नेहा बोरा: भूख, प्रतिरोध और एक पीढ़ी की असहमति
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
नेहा बोरा: भूख, प्रतिरोध और एक पीढ़ी की असहमति
जंतर-मंतर की धूप में जब नेहा बोरा मंच पर पहुँचीं, तो शरीर उनकी आवाज़ के आगे झुक नहीं पाया था। वे 23 दिनों से अन्न का एक दाना नहीं खा रही थीं। शरीर का वजन साढ़े सात किलो घट चुका था। रक्त में शर्करा खतरनाक स्तर तक पहुँच चुकी थी। डॉक्टर चेतावनी दे रहे थे कि स्थिति गंभीर हो सकती है। इसके बावजूद उनकी आवाज़ में कमजोरी नहीं थी। उनके शब्दों में थकान नहीं, प्रतिरोध था। उन्होंने घायल विद्यार्थियों की ओर देखकर कहा—“हमारी चोटें हिंसा की गवाही देंगी।”
यह वाक्य केवल एक प्रदर्शनकारी भाषण नहीं था। यह उस पीढ़ी की पीड़ा का संक्षिप्त, तीखा और लगभग दस्तावेज़ी बयान था, जो लंबे समय से परीक्षा-व्यवस्था की विफलताओं, पेपर लीक, बेरोज़गारी, प्रशासनिक उदासीनता और राजनीतिक टालमटोल का सामना कर रही है। नेहा बोरा आज उसी असंतोष की सबसे पहचानी हुई आवाज़ों में से एक बन चुकी हैं।
लगभग 29 वर्ष की नेहा मूलतः उत्तराखंड की हैं। उनका बचपन सिलीगुड़ी में बीता, जहाँ उन्होंने दिल्ली पब्लिक स्कूल, सिलीगुड़ी से अपनी स्कूली शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए वे दिल्ली आईं। दिल्ली विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में स्नातक की पढ़ाई ने उन्हें जाति, वर्ग, लैंगिक असमानता, सामाजिक सत्ता और संस्थागत भेदभाव जैसे प्रश्नों के अधिक निकट ला दिया। इसके बाद उन्होंने आंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली से स्नातकोत्तर किया। यह विश्वविद्यालय अपने आलोचनात्मक पाठ्यक्रम, सामाजिक विज्ञान की दृष्टि और हाशिये के प्रश्नों पर केंद्रित बौद्धिक वातावरण के लिए जाना जाता है। यहीं नेहा की सामाजिक चेतना, रंगमंचीय अभिव्यक्ति और सार्वजनिक सक्रियता को अधिक स्पष्ट दिशा मिली।
नेहा केवल छात्र राजनीति की कार्यकर्ता नहीं हैं। वे रंगमंच से भी जुड़ी रही हैं। रंगमंच ने उनकी भाषा को धार दी, मंच पर उनकी उपस्थिति को आत्मविश्वास दिया और सीधे संवाद करने की उनकी क्षमता को मजबूत किया। उनके भाषणों में औपचारिक राजनीतिक पर्चों की भाषा नहीं मिलती। वे सामने खड़े लोगों से सीधे, छोटे और चोट करने वाले वाक्यों में बात करती हैं। उनके शब्द सजावटी नहीं होते; वे साक्ष्य की तरह काम करते हैं।
इस समय वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स में पीएचडी की तीसरे वर्ष की शोधार्थी हैं। यह वही अकादमिक क्षेत्र है जहाँ सिनेमा, रंगमंच, प्रदर्शन, दृश्य संस्कृति और कला के सामाजिक अर्थों का अध्ययन होता है। इसीलिए नेहा की सार्वजनिक पहचान किसी एक भूमिका तक सीमित नहीं है। वे समाजशास्त्र की विद्यार्थी हैं, कला और प्रदर्शन की शोधार्थी हैं, रंगकर्मी हैं और छात्र आंदोलन की सक्रिय नेता भी। कक्षा, पुस्तकालय, मंच और सड़क — इन चारों का संगम उनके सार्वजनिक व्यक्तित्व को रचता है।
