जब मीडिया शोर बन जाए और पत्रकारिता चुप
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
जब मीडिया शोर बन जाए और पत्रकारिता चुप
भारत का मेनस्ट्रीम मीडिया आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ सबसे बड़ा संकट खबरों का नहीं, भरोसे का है। पिछले आठ-दस वर्षों में बड़ी संख्या में न्यूज़रूमों ने पत्रकारिता को लोकतंत्र की आँख बनाने के बजाय सत्ता के सामने झुकता हुआ एक प्रचार-तंत्र बना दिया। सवाल पूछना कमज़ोरी माना जाने लगा, बहसें जयकार में बदल गईं, और सत्ता की नाकामी पर पड़ने वाली रोशनी को धुंधला करने का काम ही कई चैनलों की पहचान बन गया। यही वह क्षण था जब पत्रकारिता की आत्मा नहीं, उसका विवेक घायल हुआ।
यह पतन अचानक नहीं आया। यह धीरे-धीरे हुआ। पहले स्टिंग ऑपरेशन कम हुए, फिर खोजी पत्रकारिता को “महँगा” और “जोखिमभरा” कहकर हाशिये पर डाल दिया गया। फिर सत्ता से दूरी को “एप्रोच की कमी” माना जाने लगा। उसके बाद टीआरपी की दौड़ ने खबर को सूचना से निकालकर तमाशे में बदल दिया। महंगाई, बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण संकट, किसान, मज़दूर, दलित, महिलाएँ और छोटे कस्बों की पीड़ा—इन सबको हटाकर स्टूडियो की चीख-पुकार ही “प्राइम टाइम” बन गई। जब मीडिया ने सत्ता से सवाल पूछना छोड़ दिया, तब उसने अपनी लोकतांत्रिक भूमिका भी छोड़ दी।
इस गिरावट के लिए सड़क पर खड़ा रिपोर्टर ज़िम्मेदार नहीं है। वह अक्सर एक आदेशपालक कर्मचारी की तरह काम करता है—उसकी नौकरी, उसका परिवार, उसकी असुरक्षा, उसका करियर, सब कुछ उसी संस्थान पर निर्भर होता है जिसमें निर्णय कहीं ऊपर लिए जाते हैं। असली ज़िम्मेदारी उन लोगों की है जो ऊँची कुर्सियों पर बैठकर तय करते हैं कि देश क्या देखेगा, क्या नहीं देखेगा; किसे पूछताछ का अधिकार है और किसे प्रशंसा का। करोड़ों के वेतन, सत्ता के गलियारों तक आसान पहुँच और एयर-कंडीशन्ड न्यूज़रूमों में बैठकर उन्होंने पत्रकारिता को चौथा स्तंभ नहीं रहने दिया, बल्कि उसे सत्तानुकूल प्रचार का औजार बना दिया।
यही वजह है कि जनता का भरोसा टूटा है। और यह भरोसा अचानक नहीं टूटा; इसे बार-बार चोट पहुँचाई गई। जब जनता महंगाई से जूझ रही थी, तब बहसें दूसरी थीं। जब बेरोज़गारी बढ़ रही थी, तब चैनलों पर दूसरे नैरेटिव चल रहे थे। जब शिक्षा तंत्र लड़खड़ा रहा था, तब भी कई न्यूज़रूम अपने एजेंडे में व्यस्त थे। जब सत्य की जगह स्पॉन्सर्ड नैरेटिव, प्रायोजित बहसें और चयनित चुप्पियाँ हावी हो जाती हैं, तब लोग समझ जाते हैं कि मीडिया सूचना नहीं, सुविधा बेच रहा है।
पत्रकारिता और मीडिया एक नहीं हैं। मीडिया माध्यम है, मंच है, तकनीक है; पत्रकारिता एक मूल्य है, एक अनुशासन है, एक सार्वजनिक नैतिकता है। मीडिया व्यवसाय हो सकता है, लेकिन पत्रकारिता का धर्म सत्य की खोज, सत्ता की निगरानी और जनता की आवाज़ बनना है। जब मंच, मूल्य पर हावी हो जाए, तब भीड़ बचती है, विवेक नहीं। जब माध्यम, धर्म को निगल ले, तब खबर रह जाती है, पत्रकारिता नहीं।
आज हर कोई मीडिया बनना चाहता है। किसी के हाथ में कैमरा है, किसी के पास माइक्रोफोन, किसी के पास यूट्यूब चैनल, किसी के पास सोशल मीडिया फॉलोइंग। यह लोकतंत्र के लिए ख़तरा नहीं, तब तक नहीं जब तक वह सत्यनिष्ठ हो। समस्या तब होती है जब हर व्यक्ति खुद को पत्रकार समझने लगे, लेकिन पत्रकारिता की जिम्मेदारी, प्रशिक्षण और नैतिक अनुशासन से दूर रहे। तभी फेक न्यूज़, अधूरी सूचना, एकतरफा नैरेटिव और प्रायोजित पक्षधरता का जाल फैलता है। शोर बढ़ता है, संवाद घटता है। सूचना फैलती है, समझ नहीं।
