जब जनता को ही देशविरोधी बताया जाए, तब मीडिया का चौथा स्तंभ होना संदिग्ध हो जाता है
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
जब जनता को ही देशविरोधी बताया जाए, तब मीडिया का चौथा स्तंभ होना संदिग्ध हो जाता है
भारत का लोकतंत्र केवल संसद, सरकार और न्यायपालिका से नहीं चलता। वह जनता के विश्वास से चलता है। और जनता का विश्वास तब टूटता है, जब सत्ता के साथ खड़े कुछ मीडिया संस्थान संवैधानिक प्रश्नों को रिपोर्ट करने के बजाय जनता को ही कटघरे में खड़ा करने लगते हैं। यही आज के भारतीय सूचना-परिदृश्य का सबसे गंभीर संकट है।
किसान आंदोलन के दिनों में देश ने देखा कि जो लोग अपनी ही जमीन, अपनी ही रोज़ी और अपने ही अधिकार की लड़ाई लड़ रहे थे, उन्हें एक बड़े हिस्से के मीडिया ने “खालिस्तानी” कह दिया। अंततः सरकार को उसी जनदबाव के आगे झुकना पड़ा। Anti-CAA आंदोलन को विदेशी साजिश, टूलकिट और राष्ट्रविरोधी एजेंडा बताया गया। लेकिन इतिहास ने उसी कानून को आज तक राजनीतिक और संवैधानिक अस्वीकृति के घेरे में ही रखा है। छात्र आंदोलनों के साथ भी यही हुआ। उन्हें कभी देशविरोधी कहा गया, कभी भटके हुए युवा कहा गया, कभी विदेशी प्रायोजित भीड़ बताया गया। फिर भी, बार-बार यह साबित हुआ कि प्रश्न पूछने वाली पीढ़ी को देशद्रोही कहना आसान है, पर उसे अनसुना करना टिकाऊ नहीं।
सवाल सीधा है—जो मीडिया अपने ही देश की जनता को आतंकवादी, देशविरोधी या विदेशी एजेंट कहने लगे, उसे जनता “चौथा स्तंभ” क्यों माने? केवल इसीलिए कि उसके स्टूडियो चमकदार हैं? या इसलिए कि उसके पास स्क्रीन टाइम अधिक है? लोकतंत्र में स्तंभ वह नहीं होता जो सत्ता की ध्वनि बढ़ाए; स्तंभ वह होता है जो सत्ता को जनता के सामने जवाबदेह बनाए। जब मीडिया यह काम छोड़कर भीड़ को कलंकित करने लगे, तब वह सूचना-तंत्र नहीं रहता, नैरेटिव-यंत्र बन जाता है।
हालिया छात्र आंदोलन ने इस संकट को फिर उजागर किया। जंतर-मंतर, संसद मार्ग और देश के अनेक हिस्सों से उठी आवाज़ें बताती हैं कि अब नई पीढ़ी केवल भाषण सुनने नहीं, जवाब माँगने आई है। वह यह भी जानती है कि आज के युग में सूचना पर वही नियंत्रण काम नहीं करता जो कभी चलता था। एक समय था जब सुबह का अख़बार और शाम का टेलीविज़न समाचार का मुख्य स्रोत होते थे। अब हर छात्र, हर कार्यकर्ता, हर नागरिक के हाथ में मोबाइल है। वीडियो तुरंत फैलते हैं। बयान तुरंत चुनौती बनते हैं। झूठ तत्काल पकड़ा जाता है। और जो बात पहले स्टूडियो में दब जाती थी, वह अब सोशल मीडिया पर देशभर में खुलकर सामने आ जाती है।
यही कारण है कि सरकारों के लिए अब केवल आईटी सेल चलाना पर्याप्त नहीं रह गया है। सूचना-युग में तंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा उसकी पारदर्शिता है, उसकी गति नहीं। जो सरकारें प्रचार पर अत्यधिक निर्भर होती हैं, वे अस्थायी बहस तो जीत सकती हैं, लेकिन जनविश्वास नहीं जीत पातीं। प्रचार की अधिकता प्रायः इसलिए भी खतरनाक होती है, क्योंकि वह सत्ता को यह भ्रम देती है कि शोर से सत्य दब जाएगा। जबकि वास्तविकता यह है कि शोर से केवल असहमति की आवाज़ दबाई जा सकती है, सत्य नहीं।
