही है, वहीं जनता के मूलभूत अधिकार—स्वास्थ्य, संरचना की गुणवत्ता, आवागमन की सुविधा, और जीवन की सुरक्षा—प्रशासनिक प्राथमिकताओं की आखिरी सूची में नजर आते हैं।
संविधान सरकार को मात्र धार्मिक प्रतीकों की सेवा का अधिकार नहीं देता, बल्कि यह उसे कल्याणकारी राज्य के रूप में कर्तव्यशाली बनाता है। सरकार को अब सिर्फ प्रेरक संस्कार नहीं, बल्कि संविधानिक जवाबदेही का दायरा स्पष्ट करना होगा:
स्वास्थ्य में सुधार : ट्रॉमा सेंटर का तत्काल पूरा होना और अस्पतालों में बिस्तर व ऑक्सीजन की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करना।
ढांचागत मजबूती : बारिश और मौसम के अनुसार बुनियादी ढांचे को डिज़ाइन करना, और स्पष्ट रूप से लंबी–अवधि की योजना बनाना।
पारदर्शिता और जवाबदेही : असफलताओं पर जिम्मेदार अधिकारियों को जवाबदेह बनाना और सुधार प्रक्रिया को जनता के सामने लाना।
पर्यावरण–आधारित योजनाएं : ग्रामीन जल स्रोतों और नदी तंत्र को पुनः जीवंत करना, ताकि प्राकृतिक आपदाओं से निपटा जा सके।
यह केवल एक वादों की बात नहीं है; यह लोकतंत्र की गहराई और शासन की नींव का सवाल है। जनता का विश्वास केवल जयकारों में पनपता नहीं, सच्ची संवैधानिक प्रतिबद्धता में समाया होता है।