इथेनॉल का प्रश्न: हरित ईंधन का उत्सव या प्रदूषण का नया भूगोल?

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


इथेनॉल का प्रश्न: हरित ईंधन का उत्सव या प्रदूषण का नया भूगोल?

बिरनीहाट का प्रसंग केवल एक औद्योगिक कस्बे की पर्यावरणीय पीड़ा नहीं है; यह भारत की ऊर्जा-नीति के भीतर छिपे उस बड़े विरोधाभास का प्रतीक है, जहाँ “क्लीन फ्यूल” का सार्वजनिक आख्यान और उत्पादन-स्तर की वास्तविकता कई बार एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। सरकार ने इथेनॉल ब्लेंडिंग को ऊर्जा-सुरक्षा, आयात-निर्भरता में कमी और कम-कार्बन संक्रमण के उपकरण के रूप में आगे बढ़ाया है; आधिकारिक वक्तव्यों के अनुसार राष्ट्रीय लक्ष्य 20% इथेनॉल मिश्रण को ESY 2025-26 तक ले जाना है, और फरवरी 2025 तक मिश्रण 17.98% तक पहुँच चुका था। साथ ही सरकार यह भी कहती है कि NITI Aayog के जीवन-चक्र आकलन के अनुसार गन्ना-आधारित इथेनॉल से पेट्रोल की तुलना में 65% और मक्का-आधारित इथेनॉल से 50% तक कम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन हो सकता है। यही वह बिंदु है जहाँ नीति की भाषा और उसके धरातलीय परिणामों की कसौटी शुरू होती है।

लेकिन हर ऊर्जा-परिवर्तन की सच्चाई उसके दहन-चरण में नहीं, उसके उत्पादन-चरण में भी छिपी होती है। इथेनॉल स्वयं जीवाश्म ईंधन का प्रत्यक्ष विकल्प हो सकता है, पर उसका उत्पादन, आसवन, अपशिष्ट-प्रबंधन और रसद-श्रृंखला स्थानीय पर्यावरण पर भारी दबाव डाल सकते हैं। सरकार के ही पुराने दस्तावेज़ बताते हैं कि डिस्टिलरी सेक्टर भारत के प्रमुख प्रदूषणकारी उद्योगों में शामिल है और उसका “spent wash” अत्यंत प्रदूषणकारी अपशिष्ट जल है, जिसमें BOD, COD और TDS का स्तर बहुत ऊँचा हो सकता है। इसलिए यह कहना पर्याप्त नहीं कि इथेनॉल “हरा” है; असली प्रश्न यह है कि वह किस feedstock से, किस तकनीक से, किस अपशिष्ट-नियंत्रण के साथ और किस पारदर्शिता-ढाँचे में बनाया जा रहा है।


बिरनीहाट इस असमंजस का सबसे कठोर उदाहरण बन गया है। Reuters के अनुसार यह छोटा औद्योगिक कस्बा 2024 में दुनिया के सबसे प्रदूषित महानगरीय क्षेत्रों में गिना गया; वहाँ वार्षिक PM2.5 औसत 128.2 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया, जो WHO की 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की वार्षिक guideline से 25 गुना से भी अधिक है। Reuters ने यह भी बताया कि क्षेत्र में लगभग 80 भारी-प्रदूषणकारी उद्योग हैं और उसकी bowl-shaped geography प्रदूषकों को फँसाती है, जबकि स्थानीय लोगों में श्वसन-संबंधी समस्याएँ, त्वचा पर रैश और आँखों की तकलीफ़ जैसी शिकायतें बढ़ी हैं। यह कोई वैचारिक बहस नहीं, बल्कि जन-स्वास्थ्य का ठोस संकट है।


यहीं से सबसे अहम निष्कर्ष निकलता है: "ईंधन का हरित होना और उत्पादन-क्षेत्र का स्वच्छ होना एक ही बात नहीं है।" यदि किसी नीति से राष्ट्रीय स्तर पर तेल-आयात घटते हैं, पर किसी सीमावर्ती औद्योगिक क्षेत्र में हवा और पानी जहरीले होते जाते हैं, तो वह नीति आधी सफल और आधी विफल मानी जाएगी। राष्ट्रीय ऊर्जा-नीति का मूल्यांकन केवल टैंक-टू-व्हील दृष्टि से नहीं, बल्कि वेल-टू-व्हील और उससे आगे के जीवन-चक्र दृष्टिकोण से होना चाहिए। सरकार के अपने कथन जीवन-चक्र उत्सर्जन का हवाला देते हैं; ठीक उसी तरह जीवन-चक्र के स्थानीय पर्यावरणीय प्रभावों की भी उतनी ही कठोर पड़ताल होनी चाहिए।