आज की पीढ़ी सबसे पहले दो चीज़ें पहचानती है—दिखावा और दबाव। वह देखती है कि किसे मंच मिलता है और किसे नहीं। वह जानती है कि कौन-सा मीडिया संस्थान खबर दे रहा है और कौन-सा संस्थान सत्ता का बचाव लिख रहा है। वह यह भी समझती है कि जिन लोगों को कल तक “देशविरोधी” कहा जा रहा था, उन्हीं के सवालों के आगे व्यवस्था को पीछे हटना पड़ा। किसान हों, छात्र हों या नागरिक अधिकारों के पक्षधर आंदोलनकारी—भारत में अंततः झुकती वही सत्ता है जो जनता के नैतिक दबाव को अनदेखा करती है।
इसलिए अब यह प्रश्न और अधिक गंभीर हो गया है कि क्या सरकारें अभी भी मीडिया को जनमत का निर्माता मानती हैं, या केवल जनमत को नियंत्रित करने का औजार? यदि दूसरी धारणा प्रबल है, तो वह न केवल मीडिया की साख का, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा का भी क्षरण है। लोकतंत्र में मीडिया को जनता के विरुद्ध हथियार नहीं बनाया जा सकता। जो मीडिया जनता को ही संदिग्ध घोषित करने लगे, वह स्वतंत्र प्रेस नहीं, सत्ता-सापेक्ष प्रचार-तंत्र बन जाता है।
यही वह बिंदु है जहाँ सरकार को आत्मपरीक्षण करना चाहिए। यदि इस्तीफ़े सार्वजनिक असंतोष के बाद ही आते हैं, यदि दमन के आरोपों से इनकार के बाद भी प्रक्रियाएँ बदलनी पड़ती हैं, यदि आंदोलनकारियों की मांगें पहले उपहास, फिर अवमानना और अंततः स्वीकार का विषय बनती हैं, तो यह स्पष्ट है कि जनता को कमतर आँकने की रणनीति विफल हो चुकी है। जनता को आतंकवादी, देशविरोधी या विदेशी एजेंट बताने वाली भाषा अब थक चुकी है। वह न समाज को समझा पा रही है, न युवाओं को रोक पा रही है, न इतिहास से बच पा रही है।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े के साथ सत्ता को यह समझ लेना चाहिए कि केवल चेहरा बदलने से संकट समाप्त नहीं होता। आवश्यकता इस बात की है कि आईटी सेल की आक्रामकता, मीडिया पर दबाव की राजनीति और सार्वजनिक विमर्श के नियंत्रित संस्करण पर खर्च होने वाली ऊर्जा को रोका जाए। संवाद को भय से मुक्त करना होगा। मीडिया को दबाव से मुक्त करना होगा। और सबसे महत्वपूर्ण, जनता को संदिग्ध मानने की आदत छोड़नी होगी।
क्योंकि आज की जनता वही है जो मोबाइल पर देखती है, रिकॉर्ड करती है, साझा करती है, सवाल करती है और तुरंत प्रतिक्रिया देती है। अब किसी घटना को छिपाना उतना ही कठिन है जितना किसी असत्य को लंबे समय तक टिकाना। यह ज़ेन-ज़ी का युग है। यहाँ सूचना का प्रवाह तेज़ है, और औपनिवेशिक मानसिकता वाली नियंत्रण-नीति जल्दी बेनकाब हो जाती है।
युवाओं के इस आंदोलन ने यह भी बता दिया है कि किसी बड़े चैनल, किसी चमकदार एंकर, या किसी प्रायोजित नैरेटिव की अब वैसी निर्णायक ज़रूरत नहीं रही जैसी पहले थी। चैनलों की वह सर्वोच्चता टूट चुकी है, जिसमें वे खुद को जनता की चेतना का एकमात्र स्रोत समझते थे। अब सड़क, मोबाइल और सोशल मीडिया मिलकर वह काम कर रहे हैं जो पहले न्यूज़रूम अपने एकाधिकार में करता था। इसलिए मीडिया यदि आज भी जनता को ही अपराधी बताएगा, तो जनता उसे चौथा स्तंभ नहीं, सत्ता का मुखपत्र मानेगी। और जो संस्थान जनता का विश्वास खो दे, वह शीर्षक अवश्य चलाता रह सकता है, पर इतिहास नहीं लिखता।
"जब मीडिया जनता को ही देशविरोधी कहने लगे, तब लोकतंत्र को मीडिया की नहीं, उसकी साख की जाँच करनी चाहिए।"
