जब लोकतंत्र बुलडोज़र, भीड़ और मुठभेड़ों के हवाले होने लगे
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
जब लोकतंत्र बुलडोज़र, भीड़ और मुठभेड़ों के हवाले होने लगे
पश्चिम बंगाल में हाल की घटनाएँ एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती हैं कि क्या हम अपराध, कानून-व्यवस्था और न्याय को संवैधानिक दृष्टि से देख रहे हैं, या फिर उन्हें राजनीतिक लाभ-हानि के तौलने वाले औज़ार में बदल दिया है। एक ओर बारुईपुर जैसी वीभत्स घटना है, जिसमें एक नाबालिग के साथ दुष्कर्म और हत्या का आरोप है; दूसरी ओर उस घटना के बाद सामने आए राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, भीड़ की हिंसा, संदिग्ध पुलिस कार्रवाई, और अंततः एक आरोपी की मुठभेड़ में मृत्यु—ये सब मिलकर एक ऐसा दृश्य रचते हैं, जो किसी सभ्य लोकतंत्र के लिए अत्यंत चिंताजनक है।
सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि नाबालिग के साथ दुष्कर्म और हत्या जैसा अपराध किसी भी समाज के लिए अक्षम्य कलंक है। ऐसी घटनाओं पर राज्य की पहली और अंतिम जिम्मेदारी यह होनी चाहिए कि वह पीड़ित के परिवार को त्वरित न्याय, भरोसा और सुरक्षा दे; साक्ष्य सुरक्षित रखे; दोषियों को विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत कठोरतम सज़ा दिलाए; और यह सुनिश्चित करे कि भविष्य में ऐसी त्रासदी की पुनरावृत्ति न हो। लेकिन जब ऐसी घटनाएँ राजनीतिक मंचों, चुनावी भाषणों और सोशल मीडिया के युद्धक्षेत्र में बदल दी जाती हैं, तब पीड़ित की पीड़ा पीछे छूट जाती है और सत्ता-संघर्ष आगे आ जाता है।
यह विडंबना भी कम नहीं कि पश्चिम बंगाल में जिस राजनीतिक ध्रुव ने स्वयं लंबे समय तक कानून-व्यवस्था, केंद्रीय हस्तक्षेप, सख्त पुलिस कार्रवाई और “दबंग राज्य” की छवि को लेकर आलोचना की है, वही ध्रुव अब वहाँ आने पर कठोर प्रशासनिक तरीकों को अपने अनुकूल बताने की कोशिश करता दिखाई देता है। और दूसरी ओर, जिस विपक्ष ने पहले ऐसे ही मामलों पर सत्ताधारी दल को घेरा था, वह अब हर आलोचना को पूर्व-शासन की विफलता बताकर अपने हाथ झाड़ लेना चाहता है। यह राजनीति का पुराना, किंतु अत्यंत थका देने वाला खेल है—अपराध हो तो दोष पूर्ववर्ती सरकार का; कार्रवाई हो तो श्रेय वर्तमान सत्ता का; और यदि पीड़ित बोलने की स्थिति में न हो, तो उसके नाम पर भी वाकयुद्ध चलता रहे।
बारुईपुर प्रकरण में सबसे अधिक चिंता का विषय यही है कि पुलिस की भूमिका पर प्रारंभ से प्रश्न उठ रहे हैं। यदि स्थानीय निवासियों की शिकायतें सही हैं, तो यह बताता है कि प्रारंभिक प्रतिक्रिया में गंभीर चूक हुई। यदि सीसीटीवी फुटेज, गिरफ्तारी, कथित स्वीकारोक्ति और शव की बरामदगी जैसी बातें स्थानीय लोगों की पहल से हुईं, तो यह पुलिस-तंत्र की निष्क्रियता का सूचक है। और यदि पुलिस ने समय पर कार्रवाई नहीं की, तो यह केवल एक त्रुटि नहीं, बल्कि ऐसी संस्थागत विफलता है, जिसकी कीमत किसी मासूम की जान से चुकानी पड़ी। किसी भी लोकतांत्रिक राज्य में इससे बड़ा नैतिक संकट क्या हो सकता है कि जनता को न्याय के लिए पुलिस के समानांतर कदम उठाने पड़ें?
