मूक गवाहों का जनतंत्र और 'संस्थागत' भ्रष्टाचार का चक्रव्यूह
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
मूक गवाहों का जनतंत्र और 'संस्थागत' भ्रष्टाचार का चक्रव्यूह
लोकतंत्र की सबसे सुंदर और सबसे डरावनी सच्चाई यह है कि इसमें जनता को वही सरकार मिलती है, जिसकी वह हकदार होती है। जब किसी राष्ट्र की सामूहिक चेतना 'अन्याय को सहने' को ही अपना भाग्य मान लेती है, तब तानाशाही या राजशाही की आवश्यकता नहीं पड़ती; व्यवस्था स्वयं ही एक शोषक तंत्र में बदल जाती है। "मरेंगे वो सब जो चुप हैं"—यह वाक्य शारीरिक मृत्यु की घोषणा नहीं है, यह एक समाज की 'आत्मिक और नागरिक मृत्यु' (Civic Death) का ढोल है। जिस दिन एक नागरिक सवाल पूछना छोड़ देता है, उसी दिन उसकी लोकतांत्रिक नागरिकता समाप्त हो जाती है और वह केवल एक 'प्रजा' या 'वोटर आईडी कार्ड धारक' बनकर रह जाता है।
१. भ्रष्टाचार का वृहद अर्थशास्त्र: १४० करोड़ की आबादी और लाखों करोड़ का खेल
जब हम भारत जैसे विशाल देश की सांख्यिकी को देखते हैं, तो विरोधाभास देखकर सिर चकरा जाता है। एक तरफ हमारे पास लगभग $140$ करोड़ से अधिक की विशाल मानवीय पूंजी है, जिसमें से एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी बुनियादी सुविधाओं (स्वास्थ्य, शिक्षा, शुद्ध पेयजल) के लिए संघर्ष कर रहा है। दूसरी तरफ, अखबारों और टीवी चैनलों पर रोज़ 'हजारों करोड़' और 'लाखों करोड़' के घोटालों की खबरें तैरती हैं।
इस अकूत धन के प्रवाह को यदि एक गणितीय दृष्टिकोण से समझें, तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि भारत गरीब नहीं है, बल्कि भारत के संसाधनों का 'क्रोनिक सेंट्रलाइजेशन' (क्रूर केंद्रीकरण) हो चुका है।
(१) व्यवस्था का स्तर - शीर्ष स्तर (मंत्री, मुख्यमंत्री, नीति निर्माता)
* भ्रष्टाचार का स्वरूप - नीतिगत घोटाले, कॉर्पोरेट साठगांठ, अरबों के ठेके
* समाज पर प्रभाव - देश के बुनियादी ढांचे, शिक्षा और स्वास्थ्य बजट की चोरी।
(२) व्यवस्था का स्तर - मध्यम स्तर (सांसद, विधायक, उच्च अधिकारी)
* भ्रष्टाचार का स्वरूप - विकास फंडों में कमीशन, ट्रांसफर-पोस्टिंग का धंधा
* समाज पर प्रभाव - क्षेत्रीय असंतुलन और गुणवत्ताहीन सड़कों-पुलों का निर्माण।
(३) व्यवस्था का स्तर - जमीनी स्तर (पटवारी, पुलिस, नगर पालिका, पंचायत)
* भ्रष्टाचार का स्वरूप - रोजमर्रा की रिश्वत, फाइल दबाना, दलाली
* समाज पर प्रभाव - आम नागरिक का मानसिक उत्पीड़न और व्यवस्था पर से विश्वास उठना।
यदि इस विशाल काले धन का एक अंश भी नीतिगत पारदर्शिता के साथ अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति (Antyodaya) तक डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर या मुफ्त विश्वस्तरीय शिक्षा-स्वास्थ्य के रूप में पहुंचता, तो आज भारत के माथे से गरीबी का कलंक बहुत पहले मिट चुका होता।
२. पटवारी से लेकर रेलवे टिकट तक: 'ऊपर की कमाई' का सामाजिक संदूषण
हम बड़े घोटालों पर चाय की दुकानों पर बहस तो कर लेते हैं, लेकिन असली त्रासदी हमारे रोजमर्रा के जीवन का वह भ्रष्टाचार है जिसे हमने 'सुविधा शुल्क' का संभ्रांत नाम देकर स्वीकार कर लिया है।
* वेतनभोगी शोषक: एक पटवारी, जिसे राज्य की जनता के टैक्स के पैसे से सम्मानजनक वेतन मिलता है, वह जमीन की पैमाइश या नामांतरण (Mutation) की फाइल तब तक आगे नहीं बढ़ाता जब तक उसकी टेबल के नीचे से 'हजार या दो हजार' रुपये न खिसका दिए जाएं।
* व्यवस्थागत लाचारी: रेलवे काउंटर पर बैठा क्लर्क हो या थाने का मुंशी, हमने एक ऐसी समानांतर व्यवस्था को मान्यता दे दी है जहाँ 'अतिरिक्त पैसा' ही नियम बन चुका है।