जेएनयू में पढ़ाई के दौरान वे छात्र राजनीति में सक्रिय हुईं। वे ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन, आइसा से जुड़ीं और बाद में उसकी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं। उनके राजनीतिक सरोकार शिक्षा के निजीकरण, विश्वविद्यालयों में शुल्क वृद्धि, छात्रावास और छात्रवृत्ति के प्रश्न, जातिगत भेदभाव, महिलाओं की सुरक्षा और लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार के इर्द-गिर्द रहे हैं। उनके लिए छात्र राजनीति केवल संगठन निर्माण नहीं, बल्कि शिक्षा के सार्वजनिक चरित्र की रक्षा का प्रश्न है।
उनका सामाजिक और राजनीतिक हस्तक्षेप केवल परिसर तक सीमित नहीं रहा। वे मॉब लिंचिंग के विरुद्ध बोलीं, बिलकिस बानो के लिए न्याय की माँग उठाई, गाजा में मारे जा रहे नागरिकों, महिलाओं और बच्चों के पक्ष में आवाज़ देती रहीं, और दलित, आदिवासी, पिछड़े तथा अल्पसंख्यक विद्यार्थियों के समान अधिकार की पैरवी करती रहीं। उनकी बुनियादी चिंता यही रही है कि शिक्षा कुछ गिने-चुने आर्थिक रूप से सक्षम परिवारों का विशेषाधिकार न बन जाए।
जंतर-मंतर का हालिया आंदोलन पेपर लीक, परीक्षा-व्यवस्था में गड़बड़ियों, बेरोज़गारी और विद्यार्थियों की आत्महत्याओं जैसे गंभीर सवालों पर खड़ा हुआ। सोशल मीडिया पर “कॉकरोच जनता पार्टी” जैसे व्यंग्यात्मक नाम से शुरू हुई यह मुहिम शीघ्र ही सड़क पर उतर आई। देश के अलग-अलग हिस्सों से विद्यार्थी दिल्ली पहुँचे। उनकी मुख्य माँगें थीं — केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, परीक्षा-व्यवस्था की विफलताओं की जवाबदेही, और छात्रों के साथ हुए व्यवहार पर स्पष्ट कार्रवाई।
नेहा बोरा ने अपने साथियों मनीष कुमार और आमीन अमितोज के साथ अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की। सोनम वांगचुक भी उनके साथ अनशन पर बैठे। दिन बीतते गए, शरीर कमजोर होता गया, लेकिन विरोध की दृढ़ता कम नहीं हुई। 21वें दिन पुलिस सोनम वांगचुक को अस्पताल ले गई। नेहा ने तब कहा कि 21 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों की कोई सुध नहीं ली गई, जबकि अनशनकारियों को जबरन अस्पताल ले जाने की कोशिश की जा रही है। यह कथन केवल प्रशासन पर आरोप नहीं था; यह उस संपूर्ण रवैये की आलोचना थी जिसमें आंदोलन को सुना नहीं जाता, बल्कि प्रबंधित किया जाता है।
पुलिस कार्रवाई ने आंदोलन की तीव्रता को और बढ़ा दिया। संसद मार्च के दौरान हुई कथित हिंसा, लाठीचार्ज और आँसू गैस के इस्तेमाल ने नेहा को भीतर तक झकझोर दिया। उन्होंने मंच से कहा कि शांतिपूर्वक आगे बढ़ रहे विद्यार्थियों पर हमला हुआ, सिर फोड़े गए, और महिला प्रदर्शनकारियों के शरीर के निजी हिस्सों पर बैटन से वार किए गए। उनके शब्दों में एक सीधा नैतिक अभियोग था — “इसे याद रखा जाएगा।” और फिर उन्होंने जो वाक्य कहा, वह आंदोलन की स्मृति में दर्ज हो गया — “हमारी चोटें हिंसा की गवाही देंगी।”
