कोलकाता से असम तक, एक ही दिन में लोकतंत्र की कई परीक्षाएँ
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
कोलकाता से असम तक, एक ही दिन में लोकतंत्र की कई परीक्षाएँ
आज के समाचार-चक्र ने यह साफ कर दिया कि भारत में लोकतंत्र की चुनौती अब केवल चुनाव जीतने-हारने तक सीमित नहीं रही। कोलकाता में तृणमूल सांसद अभिषेक बनर्जी के घर पर तड़के पुलिस ने ताले तोड़कर तलाशी ली; TOI के अनुसार खोजबीन में किसी तरह की बरामदगी नहीं हुई और seizure report “NIL” बताई गई। उसी समय अलिपुर की सरकारी इमारत में लगी आग के बाद लगभग 3,000 से 4,000 EVM के क्षतिग्रस्त होने की आशंका बनी हुई है; कहीं 3,000 मशीनों की बात है, कहीं 4,000 की, और जांच अभी जारी है। असम सरकार ने 18 वर्ष से अधिक आयु वालों के लिए नया Aadhaar जारी करने पर रोक लगाकर इसे अवैध घुसपैठ रोकने का कदम बताया है। उधर जॉरहाट में AN-32 हादसे में पाँच वायुसेना कर्मियों की मृत्यु हुई, और ओमान तट के पास अमेरिकी हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत पर भारत ने कड़ा विरोध दर्ज कराया। मोदी और ट्रम्प के G7 पर मिलने की संभावना भी आज के विदेश-समाचारों में रही।
इन घटनाओं का साझा सूत्र सिर्फ “खबर” नहीं, बल्कि “भरोसे” का संकट है। किसी विपक्षी नेता के घर तड़के जाकर ताला तोड़ना कानूनन सही प्रक्रिया हो सकती है, बशर्ते जांच निष्पक्ष और प्रमाण-आधारित हो; लेकिन जब search के अंत में जब्ती शून्य हो, तो वह कार्रवाई कानूनी से अधिक राजनीतिक संदेश बन जाती है। सत्ता के पास जांच का अधिकार है, पर लोकतंत्र में जांच की विश्वसनीयता भी उतनी ही अहम होती है। यही कारण है कि ऐसी कार्रवाइयाँ महज एक व्यक्ति या दल के खिलाफ नहीं दिखतीं; वे पूरे सार्वजनिक जीवन को यह संकेत देती हैं कि संस्थाएँ किस दिशा में झुक रही हैं।
EVM वाले मामले में सबसे बड़ी चिंता संख्या नहीं, पारदर्शिता है। अलग-अलग रिपोर्टों में लगभग 3,000 और लगभग 4,000 मशीनों का उल्लेख है; कुछ रिपोर्टों में ये मशीनें 10वीं मंज़िल पर रखे स्ट्रॉन्ग रूम से जुड़ी बताई गई हैं, कुछ में 10 या 15 विधानसभा क्षेत्रों से। EC/ECIL की जांच शुरू है, SIT बनी है, फोरेंसिक नमूने लिए जा रहे हैं, लेकिन अभी तक यह स्पष्ट नहीं कि नुकसान कितना हुआ, कौन-सी मशीनें किस चुनाव में इस्तेमाल हुई थीं, और आग दुर्घटना थी, लापरवाही थी या कोई अधिक गंभीर बात। यही वह जगह है जहाँ लोकतंत्र को केवल सुरक्षा नहीं, सार्वजनिक ऑडिट चाहिए। जब मतदान-संबंधी सामग्री धुएँ में घिरती है, तो जनता के मन में उठने वाला संदेह भी संस्थागत सुरक्षा का हिस्सा बन जाता है।
