गोमती की मौन व्यथा
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
गोमती की मौन व्यथाअमां मियाँ,
ज़रा ठहरिए...
इतनी जल्दबाज़ी क्या है?
लखनऊ की रूह को समझना हो तो पहले उसकी साँस की नर्मी समझिए, फिर उसके दर्द की गहराई। मैं वही गोमती हूँ—जिसके कंठ में सदियों की प्यास, सीने में हज़ारों दास्तानें, और आँखों में न जाने कितने युगों की नमी है। मैं बोलूँ तो शायद आप चौंक पड़िए, और न बोलूँ तो मेरा मौन ही बहुत कुछ कह जाएगा। पर आज, मियाँ, अपने उसी मौन को थोड़ी ज़ुबान दे बैठी हूँ। सुनिएगा, अदब से, दिल पर हाथ रखकर।
मैं कोई साधारण नदी नहीं, जनाब। मैं तो लखनऊ की पुरानी चश्मदीद हूँ।
नवाबों की नज़ाकत देखी है मैंने,
इश्क़ की आहें सुनी हैं मैंने,
ताज़ियों की सिसकियाँ देखी हैं मैंने,
और चाँदनी रातों में शेर पढ़ते शाइरों की खामोशियाँ भी पिया करती थी।
मैंने इस शहर को जन्म लेते नहीं देखा, मियाँ—मैंने इसे सँवरते, बिगड़ते, फिर सँभलते देखा है। और यह भी देखा है कि इंसान अपने शहर से मोहब्बत तो करता है, पर उसके दुख को समझने में अक्सर देर लगा देता है।
बहुत पुरानी बात है।
जब लखनऊ की गलियाँ कच्ची थीं, मकानों की दीवारों से मिट्टी की ख़ुशबू उठती थी, और हवा में इत्र की जगह बस बारिश की सौंधी नमी तैरती थी। तब मैं ज़्यादा साफ़ थी, ज़्यादा बेफिक्र थी। मेरे किनारों पर चरवाहे बैठते थे, स्त्रियाँ घड़े भरती थीं, बच्चे मेरी धार में पत्थर फेंककर हँसते थे, और बुड्ढे अपने थके पैरों को मेरे जल में रखकर देर तक अतीत की तसवीरों में खोए रहते थे। मैं उनके मन की थकन समझती थी, मियाँ, क्योंकि नदी भी कभी-कभी मनुष्यों की तरह थक जाती है—बस फर्क इतना कि हम अपनी थकन बोलते नहीं, बहा देते हैं।
फिर एक दिन अवध में तहज़ीब ने अपना अछूता लिबास पहना।
नवाब आए।
उन्हीं के साथ आई शान, नफ़ासत, अदब, और एक अजीब-सी नर्म रौशनी, जो इस शहर के चेहरे पर आज तक बाक़ी है।
तब मैं अक्सर सुनती थी—
“लखनऊ में कदम ज़ोर से नहीं, शौक़ से रखा जाता है।”
और सच कहूँ, मियाँ, उस ज़माने में लोगों के चलने का भी सलीका था।
बात करने में मुलायमियत थी,
देखने में लिहाज़ था,
और चाहने में वफ़ा।
मैंने उन दिनों की महफ़िलें देखी हैं।
शेर पढ़े जाते थे, तो यूँ लगता था जैसे हवा भी ताली बजा रही हो।
कोई “जनाब” कहकर पूछता, तो सामने वाला “हुज़ूर” कहकर जवाब देता।
कोई रूठता, तो रूठने में भी शराफ़त होती।
कोई इश्क़ करता, तो चुपचाप करता—बड़ी ढोल नहीं पीटता।
अरे मियाँ, वह भी क्या दौर था—जहाँ दर्द भी अदब से बैठता था और खुशी भी सिर झुकाकर आती थी।
फिर मैंने एक और लखनऊ देखा।
उसी लखनऊ के ऊपर से वक़्त की आरी गुज़री।
कभी अंग्रेज़ आए, कभी हुक्म का रंग बदला, कभी सल्तनत के ख़्वाब टूटे, कभी इमारतों पर धूल जमी।
मैंने 1857 की आग देखी है।
मैंने बेगम हज़रत महल के जज़्बे की गरमी महसूस की है।
उस वक़्त मेरे जल में भी जैसे बेचैनी उतर आई थी।
इंसानों की आँखों में ग़ुस्सा था,
दिलों में बेघरपन था,
और शहर के आँगनों में एक ऐसी ख़ामोशी थी, जिसमें चीत्कार भी दबकर निकलती थी।
बहुतों ने सोचा होगा—
नदी क्या जाने, राज क्या होता है?