नेहा ने अपने भाषण में सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख का स्मरण किया। यह केवल प्रतीकात्मक उल्लेख नहीं था। वह उन स्त्रियों की लंबी परंपरा से जुड़ना था जिन्होंने अपमान, हिंसा और प्रतिरोध के बीच शिक्षा के द्वार खोले। नेहा के लिए आज की शिक्षा-लड़ाई उसी ऐतिहासिक धारा का हिस्सा है। उनका संदेश स्पष्ट था: शिक्षा बचाना केवल वर्तमान छात्रों का प्रश्न नहीं, आने वाली पीढ़ियों का प्रश्न है।
बाद में वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल ने अपने कार्यक्रम सेंट्रल हॉल में नेहा बोरा, आमीन अमितोज और आंदोलन से जुड़ी अनुष्का घोष से बातचीत की। वहाँ नेहा ने छात्र संकट को संक्षेप में नहीं, बल्कि उसके सामाजिक यथार्थ के साथ रखा। उन्होंने कहा कि युवाओं का गुस्सा अचानक पैदा नहीं हुआ। वर्षों की तैयारी के बाद पेपर लीक हो जाता है। परीक्षा रद्द हो जाती है। नई तिथियाँ महीनों नहीं आतीं। परिवार कर्ज लेकर बच्चों को पढ़ाते हैं। छात्र अपना सबसे अच्छा समय कोचिंग और परीक्षा केंद्रों के बीच खो देते हैं। इसके बावजूद उन्हें निष्पक्ष अवसर नहीं मिलता।
नेहा के लिए यह आंदोलन किसी एक नेता या व्यक्ति का नहीं, बल्कि लाखों विद्यार्थियों का है जिनकी मेहनत को कमजोर और अविश्वसनीय परीक्षा-व्यवस्था ने अनिश्चितता में डाल दिया है। शिक्षा मंत्री का इस्तीफा उनके लिए प्रतीकात्मक क्रोध नहीं, बल्कि जवाबदेही की न्यूनतम माँग है। उनका तर्क सीधा है: जब व्यवस्था बार-बार विफल होती है, तब केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं होते; जिम्मेदारी तय करनी पड़ती है।
उनकी राजनीतिक भाषा में एक महत्वपूर्ण बात है — वे विद्यार्थियों से सहानुभूति नहीं, संवाद और कार्रवाई चाहती हैं। वे ठोस उत्तर चाहती हैं, औपचारिक वक्तव्य नहीं। वे साफ और सुरक्षित परीक्षा चाहती हैं, और ऐसा भविष्य चाहती हैं जिसमें मेहनत करने वाला छात्र यह न सोचे कि उसकी जगह कोई और तंत्र के भीतर तय कर देगा।
नेहा बोरा की कहानी अभी पूरी नहीं हुई है। वह सिलीगुड़ी की छात्रा से दिल्ली विश्वविद्यालय की समाजशास्त्र-विद्यार्थी, आंबेडकर विश्वविद्यालय की शोधार्थी, रंगकर्मी, जेएनयू की पीएचडी छात्रा और आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष तक पहुँची हैं। जंतर-मंतर ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दी है, लेकिन यह पहचान किसी चमकदार मंच की नहीं; यह भूख, संघर्ष, अकादमिक चेतना और सड़क पर खड़ी छात्र-राजनीति की पहचान है।
उनकी माँगें सरल हैं, पर उनकी सरलता में ही उनकी तीव्रता छिपी है — पेपर लीक बंद हों, परीक्षाएँ निष्पक्ष हों, दोषियों को सज़ा मिले, शिक्षा सस्ती हो, सरकार विद्यार्थियों से बात करे, राजनीतिक जवाबदेही तय हो, और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले युवाओं पर बल प्रयोग न हो।
23 दिनों तक भूखी रही यह शोधार्थी आज देश से एक ही प्रश्न पूछ रही है — पढ़ने वाला युवा न्याय माँगने कहाँ जाए?
उसका नाम नेहा बोरा है। और अब उसकी आवाज़ केवल एक मंच की नहीं रही।