पर इससे भी अधिक गंभीर प्रश्न उस मुठभेड़ पर उठता है, जिसमें एक आरोपी की मृत्यु हुई। भारत में “मुठभेड़” शब्द अनेक बार अपराध से कम, उसकी व्याख्या से अधिक विवादास्पद रहा है। पुलिस के अनुसार, आरोपी ने भागने की कोशिश की, हमला किया, और आत्मरक्षा में गोली चलानी पड़ी। यह कथा हमने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात और अन्य राज्यों में भी अनेक बार सुनी है। परंतु संवैधानिक राज्य में किसी भी हत्या को केवल सरकारी कथन के आधार पर न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। पुलिस का काम अपराधी को पकड़ना है; सज़ा देना न्यायालय का काम है। यदि मुठभेड़ को अपराध-नियंत्रण का स्थायी उपकरण बना दिया जाए, तो यह न्यायपालिका, अभियोजन और जाँच-तंत्र के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न है।
यही कारण है कि मुठभेड़ों को किसी उपलब्धि, तमगे या राजनीतिक पूँजी की तरह देखने की प्रवृत्ति खतरनाक है। जब पुलिस की गोली को न्याय का पर्याय बना दिया जाता है, तब अदालतें गौण, साक्ष्य गौण, अभियोजन गौण और संवैधानिक प्रक्रिया गौण हो जाती है। एक सभ्य लोकतंत्र में यह स्वीकार्य नहीं हो सकता। अपराधी चाहे जितना घृणित क्यों न हो, राज्य कानून से ऊपर नहीं हो सकता। यदि राज्य स्वयं त्वरित दंडदाता बन बैठे, तो वह और अपराधी के बीच का अंतर धुँधला कर देता है।
इस प्रकरण का एक मानवीय पक्ष भी है, जिसे अक्सर राजनीतिक शोर में भुला दिया जाता है। पीड़ित बच्ची, उसका परिवार, उनका शोक, उनकी भयावह त्रासदी—ये सब किसी भी समाचार-बयान, प्रेस कॉन्फ्रेंस या धरना-प्रदर्शन से बड़े हैं। एक मासूम जीवन का इस तरह समाप्त होना किसी भी समाज की सामूहिक विफलता है। प्रश्न केवल यह नहीं कि अपराधी कौन था; प्रश्न यह भी है कि वह अपराध हो कैसे गया, रोका क्यों नहीं गया, चेतावनी पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया, और पुलिस ने पहली सूचना पर गंभीरता क्यों नहीं दिखाई। यदि प्रारंभिक शिकायत को हल्के में लिया गया, तो यह प्रशासनिक असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा है।
दूसरी ओर, इस पूरे प्रकरण में जिस तरह भीड़ की हिंसा सामने आई, वह भी उतनी ही चिंताजनक है। भीड़ द्वारा किसी व्यक्ति की पीट-पीटकर हत्या करना किसी न्यायपूर्ण समाज की नहीं, बल्कि टूटे हुए सामाजिक अनुशासन की निशानी है। भीड़ न्याय नहीं होती; भीड़, अक्सर उत्तेजना, अफवाह, भय और राजनीतिक उकसावे का मिश्रण होती है। यदि किसी अपराध से आक्रोशित जनता कानून अपने हाथ में लेने लगे, तो फिर राज्य और अराजकता के बीच की रेखा मिट जाती है। इसलिए भीड़-हिंसा के दोषियों पर भी सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यह कार्रवाई बदले की भावना से नहीं, कानून की मर्यादा से प्रेरित होनी चाहिए।
यह भी उतना ही आवश्यक है कि राजनीतिक दल इस तरह के संवेदनशील मामलों को धार्मिक ध्रुवीकरण का माध्यम न बनाएँ। अपराध का कोई धर्म नहीं होता। पीड़िता की पीड़ा, परिवार का शोक और समाज की चिंता—ये किसी एक समुदाय की नहीं होतीं। जब राजनीतिक नेता ऐसे मामलों में हिंदू-मुसलमान का कोण जोड़ते हैं, तब वे न केवल पीड़ित के साथ अन्याय करते हैं, बल्कि समाज में अविश्वास और भय भी बढ़ाते हैं। यह लोकतंत्र की भाषा नहीं, चुनावी उन्माद की भाषा है।
