जब एक मौत भूख की, उपेक्षा की और व्यवस्था की हो जाती है

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


जब एक मौत भूख की, उपेक्षा की और व्यवस्था की हो जाती है

यह केवल एक व्यक्ति की मृत्यु की खबर नहीं है। यह उस भारत का कठोर आईना है, जहाँ विकास के चमकदार नारों के बीच अभी भी लाखों लोग बीमारी, बेरोज़गारी, भुखमरी और सामाजिक उपेक्षा की सिसकियों में जीने को अभिशप्त हैं। बिहार के खगड़िया से आई यह खबर भीतर तक झकझोर देती है। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार 55 वर्षीय एक व्यक्ति की भूख और बदहाली की स्थिति में मौत हो गई। उनकी पत्नी राशन और कुछ मदद लाने के लिए अपनी बहन के घर गई थीं। लौटकर आईं तो पति की जान जा चुकी थी। दो दिन तक वह शव के साथ अकेली बैठी रहीं। अंततः आसपास के लोगों ने चंदा करके अंतिम संस्कार कराया।

यह दृश्य किसी एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था पर एक गहरा आरोप है। यह उस तथाकथित विकास मॉडल की परीक्षा है, जिसमें हम एक्सप्रेसवे, सेमीकंडक्टर, बुलेट ट्रेन, अंतरिक्ष मिशनों और पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की चर्चा तो बड़े गर्व से करते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक महानता उसकी ऊँची इमारतों, चमचमाती परियोजनाओं या वैश्विक दावों से नहीं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि उसके सबसे गरीब नागरिक की थाली में भोजन है या नहीं, घर में दवा है या नहीं, और बच्चे का भविष्य सुरक्षित है या नहीं।


भारत आज जिन आर्थिक दावों के साथ दुनिया के सामने खड़ा होता है, वे अपने आप में महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं। लेकिन इन दावों की नैतिक वैधता तभी बनती है जब वे अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुँचें। यदि किसी गाँव, किसी ज़िले, किसी परिवार में आज भी भूख, इलाज की कमी, अस्थिर आय और अपमानजनक जीवन की स्थिति बनी हुई है, तो विकास के सारे आँकड़े एक अधूरी कहानी बनकर रह जाते हैं।


यह भी सच है कि पिछले वर्षों में बहुआयामी गरीबी में कमी आने के सरकारी दावे किए गए हैं। यह भी बताया गया है कि करोड़ों लोग गरीबी रेखा के नीचे से ऊपर आए हैं। लेकिन आँकड़ों की इस भाषा को ज़मीनी जीवन की कठोर सच्चाइयों से अलग नहीं किया जा सकता। बिहार जैसे राज्य, और खगड़िया जैसे ज़िले, अब भी शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, रोज़गार और जीवन-स्तर की गहरी वंचना से जूझ रहे हैं। यही कारण है कि गरीबी को केवल आय से नहीं, बल्कि जीवन की संपूर्ण असुरक्षा से समझना होगा।


गरीबी का अर्थ सिर्फ़ कम पैसा नहीं होता। गरीबी का अर्थ है—अधपेट भोजन, कुपोषण, दवा का अभाव, अस्थायी काम, टूटा हुआ घर, बच्चों की अधूरी पढ़ाई, और हर दिन यह भय कि कल क्या होगा। यह एक ऐसी सामाजिक अवस्था है जिसमें व्यक्ति सिर्फ़ जीवित नहीं रहता, बल्कि लगातार टूटता रहता है। और जब ऐसे परिवारों में कोई सदस्य बीमार पड़ता है, तो पूरी अर्थव्यवस्था हिल जाती है। एक दिन का काम छूटना भी कई बार भूख में बदल जाता है। दो दिन की बेरोज़गारी भी जीवन-मरण का संकट बन सकती है। यही कारण है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली, मुफ्त या सुलभ इलाज, पोषण योजनाएँ, रोजगार सुरक्षा और सामाजिक सहायता—ये दया नहीं, लोकतांत्रिक राज्य की बुनियादी जिम्मेदारियाँ हैं।


