सोशल मीडिया पर रील्स की चमक बनाम किताबों की खुशबू।

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला

सोशल मीडिया पर रील्स की चमक बनाम किताबों की खुशबू

🖋️ स्त्रियों की बदलती छवि और समाज की बौद्धिक विफलता

आज जब सोशल मीडिया पर रील्स की चमक और लाइक्स का मोह ही सफलता का मापदंड बन गया है, तब यह सवाल और गहरा हो गया है कि हमारी स्त्रियाँ और उनका साहित्यप्रेम कहाँ गुम हो रहा है। यह केवल व्यक्तिगत पसंद का प्रश्न नहीं, बल्कि एक गंभीर सांस्कृतिक और राजनीतिक विमर्श है।

🖋️ स्त्री और सांस्कृतिक द्वंद्व

रील पर अर्धनग्न होकर प्रस्तुत होना आज ग्लैमर और बोल्डनेस का प्रतीक बना दिया गया है। वहीं किताब पढ़ने वाली, साहित्य पर विमर्श करने वाली स्त्रियाँ “अनदेखी” कर दी जाती हैं। सवाल यह है कि समाज किसे अधिक महत्व देता है—विचारशीलता को या उपभोग-योग्यता को?

भारतीय परंपरा में स्त्री को केवल शरीर नहीं, बल्कि विद्या और चेतना का रूप माना गया। गर्गी, मैत्रेयी, मदालसा, महादेवी वर्मा जैसी नारियों ने सिद्ध किया कि स्त्री जब ज्ञान के क्षेत्र में उतरती है तो पूरी सभ्यता को दिशा देती है। लेकिन आधुनिक डिजिटल संस्कृति ने उसे केवल मनोरंजन और दृश्य सुख का माध्यम बनाकर रख दिया है।

🖋️ मीडिया, बाजार और राजनीति का गठजोड़

1. मीडिया और एल्गोरिद्म – सोशल मीडिया कंपनियों का आधार ही यह है कि जो अधिक उत्तेजक है, वही ट्रेंड करेगा। इस एल्गोरिद्मिक पक्षपात ने किताबों और विचारों को अप्रासंगिक बना दिया है।

2. बाज़ार की भूमिका – पूँजीवादी ढाँचा केवल वही सामग्री आगे बढ़ाता है जिससे उपभोक्तावाद बढ़े। साहित्य पढ़ने वाली स्त्रियाँ बाजार की दृष्टि से “कम उपजाऊ” होती हैं, जबकि रील बनाने वाली स्त्रियाँ विज्ञापन और उत्पादों के लिए “बेहतर माध्यम”।

3. राजनीतिक विमर्श – शिक्षा नीति और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में साहित्य और चिंतन को हाशिये पर डाल दिया गया। राजनीति भी ट्रेंड-ड्रिवेन हो गई है, जहाँ “ट्रेंडिंग नारी” का मतलब केवल दृश्य उपभोग है, न कि विचारशील स्त्री।

🖋️ शिक्षा व्यवस्था की विफलता

हमारे विद्यालय और विश्वविद्यालय किताबों से जोड़ने की बजाय स्क्रीन और इवेंट कल्चर* से जोड़ रहे हैं।

 लाइब्रेरी संस्कृति का ह्रास हुआ है।

साहित्यिक गोष्ठियाँ “गैर-ज़रूरी” लगने लगीं।

 स्त्रियों को ज्ञान से जोड़ने की बजाय केवल ‘स्किल-डेवलपमेंट’ और ‘एम्प्लॉयबिलिटी’ के दायरे तक सीमित कर दिया गया।

यह सब मिलकर स्त्री के बौद्धिक स्वरूप को अप्रासंगिक और अलोकप्रिय बना रहे हैं।

🖋️ पितृसत्ता और स्त्री की पहचान

यह भी समझना होगा कि पितृसत्ता इस “रील-कल्चर” को प्रोत्साहित करती है। क्योंकि एक साहित्य पढ़ने वाली, विचारशील स्त्री सवाल करती है, प्रतिरोध करती है और समाज को दिशा देती है। जबकि “मनोरंजन के लिए प्रस्तुत स्त्री” पितृसत्ता और बाजार दोनों के लिए अधिक सुविधाजनक है।

इसलिए यह बहस केवल नैतिकता की नहीं, बल्कि सत्ता-संरचना की बहस है।

आज की स्त्रियों के सामने दो रास्ते हैं—

1. रील की क्षणभंगुर चमक में खो जाना।

2. या फिर किताबों की गहराई और साहित्यिक चेतना से समाज को दिशा देना।

समाज, शिक्षा और राजनीति यदि स्त्रियों के बौद्धिक योगदान को पुनर्जीवित नहीं करेंगे, तो अगली पीढ़ी को केवल “ट्रेंडिंग चेहरे” मिलेंगे, “विचारशील नारियाँ” नहीं

👉 असली प्रश्न यह है—

"क्या हम एक ऐसे समाज की कल्पना करना चाहते हैं जहाँ स्त्रियों को केवल दिखावे से आँका जाए, या फिर ऐसे समाज की, जहाँ उनकी किताबों और विचारों से भविष्य गढ़ा जाए?"