उपराष्ट्रपति चुनाव और गिरती हुई शालीनता

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 

उपराष्ट्रपति चुनाव और गिरती हुई शालीनता

भारतीय लोकतंत्र में उपराष्ट्रपति का पद सदैव शालीनता, गरिमा और राजनीतिक दलदल से परे रहने का प्रतीक माना जाता रहा है। राष्ट्रपति चुनावों में राजनीतिक दांव-पेंच स्वाभाविक माने जाते हैं, लेकिन उपराष्ट्रपति का चुनाव और उनका कार्यकाल अपेक्षाकृत विवादों से रहित रहा है। किंतु मोदी सरकार के 11 वर्षों में यह परंपरा भी टूटती दिखाई दे रही है।

पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का अचानक इस्तीफ़ा और उसके बाद का रहस्य लोकतंत्र की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। राज्यसभा, जहां वे आसंदी पर बैठते थे, वहाँ तक उनके त्यागपत्र की चर्चा न होना, सरकार द्वारा उन्हें उचित सम्मान न देना और स्वयं धनखड़ का अब तक मौन रहना—यह सब मिलकर एक असहजता पैदा करते हैं। गृहमंत्री अमित शाह ने उनके इस्तीफ़े को “स्वास्थ्य कारणों” से जोड़ा, किंतु जनता और विपक्ष को आज भी कोई ठोस जानकारी नहीं मिली है।

इसी बीच उपराष्ट्रपति चुनाव का बिगुल बज चुका है। मैदान में एनडीए के सी.पी. राधाकृष्णन और विपक्ष के जस्टिस (सेवानिवृत्त) बी. सुदर्शन रेड्डी आमने-सामने हैं। विपक्ष इसे विचारधारा की लड़ाई बताकर मैदान में उतरा है और “संविधान की रक्षा” का नारा बुलंद कर रहा है। वहीं भाजपा ने चुनाव को अपेक्षित मर्यादा से परे खींचकर सीधे न्यायपालिका को कठघरे में खड़ा करना शुरू कर दिया है।

गृहमंत्री अमित शाह ने जस्टिस रेड्डी पर हमला बोलते हुए 2011 के सुप्रीम कोर्ट के ‘सलवा जुडूम’ फैसले को आधार बनाया। शाह का कहना है कि अगर उस फैसले से सलवा जुडूम खत्म न किया गया होता तो 2020 तक नक्सलवाद का अंत हो चुका होता। यह टिप्पणी केवल विपक्षी प्रत्याशी पर प्रहार नहीं है, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर भी चोट है।

सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में संवैधानिक पदों के चुनाव को इस स्तर तक गिराना उचित है? जस्टिस रेड्डी ने स्पष्ट किया है कि वह फ़ैसला उनका व्यक्तिगत नहीं था, बल्कि सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ का था। फैसला केवल इतना कहता है कि हिंसा से लड़ने का अधिकार केवल राज्य का है, उसे “आउटसोर्स” नहीं किया जा सकता। यानी नागरिक समूहों को हथियारबंद कर राज्य की जिम्मेदारी नहीं टाली जा सकती। यह संविधान और मानवाधिकारों की रक्षा की दृष्टि से अनिवार्य टिप्पणी थी।

आज 18 पूर्व जजों ने भी गृहमंत्री की टिप्पणी को “न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए खतरा” बताया है। यह बयान केवल विपक्षी उम्मीदवार पर हमला नहीं है, बल्कि संस्थाओं की स्वायत्तता पर अविश्वास प्रकट करता है।

भारतीय राजनीति में अब वह संतुलन और शालीनता नहीं बची, जिसकी अपेक्षा हम संवैधानिक पदों के चुनाव से करते थे। उपराष्ट्रपति का चुनाव अब विचारधारा से अधिक बदले की राजनीति का मंच बनता जा रहा है।

लोकतंत्र में विचारों का टकराव आवश्यक है, लेकिन अगर यह टकराव संस्थाओं की नींव को हिलाने लगे, तो यह राष्ट्रहित के विरुद्ध है। गृहमंत्री की टिप्पणियाँ और भाजपा का आक्रामक रुख न केवल उपराष्ट्रपति पद की गरिमा को चोट पहुँचा रहा है, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता को भी संदिग्ध बना रहा है।

इसलिए यह समय है कि सत्ता और विपक्ष दोनों ही अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा से ऊपर उठकर लोकतंत्र की मूल भावना—गरिमा, शालीनता और संस्थाओं की स्वतंत्रता—की रक्षा करें। यही भारतीय गणराज्य की मजबूती की गारंटी है।