असम का Aadhaar निर्णय इस बात का प्रतीक है कि दस्तावेज़ी व्यवस्था किस तरह नागरिकता, पहचान और राजनीतिक आशंका के बीच फँसती जा रही है। राज्य सरकार का कहना है कि 18 वर्ष से ऊपर के नए Aadhaar पर रोक अवैध प्रवासियों को रोकने के लिए है; हालांकि 18 से नीचे के लोगों, चाय बागान समुदाय, अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति और दिव्यांगों के लिए अपवाद रखे गए हैं, और पूर्ण प्रतिबंध 1 अप्रैल 2027 से लागू होने की बात कही गई है। यह नीति सुरक्षा की भाषा में आती है, लेकिन सामाजिक स्तर पर यह नागरिकों को दस्तावेज़ के दरवाज़े पर खड़ा कर देने वाली राजनीति भी बन सकती है। लोकतंत्र में पहचान-पत्र नागरिक को राज्य से जोड़ते हैं; उन्हें राजनीतिक छंटनी का औजार बना देना बेहद सावधानी की माँग करता है।
रक्षा और विदेश-नीति के मोर्चे पर भी आज का दिन हल्का नहीं था। जॉरहाट में AN-32 दुर्घटना में पाँच वायुसेना कर्मियों की मृत्यु हुई और वायुसेना ने कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी शुरू की। वहीं ओमान के पास अमेरिकी हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत ने भारत को औपचारिक विरोध तक सीमित रहने से आगे सोचने पर मजबूर किया; इसी पृष्ठभूमि में भारतीय शिपिंग प्राधिकरण ने conflict zones में भारतीय seafarers की तैनाती पर अस्थायी रोक की सलाह जारी की। यह सिर्फ अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का प्रश्न नहीं, बल्कि उस भारतीय मज़दूर की सुरक्षा का प्रश्न है जो वैश्विक व्यापार की सबसे जोखिमपूर्ण परिधि पर काम करता है। अगर राज्य अपनी जनता की जान और रोज़ी दोनों की रक्षा न कर पाए, तो उसका अंतरराष्ट्रीय आग्रह भी खोखला लगता है।
आज के मीडिया-परिदृश्य का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या समाचार-संपादन अभी भी सार्वजनिक हित को प्राथमिकता देता है। जिन घटनाओं में संस्थागत जवाबदेही, वोट की सुरक्षा, नागरिक पहचान, सैन्य जोखिम और अंतरराष्ट्रीय हत्या-संबंधी विवाद शामिल हों, उन्हें हाशिए पर नहीं धकेला जा सकता। कुछ खबरें इसलिए बड़ी नहीं होतीं कि वे सबसे चमकीली हों; वे इसलिए बड़ी होती हैं कि उनसे जनता के अधिकार जुड़े होते हैं। EVM की सुरक्षा, पुलिस कार्रवाई की वैधता, Aadhaar नीति का सामाजिक असर, वायुसेना दुर्घटना, और विदेशी हमले में भारतीयों की मौत—ये सब एक ही लोकतांत्रिक प्रश्न की अलग-अलग परतें हैं: क्या राज्य अपनी शक्ति के साथ उतना ही जवाबदेह भी है? अगर उत्तर अस्पष्ट है, तो संपादकीय की जिम्मेदारी है कि वह उस अस्पष्टता को उजागर करे, न कि उसे शोर में दफना दे।
इसलिए आज की सीख सीधी है: लोकतंत्र केवल चुनाव से नहीं चलता, वह भरोसे से चलता है; और भरोसा केवल भाषणों से नहीं, पारदर्शी जांच, निष्पक्ष संस्थाओं और निर्भीक मीडिया से बनता है। जब ताला तोड़कर की गई तलाशी, धुएँ में घिरी EVM, दस्तावेज़ी नियंत्रण की नई सीमाएँ, सैन्य दुर्घटना और विदेशी हमले में भारतीय मौतें एक ही दिन हमारी खबर बनें, तो यह दिन सिर्फ समाचार नहीं देता—यह राज्य, समाज और पत्रकारिता तीनों से जवाब माँगता है। आज उसी जवाब की सबसे ज्यादा जरूरत है।
