इथेनॉल क्रांति का वैज्ञानिक सच, आर्थिक विसंगतियां और हितों के टकराव का यक्ष प्रश्न

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 

इथेनॉल क्रांति का वैज्ञानिक सच, आर्थिक विसंगतियां और हितों के टकराव का यक्ष प्रश्न

परिवहन क्षेत्र में वैकल्पिक ईंधन की खोज केवल तकनीकी प्रगति का विषय नहीं है, बल्कि यह देश के आर्थिक स्वावलंबन, पर्यावरण नीति और आम नागरिक के जीवन से सीधा जुड़ा मसला है। केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी द्वारा ई-100 (100% इथेनॉल) से चलने वाले वाहनों को कानूनी मंजूरी देने वाली फाइल पर हस्ताक्षर करना और ऑटोमोबाइल कंपनियों (टोयोटा, सुजुकी, हुंडई) द्वारा फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां उतारने का दावा करना पहली नजर में एक बड़ी पर्यावरण-अनुकूल 'क्रांति' जैसा दिखता है।

लेकिन जब हम इस पूरे विमर्श को जनहित, राष्ट्रहित, विज्ञान और राजनीतिक शुचिता की कसौटी पर कसते हैं, तो इस चमकती हुई तस्वीर के पीछे छिपी तकनीकी पेचीदगियां, मानसिक परेशानियां और 'हितों के टकराव' (Conflict of Interest) के गंभीर सवाल व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करते हैं।


1. तकनीकी और वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य: क्या विज्ञान राजनीति के दबाव में झुकेगा?


राजनीति में जांच एजेंसियों (ED-CBI) के दबाव से समीकरण बदले जा सकते हैं, लेकिन विज्ञान अपनी प्रकृति और नियमों में अटल रहता है। वह किसी राजनीतिक हठधर्मिता या धमकी से नहीं बदलता।


* गंगा-यमुना का पानी और ईंधन का विज्ञान: यह उपमा सटीक है कि जबरन मिलाई गई चीजें अपना मूल चरित्र नहीं छोड़तीं। पेट्रोल की जगह 100% इथेनॉल का उपयोग करना कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे किसी संवेदनशील मशीन में उसकी बनावट के विपरीत कोई दूसरा तरल डाल दिया जाए।

* कैलोरी मान (Calorific Value) का संकट: वैज्ञानिक तथ्य यह है कि इथेनॉल का ऊर्जा घनत्व (Energy Density) पेट्रोल की तुलना में लगभग 30-33% कम होता है। इसका सीधा मतलब यह है कि 100% इथेनॉल पर चलने वाली गाड़ी पेट्रोल के मुकाबले "कम माइलेज" देगी।

* इंजन की उम्र और रखरखाव: इथेनॉल प्रकृति में 'हाइग्रोस्कोपिक' (Hygroscopic) होता है, यानी यह हवा से नमी (पानी) सोखता है। यह इंजन के भीतर जंग (Corrosion) और प्लास्टिक/रबर के पार्ट्स को गलाने का काम करता है। कंपनियों के लिए 'फ्लेक्स-फ्यूल' इंजन बनाना एक चुनौती है, और आम नागरिक के लिए इसका रखरखाव एक निरंतर मानसिक और आर्थिक तनाव का कारण बनेगा।


2. आर्थिक और उपभोक्ता की मानसिक परेशानी: असमंजस का चक्रव्यूह


आज का भारतीय उपभोक्ता ईंधन के विकल्पों के चक्रव्यूह में फंसा हुआ है। बाजार में पेट्रोल, डीजल, सीएनजी, इलेक्ट्रिक वाहन (EV), हाइब्रिड और अब ई-20 से लेकर ई-100 तक की लाइन लगा दी गई है।


* नीतियों में निरंतर अस्थिरता: उपभोक्ता आज असमंजस और मानसिक परेशानी के दौर से गुजर रहा है। उसने जो गाड़ी 5 साल पहले खरीदी थी, क्या वह ई-20 या ई-100 के दौर में कबाड़ (Scrap) हो जाएगी? क्या सरकार की नीतियां इतनी तेजी से बदलेंगी कि आम आदमी की गाढ़ी कमाई से खरीदी गई संपत्ति रातों-रात अप्रासंगिक हो जाए?

