प्रतिशोध का बुलडोज़र और ढहती शैक्षणिक संस्थाएं: कानून के राज बनाम 'सिलेक्टिव जस्टिस' का संकट
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
प्रतिशोध का बुलडोज़र और ढहती शैक्षणिक संस्थाएं: कानून के राज बनाम 'सिलेक्टिव जस्टिस' का संकट
"जब क़ानून की इमारत को ढहाने के लिए बुलडोज़र को न्याय का पर्याय मान लिया जाए, तो केवल ईंट-गारे के ढांचे नहीं गिरते, बल्कि लोकतान्त्रिक गरिमा, संवैधानिक प्रक्रिया और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य मलबे में तब्दील हो जाता है।"
उत्तर प्रदेश के रामपुर में स्थित मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय परिसर के ३८ भवनों को ध्वस्त करने का हालिया प्रशासनिक आदेश केवल एक ढांचागत कार्रवाई नहीं है। यह हमारे समय की उस गंभीर राजनैतिक और विधिक विसंगति का ज्वलंत दस्तावेज़ है, जहाँ प्रशासनिक शक्तियों का इस्तेमाल कानून के शासन (Rule of Law) को स्थापित करने के बजाय 'बुलडोज़र न्याय' के लोकलुभावन और प्रतिशोधात्मक प्रदर्शन के लिए किया जा रहा है। रामपुर विकास प्राधिकरण (RDA) द्वारा उत्तर प्रदेश नगर नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 की धारा 27(1) के तहत जारी यह आदेश देश के राजनैतिक, शैक्षणिक, सामाजिक, संवैधानिक और विधिक ताने-बाने पर कई तीखे सवाल खड़े करता है।
१. राजनैतिक दृष्टिकोण: प्रतिशोध की राजनीति और चुनिंदा निशाना (Selective Targeting)
इस समूचे मामले की जड़ें उत्तर प्रदेश की कटु राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता से गहराई से जुड़ी हैं। समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता आजम खान द्वारा २००६ में स्थापित और २०१२ में उद्घाटित यह विश्वविद्यालय २०१७ में सत्ता परिवर्तन के बाद से ही निरंतर सत्ता के निशाने पर रहा है।
* प्रतिशोध की बू: एक जीवंत लोकतंत्र में राजनैतिक दलों के बीच वैचारिक मतभेद स्वाभाविक हैं, परंतु जब राज्य की मशीनरी का इस्तेमाल किसी राजनेता के 'विरासत' (Legacy) को नेस्तनाबूद करने के लिए किया जाने लगे, तो वह कानून का राज नहीं, बल्कि राजनैतिक प्रतिशोध की पराकाष्ठा बन जाती है।
* समानता के सिद्धांत का उल्लंघन: उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश में लाखों ऐसे निर्माण हैं जो बिना स्वीकृत नक्शे या आंशिक अनियमितताओं के साथ खड़े हैं। प्रश्न यह उठता है कि क्या प्रशासन उसी तत्परता और कठोरता से अन्य रसूखदार अवैध निर्माणों पर भी बुलडोज़र चलाता है? जब चयनात्मक तरीके से किसी खास नाम या विचारधारा से जुड़े संस्थान को निशाना बनाया जाता है, तो राज्य की निष्पक्षता पूरी तरह संदिग्ध हो जाती है।
२. विधिक एवं संवैधानिक दृष्टिकोण: प्राकृतिक न्याय और मनमाना प्रशासनिक रवैया
संवैधानिक मर्यादाओं और स्थापित विधिक सिद्धांतों की कसौटी पर यह ध्वस्तीकरण आदेश अत्यंत कमज़ोर और मनमाना प्रतीत होता है।
## प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) की अनदेखी
विश्वविद्यालय प्रशासन की यह दलील बेहद तार्किक है कि संबंधित ग्राम सिंगनखेड़ा २७ सितंबर २०२४ से पहले रामपुर विकास प्राधिकरण (RDA) के अधिकार क्षेत्र में शामिल ही नहीं था। ऐसे में दशकों पुराने निर्माणों पर आज के नियमों को पूर्वव्यापी (Retrospective) प्रभाव से लागू करके उन्हें अवैध घोषित करना विधिक सिद्धांतों के अनुकूल नहीं है।