स्वास्थ्य के मोर्चे पर भारत की चुनौती और भी गहरी है। कुपोषण, एनीमिया, बच्चों का कम वज़न, महिलाओं में पोषण की कमी, और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा तक असमान पहुँच—ये सब मिलकर गरीब परिवारों के जीवन को और असुरक्षित बनाते हैं। एक बीमारी बहुतों को गरीबी में ढकेल देती है, और एक ग़रीब व्यक्ति को अक्सर बीमारी से लड़ने का अवसर भी नहीं मिलता। इलाज के अभाव में मौतें केवल चिकित्सा संकट नहीं होतीं, वे सामाजिक असमानता की अंतिम परिणति होती हैं।


शिक्षा भी इस चक्र को तोड़ने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाई है। गरीब परिवारों के बच्चे सरकारी स्कूलों में आते हैं, लेकिन गुणवत्ता, संसाधन, शिक्षक-उपलब्धता, और आर्थिक दबाव के कारण उनकी राह आसान नहीं होती। पढ़ाई, कई बार, रोज़गार, स्वास्थ्य और भोजन की चिंता के सामने हार जाती है। इस तरह गरीबी एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में स्थानांतरित होती रहती है। वह केवल आर्थिक नहीं, वंशानुगत अभिशाप बन जाती है।


इस प्रकार की खबरों पर एक बुनियादी सावधानी भी ज़रूरी है। किसी भी मौत के कारण पर प्रशासनिक या चिकित्सीय जाँच आवश्यक होती है। हर बार “भूख से मौत” जैसे निष्कर्ष को तथ्यात्मक पुष्टि की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। लेकिन यह सावधानी उस व्यापक सच को नहीं बदल सकती कि यदि किसी नागरिक की मौत के समय उसके घर में भोजन नहीं था, उसकी पत्नी को मदद के लिए भटकना पड़ा, और अंतिम संस्कार तक चंदे से करना पड़ा, तो यह केवल एक परिवार की विफलता नहीं रह जाती। यह राज्य, समाज और व्यवस्था—तीनों की सामूहिक असफलता बन जाती है।


यही वह बिंदु है जहाँ एक लोकतंत्र की असली नैतिकता परखा जाती है। लोकतंत्र की महानता इस बात से नहीं मापी जाती कि उसकी अर्थव्यवस्था कितनी तेज़ी से बढ़ रही है, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि उसका सबसे कमजोर नागरिक कितना सुरक्षित है। क्या वह भूख से बचा है? क्या उसे इलाज मिल सकता है? क्या उसका बच्चा स्कूल जा पा रहा है? क्या उसे सम्मान के साथ जीवन जीने का अवसर मिला है?


खगड़िया की यह घटना किसी एक राज्य की नहीं, पूरे देश की चेतावनी है। यह हमें याद दिलाती है कि विकास का अर्थ सिर्फ़ बुनियादी ढाँचा नहीं, मानवीय गरिमा भी है। अर्थव्यवस्था की सफलता तभी सार्थक है जब वह आख़िरी व्यक्ति की ज़रूरतों को संबोधित करे। यदि विकास की चमक उस व्यक्ति तक नहीं पहुँची, जिसके घर में आज भी भोजन, दवा और सुरक्षा का भरोसा नहीं है, तो यह केवल प्रगति का दावा है, प्रगति नहीं।

इसलिए यह प्रश्न किसी एक सरकार से नहीं, पूरे राष्ट्र से पूछा जाना चाहिए—क्या हमने विकास को पर्याप्त माना, और मनुष्यता को बहुत हल्के में छोड़ दिया? और यदि ऐसा है, तो खगड़िया की यह मौत हमें बताती है कि सबसे बड़ा संकट अभी भी भूख नहीं, हमारी संवेदना का मर जाना है।