प्रथम पूज्य गणेश और संगीत साधना : शास्त्रीय परिप्रेक्ष्य
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
प्रथम पूज्य गणेश और संगीत साधना : शास्त्रीय परिप्रेक्ष्य१. नाद-ब्रह्म और गणेश
ऋग्वेद (१.१६४.४६) में कहा गया है—
"एको नादः सर्वे भवन्ति।"
अर्थात सम्पूर्ण जगत नाद से उत्पन्न और उसी में विलीन है।
गणपति को नाद-ब्रह्म का प्रत्यक्ष स्वरूप माना गया है। मुद्गल पुराण और गणेश पुराण में वर्णन है कि गणेश की उपासना से साधक को आत्मिक संतुलन और ध्वनि की शुद्धि प्राप्त होती है। यही संगीत साधना का मूल है।
२. गणेश और वाद्य-वीणा
नाट्यशास्त्र (अध्याय ३६, भरतमुनि) में कहा गया है कि—
"सर्वे वाद्याः देवतानाम्।"
(सभी वाद्य किसी न किसी देवता से संबंधित हैं)।
गणेश की वीणा धारण करने वाली मूर्तियाँ यह दर्शाती हैं कि वे स्वयं संगीत के संरक्षक हैं। जब वे वीणा बजाते हैं तो ज्ञान (सरस्वती) और नाद (नादब्रह्म) का अद्भुत संगम प्रकट होता है।
३. गणेश और ताल-लय
भारतीय संगीत का मूल आधार ताल है।
संगीत रत्नाकर (शारंगदेव) में लिखा है—
"तालो लयस्य जीवनम्।"
(ताल ही लय का जीवन है)।
गणपति का लम्बोदर स्वरूप — विशाल उदर — केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि यह दर्शाता है कि वे सम्पूर्ण ताल और लय को समाहित किए हुए हैं। इसलिए उन्हें संगीत-ताल-मूर्ति माना जाता है।
४. गणेश स्तुति और राग परंपरा
कर्नाटक संगीत में → मुत्तुस्वामी दीक्षितर की रचना “वातापि गणपतिं” (राग हंसध्वनि, आदि ताल) आज भी हर संगीत समारोह की शुरुआत में गाई जाती है।
हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में → परंपरागत रूप से गणेश वंदना गाए बिना कोई भी मंचीय प्रस्तुति शुभ नहीं मानी जाती।
उत्तर भारत की परंपरा में → “गणेश वंदना” ध्रुपद, ख्याल और भजन की शैलियों में गाई जाती है।
यह इस तथ्य को प्रमाणित करता है कि गणेश जी केवल धर्म के ही नहीं, बल्कि संगीत के भी प्रथम पूज्य हैं।
५. गणेश के प्रतीक और संगीत साधना
बड़ा मस्तक → व्यापक चिंतन और गहन अध्ययन।
छोटी आँखें → स्वर की सूक्ष्मता पहचानने की क्षमता।
लम्बी सूँड → स्थूल और सूक्ष्म दोनों स्वरों पर अधिकार।
शांत मुद्रा → साधक के लिए धैर्य और निरंतर अभ्यास (साधना) का संकेत।
यह वही सिद्धांत है जिसे पद्मपुराण में कहा गया है—
"विघ्नेश्वरं विना किञ्चित् न सिद्ध्यति कदाचन।"
अर्थात किसी भी विद्या की सिद्धि गणेश की कृपा बिना संभव नहीं।
शास्त्र, संगीत-ग्रंथ और परंपरा सभी यही बताते हैं कि—
गणेश जी संगीत साधना के द्वारपाल हैं।
वे नाद (ध्वनि), लय (ताल), और राग (सामंजस्य) के त्रिमूर्ति स्वरूप हैं।
संगीतकार जब "गणेश वंदना" करता है, तो वह केवल मंगल की प्रार्थना नहीं करता, बल्कि यह स्वीकार करता है कि—
“हे विघ्नहर्ता, हमारी साधना के आंतरिक विघ्नों को हरकर हमें नाद-ब्रह्म के साक्षात्कार तक ले चलो।”