सेशल्स से ढाका तक : हिंद महासागर, चीन और बदलती दक्षिण एशियाई कूटनीति में भारत की रणनीतिक परीक्षा

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


सेशल्स से ढाका तक : हिंद महासागर, चीन और बदलती दक्षिण एशियाई कूटनीति में भारत की रणनीतिक परीक्षा

विदेश नीति का मूल्यांकन कभी भी केवल इस आधार पर नहीं किया जाता कि किसी राष्ट्राध्यक्ष ने कितनी विदेश यात्राएँ कीं, कितने समझौते किए या कितने अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त किए। किसी भी गंभीर रणनीतिक विश्लेषण का मूल प्रश्न यह होता है कि उन यात्राओं और समझौतों ने संबंधित देश की राष्ट्रीय शक्ति (National Power), सामरिक स्थिति (Strategic Posture), क्षेत्रीय प्रभाव (Regional Influence) तथा दीर्घकालिक भू-राजनीतिक हितों (Long-term Geopolitical Interests) को कितना सुदृढ़ किया।

इसी कसौटी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सेशल्स यात्रा का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

प्रथम दृष्टया सेशल्स एक छोटा-सा द्वीपीय राष्ट्र दिखाई देता है—सीमित जनसंख्या, सीमित भूभाग और सीमित आर्थिक क्षमता वाला। किंतु अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी राष्ट्र का महत्व केवल उसके आकार से निर्धारित नहीं होता। इक्कीसवीं शताब्दी की शक्ति-प्रतिस्पर्धा समुद्रों पर केंद्रित है, और हिंद महासागर आज विश्व राजनीति का सबसे संवेदनशील सामरिक क्षेत्र बन चुका है। विश्व के ऊर्जा व्यापार का बड़ा भाग, पूर्व-पश्चिम समुद्री व्यापार मार्ग, अफ्रीका-एशिया संपर्क तथा इंडो-पैसिफिक सुरक्षा संरचना इसी महासागर पर निर्भर है। इस दृष्टि से सेशल्स, मॉरीशस, मालदीव, श्रीलंका और कोमोरोस जैसे छोटे द्वीपीय राष्ट्र वास्तव में "छोटे" नहीं, बल्कि समुद्री भू-राजनीति के निर्णायक केंद्र हैं।


यही कारण है कि चीन पिछले डेढ़ दशक से हिंद महासागर क्षेत्र में बंदरगाहों, समुद्री अवसंरचना, ऋण-आधारित निवेश, निगरानी प्रणालियों और रणनीतिक साझेदारियों का विस्तार कर रहा है। तथाकथित "स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स" रणनीति के अंतर्गत बीजिंग का उद्देश्य केवल आर्थिक उपस्थिति स्थापित करना नहीं, बल्कि भविष्य की सामरिक पहुँच सुनिश्चित करना भी है। ऐसे परिदृश्य में सेशल्स भारत के लिए केवल एक मित्र राष्ट्र नहीं, बल्कि हिंद महासागर की समुद्री सुरक्षा संरचना का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।


इसी कारण प्रधानमंत्री की यात्रा को केवल औपचारिक समारोह या नागरिक सम्मान के संदर्भ में सीमित करके देखना रणनीतिक दृष्टि से उचित नहीं होगा। यदि इस यात्रा के परिणामस्वरूप समुद्री निगरानी, तटरक्षक सहयोग, ब्लू इकोनॉमी, समुद्री डोमेन जागरूकता (Maritime Domain Awareness), जलवायु सुरक्षा और रक्षा सहयोग में ठोस प्रगति होती है, तो यह भारत की हिंद महासागर नीति के लिए महत्त्वपूर्ण उपलब्धि होगी।


किन्तु विदेश नीति केवल बाहरी शक्ति-प्रदर्शन नहीं होती; उसकी विश्वसनीयता का आधार घरेलू स्थिरता होती है।