# प्राकृतिक न्याय के नियम :
* अल्ट्रा वायर्स (Ultra Vires): अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई करना अवैध हैं।
* आनुपातिकता का सिद्धांत: अपराध और सजा के बीच संतुलन। सीधे तोड़फोड़ अंतिम विकल्प हो।
## संवैधानिक प्रावधानों और सर्वोच्च न्यायालय के रुख की अवहेलना
भारतीय संविधान का अनुच्छेद १४ (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद २१ (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, जिसमें आश्रय और आजीविका भी शामिल है) राज्य को मनमानी कार्रवाई करने से रोकता है।
* वैकल्पिक विधिक उपाय: कानूनन किसी भी अवैध निर्माण के मामले में सीधे तोड़फोड़ पहला विकल्प नहीं होता। 'कंपाउंडिंग' (शमन शुल्क या जुर्माना लेकर नियमित करना), संरचना को राज्य के नियंत्रण में लेना या आंशिक संशोधनों के निर्देश देना जैसे कई सुधारात्मक उपाय मौजूद थे। परंतु, इन विकल्पों को दरकिनार कर सीधे विध्वंस का मार्ग चुनना प्रशासनिक हठधर्मिता को दर्शाता है।
* अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण: यदि निर्माण के समय संबंधित स्थानीय निकाय (जैसे ग्राम पंचायत या जिला परिषद) से अनुमति ली गई थी, तो आरडीए द्वारा बाद में सीमा विस्तार के आधार पर उसे ध्वस्त करना क्षेत्राधिकार के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत है।
३. शैक्षणिक दृष्टिकोण: ज्ञान के मंदिरों पर आघात और राष्ट्रीय क्षति
एक ऐसे देश में जहाँ आज भी उच्च शिक्षा की सकल नामांकन दर (GER) वैश्विक मानकों से काफी पीछे है, ढाई हज़ार से अधिक छात्र-छात्राओं वाले एक क्रियाशील विश्वविद्यालय को मलबे में बदलने की ज़िद आत्मघाती है।
* विद्यार्थियों का भविष्य दांव पर: मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय केवल कंक्रीट की इमारत नहीं है। यहाँ बी.टेक से लेकर नर्सिंग डिप्लोमा तक के व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इन छात्रों का क्या कसूर है? शैक्षणिक भवनों, प्रयोगशालाओं और पुस्तकालयों को ध्वस्त करने से उत्पन्न होने वाला शैक्षणिक गतिरोध इन युवाओं के सुनहरे भविष्य को अंधकार में धकेल देगा।
* बंद होते सरकारी स्कूल: केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक साल में देश भर में "८,०७७ सरकारी स्कूल बंद" हो गए हैं। नीति आयोग का डेटा और भी भयावह है, जो बताता है कि पिछले १० वर्षों में लगभग "९४ हज़ार स्कूलों का विलय या बंद होना" दर्ज किया गया है। जब राज्य खुद प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के मोर्चे पर पीछे हट रहा है, तब उच्च शिक्षा के एक स्थापित केंद्र को नष्ट करना राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा का अपूरणीय नुकसान है।
४. सामाजिक दृष्टिकोण: हाशिए के समाज से शिक्षा का अधिकार छीनना
रामपुर और उसके आसपास के पश्चिमोत्तर उत्तर प्रदेश के इलाकों के लिए यह विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा का एक सुलभ और किफायती केंद्र रहा है।