पत्रकार का काम सिर्फ खबर देना नहीं, समाज के विवेक को दिशा देना भी है। वह सिर्फ घटनाओं का वर्णनकर्ता नहीं, लोकतंत्र का सजग प्रहरी है। यदि वह सत्ता की ओर झुक जाए तो जनतंत्र कमजोर पड़ता है। यदि वह जनता से कट जाए तो प्रासंगिकता खो देता है। और यदि वह केवल मालिक, विज्ञापनदाता या राजनीतिक संरक्षक की भाषा बोलने लगे तो उसकी विश्वसनीयता अपने आप खत्म हो जाती है। सम्मान छीना नहीं जाता, कमाया जाता है। पत्रकारिता ने यह सम्मान दशकों की मेहनत, जोखिम और संघर्ष से अर्जित किया था; और यदि वह आज टूट रहा है, तो कारण केवल बाहर नहीं, भीतर भी हैं।
कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि पत्रकारों को धमकियाँ मिलती हैं, दबाव होता है, इसलिए वे मजबूर हैं। यह सच है कि कई पत्रकार संस्थागत दबावों के भीतर काम करते हैं। लेकिन यह भी सच है कि न्यूज़रूम के शीर्ष स्तर पर बैठे कई लोग केवल मजबूर नहीं, सुविधाभोगी भी हो गए हैं। उनका सवालों से दूर रहना रणनीति बन गया है, और सत्ता के साथ सहजता व्यवसाय मॉडल। यही वह बीमारी है जिसने पत्रकारिता को “सूचना” से हटाकर “इमेज मैनेजमेंट” में बदल दिया।
फिर भी, यह पूरा परिदृश्य निराशाजनक होते हुए भी पूरी तरह अंधेरा नहीं है। देश के कई हिस्सों में, छोटे कस्बों में, गाँवों में, सीमित संसाधनों के बावजूद कुछ पत्रकार आज भी वही जोखिम उठा रहे हैं जो पत्रकारिता की असली पहचान है। वे खेत, मज़दूर, स्कूल, अस्पताल, पंचायत, थाने और न्याय की दरारों में जाकर काम कर रहे हैं। वे चिल्लाते नहीं, लेकिन तथ्य लाते हैं। वे प्रचार नहीं करते, वे साक्ष्य जुटाते हैं। पत्रकारिता की जीवित आत्मा अब भी वहीं है।
समाज को भी अब समझना होगा कि मीडिया और पत्रकारिता एक नहीं हैं। मीडिया मंच है, व्यवसाय है, प्रदर्शन है; पत्रकारिता जिम्मेदारी है, प्रश्न है, सच्चाई है। दोनों को गड्डमड्ड कर देने से लोकतंत्र कमजोर होगा। हमें उन पत्रकारों को पहचानना होगा जो खबर को सेवा मानते हैं, और उन मीडिया संस्थानों को भी जो खबर को सौदा बना चुके हैं। यही विभाजन स्पष्ट होगा, तभी जनता सही स्रोत चुन पाएगी, और तभी पत्रकारिता अपने वास्तविक स्वरूप में लौट सकेगी।
आज जरूरत किसी भाषण की नहीं, आत्ममंथन की है। न्यूज़रूम को पूछना होगा कि वे किनके लिए काम कर रहे हैं—जनता के लिए या सत्ता के लिए? पत्रकार को पूछना होगा कि वह सवाल पूछ रहा है या आदेश लिख रहा है? समाज को पूछना होगा कि वह खबर देख रहा है या नैरेटिव खरीद रहा है? और लोकतंत्र को पूछना होगा कि क्या उसका चौथा स्तंभ अब भी खड़ा है, या केवल नाम भर रह गया है?
यदि आज आत्ममंथन नहीं हुआ, तो इतिहास यही लिखेगा कि पत्रकारिता मरी नहीं थी—उसे उसके अपने संरक्षकों, अपने मालिकों और अपने ही लालच ने धीरे-धीरे खत्म कर दिया। लेकिन यदि साहस से सुधार शुरू हुआ, तो पत्रकारिता फिर उठ सकती है। क्योंकि पत्रकारिता की ताकत तकनीक में नहीं, रीढ़ में होती है। और जिस दिन रीढ़ बच गई, उस दिन लोकतंत्र भी बच जाएगा।
"मीडिया मंच है; पत्रकारिता धर्म है। मंच बिक सकता है, लेकिन धर्म बचा रहना चाहिए—वरना लोकतंत्र की साँसें थमने लगती हैं।"