चुनावों के समय किसी पीड़ित परिवार की त्रासदी को टिकट, मंच या प्रचार-प्रतीक में बदलना भी नैतिक रूप से उचित नहीं माना जा सकता। यदि किसी परिवार की पीड़ा को प्रतिनिधित्व में बदलना है, तो उसका अर्थ यह नहीं कि बाद में वही प्रतिनिधि राजनीतिक मजबूरियों के कारण असहज, असंवेदनशील या रक्षात्मक हो जाए। पीड़ित के नाम पर राजनीति करना जितना आसान है, पीड़ित के न्याय के लिए ईमानदारी से खड़ा होना उतना ही कठिन। और राजनीति की परिपक्वता इसी में है कि वह भावनाओं का उपयोग न करे, बल्कि उनसे जवाबदेही सीखे।
बारुईपुर की घटना के बहाने पश्चिम बंगाल को किसी “भाजपाई रंग” या “तृणमूल रंग” में देखना समस्या का समाधान नहीं है। समस्या किसी एक दल की नहीं, उस राजनीतिक संस्कृति की है जो अपराध पर त्वरित प्रतिक्रिया के नाम पर विधिसम्मत प्रक्रिया को कमजोर करती है; जो कानून-व्यवस्था को चुनावी हथियार बनाती है; जो पुलिस को संस्थान नहीं, सत्ता का उपकरण समझती है; और जो पीड़ित को नागरिक नहीं, पोस्टर समझती है।
यदि भाजपा शासित राज्यों में मुठभेड़ों, बुलडोज़र कार्रवाई और कठोर पुलिसिंग को प्रशंसा के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो उससे यह संदेश जाता है कि राज्य का बल न्याय से बड़ा है। और यदि विपक्षी राज्य ऐसी ही प्रतीकात्मकता से भयभीत होकर अराजकता या राजनीतिक ढाल के पीछे छिपते हैं, तो वे भी संविधान की आत्मा के साथ न्याय नहीं करते। लोकतंत्र को न बुलडोज़र चाहिए, न भीड़; उसे चाहिए कानून, स्वतंत्र जाँच, निष्पक्ष अभियोजन, साक्ष्य-आधारित न्याय और जवाबदेह पुलिसिंग।
यह भी याद रखना होगा कि महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा केवल अपराधियों को मार देने से नहीं होगी। वह तब होगी जब प्राथमिकी समय पर दर्ज हो, शिकायत को गंभीरता से लिया जाए, फॉरेंसिक प्रक्रिया मजबूत हो, पुलिस में लैंगिक संवेदनशीलता हो, फास्ट ट्रैक अदालतें सचमुच तेज़ काम करें, और राजनीतिक नेतृत्व हर बार टीवी कैमरों के सामने नहीं, सिस्टम के भीतर सुधार लाने में जुटे। सुरक्षा का अर्थ बदला नहीं, व्यवस्था होता है।
अंततः यह प्रसंग हमें एक कठिन, पर अनिवार्य निष्कर्ष की ओर ले जाता है। सभ्य समाज की पहचान इस बात से नहीं होती कि वह अपराधियों से कितनी नफ़रत करता है; उसकी पहचान इस बात से होती है कि वह अपराध से निपटते समय भी कानून, करुणा और संविधान को कितना बचाए रखता है। यदि अपराध पर राजनीति और मुठभेड़ पर तालियाँ बजने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि समाज अपनी नैतिक दिशा खो रहा है।
पश्चिम बंगाल हो या उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश हो या गुजरात—राज्य की शक्ति का मूल्यांकन इस बात से होना चाहिए कि वह अपराध को न्याय में कैसे बदलता है, न कि इस बात से कि वह कितनी जल्दी गोली चला देता है। एक लोकतंत्र में पुलिस की सबसे बड़ी ताकत उसका संयम है, उसकी सबसे बड़ी योग्यता उसकी विधिसम्मत निष्ठा है, और उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वह अपराधी को अदालत तक पहुँचा सके, कब्र तक नहीं।
यही लोकतंत्र की मर्यादा है।
यही संवैधानिक राज्य की असली कसौटी है।
यही वह मानवीय आधार है, जिसके बिना कानून व्यवस्था केवल भय का दूसरा नाम बनकर रह जाती है।