* आर्थिक रूप से कमज़ोर तबके पर मार: दिल्ली या लखनऊ जैसे महानगरों में जाकर महंगी शिक्षा प्राप्त करना हर ग्रामीण छात्र के बस की बात नहीं है। स्थानीय स्तर पर ऐसी संस्थाएं सामाजिक सशक्तिकरण का माध्यम बनती हैं। इसे नष्ट करने का सीधा अर्थ है हाशिए के युवाओं को विकास की मुख्यधारा से दूर करना।
* सामाजिक ध्रुवीकरण की राजनीति: इस तरह की कार्रवाइयां समाज में एक असुरक्षा और अलगाव की भावना को जन्म देती हैं। जब एक विशिष्ट समुदाय या विपक्षी नेता द्वारा स्थापित शैक्षणिक संस्थान पर इतनी निर्ममता से प्रहार होता है, तो यह सामाजिक समरसता को खंडित करता है।
५. तुलनात्मक विश्लेषण: नीतिगत विरोधाभास
निम्नलिखित विकासात्मक सूचकांक यह स्पष्ट करती है कि किस तरह देश की वास्तविक शैक्षणिक आवश्यकताओं और वर्तमान प्रशासनिक प्राथमिकताओं के बीच एक गहरा विरोधाभास दिखाई दे रहा है:
# सरकारी स्कूलों की स्थिति :
* वास्तविक स्थिति (राष्ट्रीय स्तर पर) : पिछले १० वर्षों में करीब ९४,००० स्कूल बंद या विलय हुए।
* प्रशासनिक प्राथमिकताएं व चिंताएं : बुनियादी ढांचे को सुदृढ़ करने के बजाय बजट और संसाधनों की कटौती।
# निजीकरण की गति :
* वास्तविक स्थिति (राष्ट्रीय स्तर पर) : वर्ष २०२४-२५ से २०२५-२६ के बीच २,१०६ नए निजी स्कूल खुले।
* प्रशासनिक प्राथमिकताएं व चिंताएं : शिक्षा का लगातार बाज़ारीकरण, जिससे वह गरीबों की पहुँच से दूर हो रही है।
# उच्च शिक्षा संस्थान :
* वास्तविक स्थिति (राष्ट्रीय स्तर पर) : नए राजकीय विश्वविद्यालयों की स्थापना की गति अत्यंत धीमी।
* प्रशासनिक प्राथमिकताएं व चिंताएं : स्थापित और मान्यता प्राप्त (UGC Approved) विश्वविद्यालयों को ध्वस्त करने का निर्णय।
# प्रशासनिक रुख :
* वास्तविक स्थिति (राष्ट्रीय स्तर पर) : गंभीर वित्तीय अनियमितताओं (जैसे धार्मिक चढ़ावे की चोरी आदि) पर त्वरित कार्रवाई का अभाव।
* प्रशासनिक प्राथमिकताएं व चिंताएं : तकनीकी और प्रक्रियात्मक कमियों के नाम पर शैक्षणिक परिसरों पर बुलडोज़र।
## एक नए विमर्श की आवश्यकता
समय आ गया है कि देश के नीति-नियंता और प्रबुद्ध नागरिक इस बात पर विचार करें कि हमारी राष्ट्रीय प्राथमिकताएं क्या हैं? क्या हम एक ऐसा समाज बनना चाहते हैं जो अपनी समस्याओं का समाधान अदालतों के बजाय पीले रंग की मशीनों और मलबे के ढेरों में खोजता है?
किसी राजनेता की विचारधारा से सहमति या असहमति लोकतंत्र का हिस्सा हो सकती है, लेकिन ज्ञान और शिक्षा के उस मंदिर को ढहाना, जिसने हज़ारों युवाओं को नई राह दिखाई है, केवल अदूरदर्शिता है। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को 'परीक्षा पर चर्चा' करने के साथ-साथ इस बात का भी जवाब देना होगा कि आखिर क्यों हज़ारों स्कूल बंद हो रहे हैं और क्यों स्थापित उच्च शिक्षण संस्थानों को राजनैतिक वैमनस्य की वेदी पर चढ़ाया जा रहा है।
"सभ्यताओं का इतिहास इस बात का साक्षी है कि साम्राज्य महलों को ढहाने से नहीं, बल्कि विद्यालयों और विश्वविद्यालयों की नींव को मज़बूत करने से अमर होते हैं। बुलडोज़र कभी किसी राष्ट्र के भविष्य का निर्माता नहीं हो सकता, वह केवल उसके पतन का गवाह बन सकता है।"