* वर्क फ्रॉम होम और बदलती जरूरतें: आधुनिक युग में जब 'वर्क फ्रॉम होम' और डिजिटल कनेक्टिविटी ने परिवहन की भौतिक निर्भरता को कम किया है, तब ईंधन के नए-नए प्रयोगों को जबरन थोपने की टाइमिंग पर सवाल उठना लाजिमी है।


3. राजनैतिक परिप्रेक्ष्य और हितों का टकराव: 'बेटा बढ़ाओ' बनाम 'पूंजी का एकाधिकार'


इस पूरे इथेनॉल विमर्श का सबसे संवेदनशील और गंभीर पहलू राजनैतिक शुचिता और पारदर्शिता से जुड़ा है। जब देश की नीति बनाने वाले शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति के परिवार या सगे-संबंधी उसी व्यवसाय से सीधे तौर पर जुड़ जाते हैं, जिसे सरकारी नीतियों के जरिए बढ़ावा दिया जा रहा हो, तो लोकतंत्र की अंतरात्मा कांप उठती है।


(१)

* राजनीतिक दावा और प्रशासनिक बचाव : "मंत्रालय का पल्ला झाड़ना: मंत्री जी का यह कहना कि पेट्रोल में इथेनॉल मिलाना पेट्रोलियम मंत्रालय (हरदीप सिंह पुरी) का काम है, उनका नहीं।" 

* जनता के सवाल और नैतिक सच : "नीतिगत अंतर्विरोध: गाड़ियों को 100% इथेनॉल अनुकूल (E-100) बनाने की कानूनी फाइल पर हस्ताक्षर खुद परिवहन मंत्री करते हैं, जो सीधे तौर पर इस ईंधन की मांग (Demand) को बाजार में अनिवार्य बनाता है।"

(२)

* राजनीतिक दावा और प्रशासनिक बचाव : "0.07% हिस्सेदारी का तर्क: यह दावा करना कि व्यवसाय में निजी हित मात्र 0.07 प्रतिशत ही है।" | 

* जनता के सवाल और नैतिक सच : "मूल्य का सवाल: भले ही प्रतिशत छोटा हो, लेकिन जब टर्नओवर हजारों करोड़ का हो, तो वह 0.07% भी 50 से 100 करोड़ रुपये की भारी-भरकम पूंजी बन जाता है।"

(३)

* राजनीतिक दावा और प्रशासनिक बचाव : "मुकदमे और मानहानि की धमकी: आंकड़ों को गलत बताकर मीडिया या सवाल उठाने वालों पर मानहानि का केस करने की चेतावनी।" 

* जनता के सवाल और नैतिक सच : "शक्ति का दुरुपयोग: लोकतंत्र में जनता और विपक्ष का अधिकार है कि वे सत्ता से सवाल पूछें। मुकदमे की धमकी देना पारदर्शी शासन का लक्षण नहीं, बल्कि सत्ता के अहंकार और असहिष्णुता का प्रतीक है।"

# यक्ष प्रश्न: यदि आंकड़े गलत हैं, तो सही आंकड़े क्या हैं? देश के परिवहन मंत्री को स्वयं सामने आकर अपने और अपने परिवार के इथेनॉल उद्योग में वित्तीय हितों (Shareholding) का श्वेत पत्र (White Paper) सार्वजनिक करना चाहिए। गोपनीयता और मुकदमों की आड़ में अटकलों को दबाया नहीं जा सकता।

## जनहित की कसौटी पर नीति का मूल्यांकन

तेल आयात की निर्भरता कम करना और प्रदूषण घटाना राष्ट्रहित में बेहद जरूरी कदम हैं, और इस दिशा में नितिन गडकरी के प्रयास सराहनीय हो सकते हैं। लेकिन, राष्ट्रहित की इस सुंदर आड़ में 'क्रोनी कैपिटलिज्म' (साठगांठ वाली पूंजीवादी व्यवस्था) या पारिवारिक हितों को साधने की अनुमति किसी भी पारदर्शी लोकतंत्र में नहीं दी जा सकती।

नीतियों का निर्धारण विज्ञान के नियमों, जनता की जेब की क्षमता और पूर्ण राजनैतिक शुचिता के आधार पर होना चाहिए, न कि किसी खास उद्योग या परिवार को फायदा पहुंचाने के लिए। जब तक इस मामले में पूर्ण पारदर्शिता नहीं बरती जाएगी, तब तक 'इथेनॉल क्रांति' पर संदेह के बादल मंडराते रहेंगे।

"ईंधन में इथेनॉल का मिश्रण यदि पर्यावरण सुधार की नीयत है, तो नीतियों में पारदर्शिता और हितों का त्याग ही इसकी असली शुचिता की कसौटी है।"