किसी भी राष्ट्र की वैश्विक प्रतिष्ठा अंततः उसकी आर्थिक क्षमता, सामाजिक स्थिरता, संस्थागत विश्वसनीयता, तकनीकी प्रगति और राजनीतिक संतुलन पर आधारित होती है। यदि देश के भीतर शिक्षा व्यवस्था संकटग्रस्त हो, युवाओं में असंतोष बढ़ रहा हो, रोजगार और सामाजिक विश्वास पर प्रश्न उठ रहे हों, या सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा संबंधी चिंताएँ बनी रहें, तो विदेश नीति की उपलब्धियों का राजनीतिक प्रभाव सीमित हो जाता है। इसलिए विदेश यात्राओं की आलोचना या प्रशंसा का प्रश्न नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं के संतुलन का प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण है।


भारतीय विदेश नीति की सबसे बड़ी ऐतिहासिक शक्ति उसकी रणनीतिक निरंतरता (Strategic Continuity) रही है।


स्वतंत्रता के बाद भारत ने अपने पड़ोसी और छोटे देशों के साथ संबंधों को संरक्षणवाद नहीं, बल्कि सहभागिता के आधार पर विकसित किया। चाहे मालदीव में हस्तक्षेप हो, सेशल्स की सुरक्षा सहायता हो, श्रीलंका में मानवीय सहयोग हो, नेपाल में आपदा राहत हो या अफ्रीका में विकास साझेदारी—भारत ने प्रायः ऐसी भूमिका निभाई जिसने उसे एक विश्वसनीय और उत्तरदायी शक्ति के रूप में स्थापित किया। यही "सॉफ्ट पावर" और "नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर" की वह अवधारणा है, जिसने भारत को पश्चिमी शक्तियों और चीन से अलग पहचान दी।


आज चुनौती यह है कि क्या भारत इस परंपरा को नई परिस्थितियों में प्रभावी रूप से आगे बढ़ा पा रहा है?


दक्षिण एशिया की वर्तमान भू-राजनीति इस प्रश्न को और जटिल बना देती है।


बांग्लादेश इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है।


1971 के मुक्ति संग्राम के बाद भारत और बांग्लादेश के संबंधों की नींव साझा इतिहास और रणनीतिक विश्वास पर रखी गई थी। किंतु पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच अनेक ऐसे मुद्दे उभरे हैं जिन्होंने परस्पर विश्वास को प्रभावित किया है। सीमा प्रबंधन, अवैध प्रवासन, राजनीतिक वक्तव्य, नागरिकता संबंधी विवाद, जल-वितरण, घरेलू राजनीतिक विमर्श और बदलते क्षेत्रीय समीकरणों ने संबंधों को अधिक संवेदनशील बना दिया है।


इसी बीच चीन ने बांग्लादेश में अपने निवेश, अवसंरचना परियोजनाओं, रक्षा सहयोग और आर्थिक उपस्थिति को लगातार विस्तारित किया है। यदि ढाका अपने रणनीतिक विकल्पों का विविधीकरण कर रहा है, तो इसे केवल किसी एक सरकार की असफलता या सफलता के रूप में नहीं देखा जा सकता। छोटे और मध्यम आकार के राष्ट्र आज "मल्टी-अलाइनमेंट" की नीति अपना रहे हैं—वे किसी एक शक्ति पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न शक्तियों के साथ समानांतर संबंध विकसित करना चाहते हैं। भारत को इस नई वास्तविकता को स्वीकार करते हुए अपनी कूटनीति को अधिक लचीला, अधिक आर्थिक और अधिक संस्थागत बनाना होगा।


यहाँ एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है।


विदेश नीति में भाषा भी शक्ति का उपकरण होती है।


यदि पड़ोसी देशों के संदर्भ में सार्वजनिक विमर्श अत्यधिक राजनीतिक, भावनात्मक या आक्रामक हो जाए, तो उसका प्रभाव केवल घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहता; वह सीधे उन देशों की जनमत-निर्माण प्रक्रिया को प्रभावित करता है। राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्नों पर दृढ़ता आवश्यक है, किंतु दृढ़ता और उत्तेजना समानार्थी नहीं हैं। भारत की कूटनीतिक परंपरा सदैव इस संतुलन के लिए जानी जाती रही है कि वह अपने हितों की रक्षा करते हुए भी संवाद के द्वार बंद नहीं करता।