इसी संदर्भ में पारदर्शिता का प्रश्न और गंभीर हो जाता है। जब कोई नीति करोड़ों लोगों के ईंधन, किसानों की फसल-व्यवस्था, उद्योगों की निवेश-योजना और सार्वजनिक स्वास्थ्य को एक साथ प्रभावित करे, तब स्वतंत्र वैज्ञानिक मूल्यांकन कोई विलासिता नहीं, शासन की अनिवार्य शर्त है। यदि किसी क्षेत्र में प्रदूषण के प्रमाण बढ़ रहे हों, तो उत्पादन-इकाइयों का वास्तविक समय उत्सर्जन-डेटा, अपशिष्ट-जल प्रबंधन, ambient air monitoring और पर्यावरणीय अनुपालन सार्वजनिक होने चाहिए। WHO की 2021 air quality guidelines यह स्पष्ट करती हैं कि PM2.5 जैसे सूक्ष्म कण गंभीर स्वास्थ्य-जोखिम से जुड़े हैं और सार्वजनिक-नीति को स्वास्थ्य-सुरक्षा के आधार पर ही परखा जाना चाहिए।


इथेनॉल नीति का दूसरा पहलू आर्थिक-राजनीतिक है। PIB के अनुसार ethanol procurement cost ESY 2024-25 में औसतन 71.32 रुपये प्रति लीटर तक पहुँची, और सरकार ने इसे ऊर्जा-सुरक्षा, ग्रामीण आय-सहायता और हरित संक्रमण की त्रिमूर्ति के रूप में प्रस्तुत किया है। यह स्पष्ट है कि इथेनॉल सिर्फ ईंधन नहीं, बल्कि एक बड़ा सार्वजनिक खरीद-तंत्र, कृषि-प्रोत्साहन मॉडल और औद्योगिक नीति-ढाँचा भी है। ऐसे में नीति-निर्माण में “कौन लाभान्वित होता है” और “किस पर लागत पड़ती है” — दोनों प्रश्न समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। राष्ट्रहित वही नहीं जो केवल macro numbers चमकाए; राष्ट्रहित वह है जिसमें स्थानीय नागरिक को साफ हवा, सुरक्षित पानी और जवाबदेह शासन भी मिले।


बिरनीहाट हमें यह भी याद दिलाता है कि भारत में प्रदूषण-प्रबंधन अभी भी क्षेत्रीय और खंडित ढाँचे में फँसा है। औद्योगिक क्लस्टर, सीमावर्ती कस्बे, आवासीय क्षेत्र और परिवहन-प्रवाह—इन सबको एक समग्र airshed के रूप में देखने की ज़रूरत है। केवल एक इकाई बंद कर देने से समस्या समाप्त नहीं होती, क्योंकि प्रदूषण प्रशासनिक सीमाओं का सम्मान नहीं करता। जब तक monitoring, enforcement और public disclosure एक साथ नहीं चलेंगे, तब तक “ग्रीन” नीति भी काग़ज़ पर हरी और धरातल पर धुँधली बनी रह सकती है। Reuters की रिपोर्ट और WHO का मानक इसी बात की पुष्टि करते हैं कि संकट संरचनात्मक है, आकस्मिक नहीं। 


इसलिए राष्ट्रीय बहस को दो अतियों से बचना चाहिए। एक ओर इथेनॉल को चमत्कारी समाधान घोषित करना गलत है; दूसरी ओर उसे पूरी तरह विफल बताकर खारिज कर देना भी सही नहीं होगा। इथेनॉल एक संक्रमणकालीन उपकरण है—उपयोगी, पर शर्तों सहित। उसकी उपयोगिता तभी सिद्ध होगी जब feedstock selection, water footprint, waste treatment, local emissions, and independent auditing को नीति का अभिन्न हिस्सा बनाया जाए। सरकारी दस्तावेज़ स्वयं यह मानते हैं कि distillery effluent और spent wash गंभीर प्रदूषण-कारक हैं; इसलिए समाधान का रास्ता और अधिक पारदर्शी, अधिक वैज्ञानिक और अधिक स्थानीय-जवाबदेह होना चाहिए।


अंततः, बिरनीहाट का असली सबक यह है कि हरित ऊर्जा का प्रश्न केवल कार्बन का प्रश्न नहीं होता; वह शासन, स्वास्थ्य, भूमि, जल, उद्योग और जनविश्वास का प्रश्न भी होता है। कोई भी सरकार तब तक सफल नहीं मानी जा सकती जब तक वह एक हाथ से राष्ट्रीय ऊर्जा-सुरक्षा मजबूत करे और दूसरे हाथ से नागरिकों की साँसों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। इथेनॉल का भविष्य तभी टिकाऊ है जब वह केवल पेट्रोल में मिश्रण भर न रहे, बल्कि उत्पादन से लेकर उपभोग तक पूरी शृंखला में सार्वजनिक जवाबदेही का मानक बने। साफ ईंधन की दिशा में बढ़ते हुए भारत को साफ हवा के अधिकार से कभी समझौता नहीं करना चाहिए। यही इस विवाद का सबसे बड़ा, और सबसे कठिन, राष्ट्रीय निष्कर्ष है।