सबसे घातक बात यह है कि जब कोई जागरूक युवा इस व्यवस्था के खिलाफ खड़ा होकर सवाल पूछता है, तो समाज के बुजुर्ग और अपने ही परिवार के लोग उसे टोकते हैं—"ज्यादा हरिश्चंद्र मत बनो, काम निकालना है तो पैसे दो और आगे बढ़ो।" यह वाक्य एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि एक राष्ट्र के भीतर पनप रही 'नैतिक क्रांति' की भ्रूणहत्या करता है।
३. सिफारिशी संस्कृति और उपकार का भ्रम: अधिकारों का अपहरण
एक स्वस्थ लोकतंत्र में नागरिक के पास 'अधिकार' (Rights) होते हैं। जब आप किसी सरकारी दफ्तर में जाते हैं, तो आप कोई 'भीख' नहीं मांग रहे होते; आप उस तंत्र से अपनी सेवा मांग रहे होते हैं जिसे आपने टैक्स देकर चुना है।
परंतु भारतीय समाज का सबसे बड़ा दोष यह है कि यहाँ थाने में एक जायज एफआईआर (FIR) दर्ज कराने के लिए भी नागरिक को किसी स्थानीय नेता, पार्षद या बाहुबली की 'सिफारिश' ढूंढनी पड़ती है।
* कृपा का मुखौटा: जब वह नेता एक फोन घुमाता है और नागरिक का काम हो जाता है, तो नागरिक उस नेता को अपना 'माई-बाप' या 'उपकारकर्ता' समझने लगता है।
* गुलामी का चक्र: यहीं से लोकतंत्र का पतन शुरू होता है। जो आपका कानूनी अधिकार था, उसे नेता ने अपनी 'कृपा' बनाकर आपको बेचा, और बदले में आपसे जीवनभर की वफादारी (वोट) खरीद ली। यह एक तरह की आधुनिक बंधुआ मजदूरी है, जहाँ जनता अपने ही सेवकों के सामने हाथ जोड़े खड़ी रहती है।
४. खोखली राष्ट्रभक्ति बनाम जागरूक नागरिकता
"भारत माता की जय बोलना गलत नहीं है... लेकिन केवल नारे लगाने से कोई देशभक्ति सिद्ध नहीं हो जाती।"
आज के दौर में देशभक्ति का पैमाना बहुत सस्ता कर दिया गया है। किसी भी गलत व्यवस्था पर सवाल उठाइए, तो तंत्र आपको 'देशद्रोही' या 'सभ्यता का दुश्मन' घोषित करने के लिए तैयार बैठा है। नारों की गूंज में 'जवाबदेही' की आवाज को दबा दिया जाता है।
सच्ची देशभक्ति सीमाओं पर खड़े होने या केवल झंडा फहराने तक सीमित नहीं है। सच्ची देशभक्ति तब है जब आप अपने नगर पालिका अध्यक्ष से पूछें कि—"पिछले चुनाव में जो नाली और सड़क का बजट पास हुआ था, वह पैसा कहाँ गया?" जब आप अपने सरपंच से पूछें कि—"स्कूल की इमारत जर्जर क्यों है?" चुनाव में जब नेता करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाते हैं, तो जनता को यह समझना होगा कि जो व्यक्ति चुनाव जीतने के लिए ५ करोड़ खर्च कर रहा है, वह चुनकर आने के बाद सबसे पहले अपने ५० करोड़ वसूल करेगा, आपकी नीतियां नहीं बनाएगा। जब हम वोट जाति, धर्म, मंदिर-मस्जिद या मुफ्त के राशन के पैकेट पर देंगे, तो हमें शिक्षा और रोजगार की मांग करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं रह जाता।
## चुप्पी तोड़ना ही एकमात्र विकल्प है
इतिहास गवाह है कि कोई भी समाज अत्याचारियों के अत्याचार से उतना तबाह नहीं हुआ, जितना भले लोगों की 'चुप रहने की साजिश' से हुआ है। मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने कहा था—"अंत में, हम अपने दुश्मनों के शब्द नहीं, बल्कि अपने दोस्तों की खामोशी याद रखेंगे।"
'मरेंगे वो सब जो चुप हैं'—यह एक चेतावनी है। यदि हम आने वाली पीढ़ी को एक ऐसा भारत देना चाहते हैं जो सचमुच अमेरिका या चीन की आंखों में आंखें डालकर बात कर सके, तो हमें 'सवालों की संस्कृति' (Culture of Questioning) को पुनर्जीवित करना होगा। जिस दिन भारत की १३५ करोड़ से अधिक की आबादी अपने जनप्रतिनिधियों का गिरेबान (संवैधानिक रूप से) पकड़कर नीतियों पर हिसाब मांगना शुरू कर देगी, उस दिन इस देश को 'विश्वगुरु' बनने से दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक पाएगी। देश केवल मिट्टी और नक्शे से नहीं बनता, देश अपने नागरिकों के आत्मसम्मान और उनकी मुखरता से जीवंत होता है।