आज चीन की सबसे बड़ी सफलता उसकी सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक कूटनीति है। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI), विकास ऋण, अवसंरचना निवेश और त्वरित वित्तीय सहायता के माध्यम से उसने अनेक देशों में दीर्घकालिक प्रभाव स्थापित किया है। भारत यदि इस चुनौती का उत्तर देना चाहता है, तो उसे केवल वैचारिक या सुरक्षा-आधारित प्रतिक्रिया से आगे बढ़ना होगा। उसे अपने पड़ोस को अधिक व्यापार, अधिक निवेश, अधिक संपर्क-सुविधाएँ, अधिक ऊर्जा सहयोग और अधिक प्रौद्योगिकी साझेदारी प्रदान करनी होगी।


हिंद महासागर में प्रभाव केवल नौसैनिक जहाज़ों से स्थापित नहीं होता; वह बंदरगाहों, डिजिटल संपर्क, वित्तीय विश्वास, आपदा राहत, मानवीय सहायता और विकास साझेदारी के माध्यम से निर्मित होता है।


यही वह क्षेत्र है जहाँ भारत को अपनी ऐतिहासिक पूँजी का अधिक प्रभावी उपयोग करना चाहिए।


सेशल्स की यात्रा का वास्तविक महत्व इस बात से निर्धारित होगा कि आने वाले वर्षों में भारत हिंद महासागर क्षेत्र में किस प्रकार अपनी समुद्री रणनीति को संस्थागत रूप देता है; क्या वह छोटे द्वीपीय देशों को केवल मित्र राष्ट्र मानता है या उन्हें अपनी इंडो-पैसिफिक दृष्टि का सक्रिय साझेदार बनाता है; और क्या वह चीन की बढ़ती उपस्थिति का उत्तर केवल प्रतिक्रियात्मक ढंग से देता है या वैकल्पिक क्षेत्रीय व्यवस्था का निर्माण भी करता है।


अंततः, विदेश नीति का उद्देश्य पुरस्कार अर्जित करना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय शक्ति का विस्तार करना होता है।


विश्व व्यवस्था में सम्मान उसी राष्ट्र को मिलता है जो अपने पड़ोस में विश्वास पैदा करे, समुद्रों में स्थिरता सुनिश्चित करे, आर्थिक अवसर उपलब्ध कराए, संकट की घड़ी में विश्वसनीय सहयोगी सिद्ध हो और अपनी घरेलू शक्ति को अंतरराष्ट्रीय प्रभाव में परिवर्तित कर सके।


सेशल्स की यात्रा को इसी व्यापक रणनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। यदि यह यात्रा भारत की हिंद महासागर नीति, इंडो-पैसिफिक रणनीति और पड़ोसी देशों के साथ विश्वास-आधारित साझेदारी को नई गति देती है, तो इसका महत्व केवल तीन दिनों की राजकीय यात्रा से कहीं अधिक होगा। किंतु यदि यह यात्रा केवल प्रतीकात्मक उपलब्धि और राजनीतिक संचार तक सीमित रह जाती है, तो इतिहास इसे एक राजनयिक घटना के रूप में याद करेगा, न कि भारत की समुद्री शक्ति के निर्णायक मोड़ के रूप में।


इक्कीसवीं शताब्दी के शक्ति-संतुलन में भारत की वास्तविक परीक्षा विदेश यात्राओं की संख्या से नहीं होगी; उसका मूल्यांकन इस आधार पर होगा कि क्या वह हिंद महासागर को अपने प्रभाव-क्षेत्र का स्थिर, विश्वसनीय और नियम-आधारित समुद्री परिसर बना पाता है, और क्या वह दक्षिण एशिया में ऐसा विश्वास पुनर्निर्मित कर पाता है जो बाहरी शक्तियों के बढ़ते प्रभाव को स्वाभाविक रूप से सीमित कर दे। यही भारत की दीर्घकालिक कूटनीतिक सफलता की सबसे बड़ी कसौटी होगी।