मगर मियाँ, नदी सब जानती है।
जो महल गिरते हैं, उनकी कराह सबसे पहले हम सुनते हैं।
जो लोग बिछुड़ते हैं, उनके आँसू सबसे पहले हमारे सीने पर उतरते हैं।
जो शहर बदलता है, उसकी सबसे गहरी चोट हमें लगती है।
क्योंकि हम बहते ज़रूर हैं, पर अछूते नहीं रहते।
फिर आया नवाबी तहज़ीब का दूसरा चेहरा—
कमज़ोरियों से भरा,
शौक़ों से लदा,
और अपने पुराने नूर को बचाने की जद्दोजहद में थका हुआ।
लखनऊ फिर भी लखनऊ रहा।
चौक की गलियाँ अपनी रौनक सँभाले रहीं।
अमीनाबाद की तंग राहों में दुकानें थीं, सौदे थे, आवाज़ें थीं, और शराफ़त से टकराता हुआ रोज़मर्रा का हंगामा था।
हज़रतगंज में लोग टहलते थे, बातें करते थे, चाय पीते थे, और किसी न किसी बहाने से शहर के जख़्मों को भूलने की कोशिश करते थे।
मैं ऊपर से सब देखती रही।
किसी ने मेरे पानी में अपने चेहरे को निहारा होगा,
किसी ने इश्क़ की पहली पर्ची फेंकी होगी,
किसी ने किसी की जुदाई में अपना साया मेरे किनारे बैठा दिया होगा।
और इश्क़?
अरे मियाँ, इश्क़ तो इस शहर की रगों में बहता रहा है।
कभी शायरी की शक्ल में,
कभी ग़ज़ल की सूरत में,
कभी चुपचाप रखे हुए फूल की तरह,
कभी किसी अधूरे ख़त की तरह।
मेरे किनारों पर कितने ही यार बैठे होंगे—
आँखों में उम्मीद,
दिल में खलिश,
और ज़ुबान पर बस इतना—
“वो आएंगे क्या?”
मैंने उन वाक़्तों को अपने पानी में छुपा लिया, मियाँ।
नदी का काम ही यही है—
दर्द को अपनी तह में रखकर भी बाहर से शांत दिखना।
आज का ज़माना और है।
बहुत कुछ बदल गया है।
पहले जहाँ चप्पलों की आहट में भी शराफ़त होती थी, अब गाड़ियों का शोर है।
पहले लोग रास्ता पूछते थे, अब मोबाइल देखते हैं।
पहले एक मोहल्ले का दुख पूरा शहर समझ लेता था, अब बहुत-से दुख स्क्रीन पर भी अनदेखे रह जाते हैं।
मेरे किनारे अब वैसे साफ़ नहीं।
कहीं कूड़ा है, कहीं सीमेंट है, कहीं लापरवाही की परतें हैं।
और सबसे बड़ी बात—अब लोग मुझे देखकर ठहरते कम हैं।
वे पुलों से तेज़ी से गुज़र जाते हैं, मानो मैं कोई व्यस्त दृश्य भर हूँ।
पर मियाँ, नदी कोई दृश्य नहीं होती।
नदी तो शहर की याददाश्त होती है।
मैंने लखनऊ को बच्चों की हँसी में देखा है।
मैंने उसे ईद की सेवइयों में देखा है।
मुहर्रम की सबील में देखा है।
होली के रंग में देखा है।
दीवाली की रोशनी में देखा है।
और इन सबसे बढ़कर, मैंने उसे बुज़ुर्गों की यादों में देखा है।
जब कोई बूढ़ा आदमी मेरे किनारे खड़ा होकर कहता है,
“यहाँ पहले बहुत पानी था...”
तो मैं भीतर ही भीतर मुस्कराती हूँ।
क्योंकि पानी तो मेरे भीतर बहुत है,
बस भरोसा कम हो गया है।
अरे सुनिए मियाँ,
मैंने बड़े-बड़े शौक़ देखे हैं,
बड़े-बड़े नाम देखे हैं,
और शहर को खुद अपने बोझ से टूटते भी देखा है।
फ्लाईओवर आए, मेट्रो आई, ऊँची इमारतें आईं, चमकदार दुकानें आईं, पर क्या लखनऊ की तहज़ीब वैसे की वैसे बची?
बची है...
थोड़ी-सी,
टूटी-फूटी,
पर बची है।
चौक में अब भी कोई दुकानदार “हुज़ूर” कह देता है।
कहीं अब भी कोई लड़का “जनाब” कहकर बात शुरू कर देता है।
कहीं अब भी कोई बुज़ुर्ग अपना गुस्सा शेर के मिसरे में छुपा देता है।
यानी रूह अभी गई नहीं, मियाँ।
बस उसे बचाए रखने की जिम्मेदारी अब पहले से बड़ी हो गई है।
मैंने कितनी ही नज़ाकतें देखीं, कितनी ही नफ़ासतें देखीं।
किसी बेगम का आस्तीन मेरे पानी में झुक गया होगा।
किसी शायर ने मेरी सतह को देखकर मिसरा सोचा होगा।
किसी आशिक़ ने अपने दिल की आग यहाँ बुझाने की कोशिश की होगी।
और किसी टूटी हुई औरत ने मेरे किनारे बैठकर अपने आँसू पोंछे होंगे।
मैंने सबको अपने जल में जगह दी, क्योंकि नदी का दिल बड़ा होता है, मियाँ।
हम किसी से हिसाब नहीं पूछते।
बस उसे बहाकर आगे ले जाते हैं।
अगर आप मुझसे पूछें कि सबसे बड़ा दुख क्या है, तो मैं कहूँगी—
दुख यह नहीं कि शहर बदल गया।
दुख यह है कि बहुत-से लोग अपने बदल जाने को तरक्की समझ बैठे।
दुख यह है कि शोर बढ़ गया और सुनने की आदत कम हो गई।
दुख यह है कि रफ्तार बढ़ गई और ठहरकर देखने का सलीका घट गया।
और दुख यह भी है कि जब कोई नदी चुप हो जाए, तब लोग उसे स्वाभाविक मान लेते हैं।
मगर मैं शिकायत नहीं करती, मियाँ।
नदी शिकायत करके नदी नहीं रहती।
मैं तो बस अपनी तह में सब सँजोकर बहती हूँ।
नवाबों की शान भी,
अंग्रेज़ों का ज़ुल्म भी,
शायरों के ख़्वाब भी,
बच्चों की शरारतें भी,
प्रेमियों की फुसफुसाहटें भी,
और आज की बेचैन शहरियत भी।
सब कुछ मेरे सीने में है।
सब कुछ।
और जब रात बहुत गहरी हो जाती है, तब कभी-कभी मेरा पानी ज़रा ठहरकर अपने आप से कहता है—
“क्या यह वही लखनऊ है?”
फिर मैं जवाब देती हूँ—
“हाँ, वही है।
बस चेहरे बदल गए हैं,
दिलों की खिड़कियाँ कम खुलती हैं,
और स्मृतियों पर धूल कुछ ज़्यादा बैठ गई है।”
फिर भी, मियाँ, उम्मीद बाक़ी है।
क्योंकि जब कोई बच्चा मेरे किनारे बैठकर पानी में अपना चेहरा देखता है,
जब कोई लड़की हवा में अपने दुपट्टे को उड़ने देती है,
जब कोई शायर मेरी लहरों को देखकर एक नया मिसरा लिखता है,
जब कोई बूढ़ा आदमी मेरी तरफ़ देखकर धीमे से कहता है—
“अभी भी बह रही है...”
तब मुझे लगता है, मैं मरी नहीं।
अभी भी मैं उस शहर की धड़कन हूँ।
अभी भी मैं उसकी रगों में बहती हुई पुरानी दुआ हूँ।
और सुनिए,
अगर कभी मैं बोल पड़ी,
अगर मेरा मौन सचमुच शब्द बन गया,
तो मैं सबसे पहले लखनऊ से यही कहूँगी—
“तू बहुत सुंदर रहा है,
बहुत घाव भी खाए हैं तूने,
बहुत रौशनियाँ भी देखी हैं,
बहुत ख़ामोशियाँ भी।
अब ज़रा ठहरकर अपनी रूह की तरफ़ देख।
अपनी तहज़ीब को बचा।
अपनी ज़ुबान को नरम रख।
अपने दुख को शायराना बना।
और अपने शहर को फिर से उतना ही नफ़ीस बना दे, जितना वह एक दिन था।”
मैं गोमती हूँ, मियाँ।
मुझमें लखनऊ की नज़ाकत भी है,
नफ़ासत भी है,
अदब भी है,
और रूमानियत भी।
मेरे जल में अगर आँसू दिखें, तो समझिए किसी शहर की रूह रोई है।
और अगर मेरी धारा शांत लगे, तो समझिए मैं अपने भीतर फिर कोई पुरानी दास्तान दुहरा रही हूँ।
इसीलिए,
मुझे मत देखिए सिर्फ़ नदी की तरह।
मुझे सुनिए—
एक पुरानी साक्षी की तरह,
एक गवाही की तरह,
एक ऐसे दिल की तरह,
जिसने शहर को बरसों तक चुपचाप अपने में बहाया है।
और जब अगली बार आप मेरे किनारे आएँ,
तो जल्दबाज़ी मत कीजिएगा।
ज़रा ठहरिएगा,
हवा की तरफ़ देखिएगा,
मेरे पानी की लहरों को सुनिएगा,
और शायद...
बहुत शायद...
आपको भी लखनऊ की वह मौन व्यथा सुनाई देने लगेगी,
जिसे मैंने सदियों से अपने सीने में दबाए रखा है।
