रसोई पर हमला, जनता पर कर और पूँजी पर कृपा

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


रसोई पर हमला, जनता पर कर और पूँजी पर कृपा

"₹942 का सिलेंडर और विकास के मॉडल पर खड़े होते असहज सवाल"

देश की राजनीति में कई बार ऐसे क्षण आते हैं जब एक छोटा-सा आंकड़ा पूरे शासन-दर्शन की पोल खोल देता है। दिल्ली में घरेलू LPG सिलेंडर का दाम ₹942 पहुँच जाना ऐसा ही एक आंकड़ा है।

सरकार इसे महज़ ₹29 की बढ़ोतरी बताएगी। अर्थशास्त्री इसे मूल्य समायोजन कहेंगे। तेल कंपनियाँ इसे बाजार की अनिवार्यता बताएँगी। लेकिन देश की करोड़ों गृहिणियों, मजदूरों, निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों और सीमित आय वाले बुजुर्गों के लिए यह सिर्फ ₹29 नहीं है। यह उस आर्थिक दबाव की एक और परत है जो पिछले कई वर्षों से लगातार उनके जीवन पर चढ़ती जा रही है। तीन महीने के भीतर दूसरी बार सिलेंडर महँगा हुआ है। मार्च में ₹60 और अब ₹29। कुल मिलाकर ₹89 का अतिरिक्त बोझ।

कागज़ पर यह रकम छोटी लग सकती है, लेकिन उस परिवार के लिए नहीं जिसकी पूरी मासिक आय पहले ही महँगाई, स्कूल फीस, दवाइयों, बिजली बिल, किराए और बढ़ती रोज़मर्रा की लागतों के बीच बँट चुकी है। सवाल यह है कि "आखिर देश की आर्थिक नीतियों का बोझ हमेशा उसी नागरिक पर क्यों डाला जाता है जो सबसे कमज़ोर है?"


## विकास किसका और कीमत कौन चुका रहा है?


हर सरकार अपने समय का एक आर्थिक दर्शन लेकर चलती है। स्वतंत्रता के बाद के दशकों में भारत ने सार्वजनिक क्षेत्र को विकास का इंजन बनाया। HMT, BEL, BHEL, SAIL, NTPC, ONGC जैसी संस्थाएँ केवल कंपनियाँ नहीं थीं; वे राष्ट्र-निर्माण की परियोजनाएँ थीं।


उनका उद्देश्य केवल लाभ कमाना नहीं था। वे रोजगार देती थीं। तकनीकी क्षमता विकसित करती थीं। रणनीतिक आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करती थीं। और सबसे महत्वपूर्ण, वे इस विचार का प्रतिनिधित्व करती थीं कि राज्य केवल कर वसूलने वाली संस्था नहीं, बल्कि समाज के विकास का सक्रिय भागीदार है।


आज तस्वीर बदल चुकी है। अब विकास का अर्थ अक्सर निजी निवेश, निजीकरण और बाजार-आधारित मूल्य निर्धारण तक सीमित होकर रह गया है।


नागरिक से कहा जाता है कि अधिक भुगतान करो, क्योंकि यही आर्थिक यथार्थ है। लेकिन वही नागरिक यह भी देखता है कि उसकी आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ रही।


## महँगाई का सबसे क्रूर चेहरा


महँगाई का सबसे क्रूर रूप वह नहीं होता जो टीवी बहसों में दिखाई देता है। वह रसोई में दिखाई देता है।


वह उस माँ की चिंता में दिखाई देता है जो महीने के आख़िरी सप्ताह में सिलेंडर बचाने के लिए खाना पकाने की आदत बदल देती है।


वह उस बुजुर्ग दंपति की विवशता में दिखाई देता है जो दवा और रसोई के खर्च में चुनाव करने को मजबूर हो जाता है।


वह उस मजदूर परिवार में दिखाई देता है जहाँ गैस खत्म होने के बाद फिर से लकड़ी या कोयले की ओर लौटने की नौबत आ जाती है।


जब नीति-निर्माता किसी मूल्य वृद्धि को मात्र एक प्रशासनिक निर्णय मानते हैं, तब वे अक्सर उसके मानवीय परिणामों को भूल जाते हैं।


## सब्सिडी से लाभ तक: बदली हुई प्राथमिकताएँ


एक समय था जब सरकारें ऊर्जा सुरक्षा को सामाजिक सुरक्षा का हिस्सा मानती थीं। आज बहस का केंद्र बदल गया है। अब लक्ष्य सब्सिडी घटाना, राजकोषीय संतुलन बनाए रखना और कंपनियों की वित्तीय स्थिति को मजबूत करना बताया जाता है। यह तर्क अपनी जगह सही हो सकता है। लेकिन प्रश्न यह है कि संतुलन हमेशा गरीब और मध्यमवर्ग की कीमत पर ही क्यों स्थापित किया जाता है?


यदि अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है, तो उसका लाभ सबसे पहले उस नागरिक को मिलना चाहिए जो कर भी देता है, मतदान भी करता है और व्यवस्था को चलाने के लिए अपने श्रम का योगदान भी देता है।


## करों का गणराज्य या नागरिकों का गणराज्य?


भारत में आज आम नागरिक का अनुभव यह है कि उसका जीवन शुल्कों, उपकरों, टैक्सों और बढ़ती कीमतों से घिरता जा रहा है।


* सड़क पर चले तो टोल।

* ईंधन भरवाएँ तो कर।

* बैंक खाता रखें तो शुल्क।

* मोबाइल सेवा लें तो शुल्क।

* रसोई चलाएँ तो महँगा सिलेंडर।


यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि सरकार नागरिक को एक सहभागी के रूप में नहीं, बल्कि राजस्व के स्रोत के रूप में देखने लगी है। लोकतंत्र में यह भावना अत्यंत खतरनाक होती है। क्योंकि जब जनता यह महसूस करने लगे कि राज्य उसके जीवन को आसान बनाने के बजाय लगातार महँगा बना रहा है, तब विश्वास का संकट पैदा होता है।


## असली सवाल


इस सम्पूर्ण बहस का मूल प्रश्न केवल LPG नहीं है। मूल प्रश्न शासन की प्राथमिकताओं का है।


* क्या विकास का अर्थ केवल बड़े निवेश, ऊँचे शेयर बाजार और चमकदार आर्थिक घोषणाएँ हैं?

* या विकास का अर्थ यह भी है कि एक सामान्य परिवार सम्मानपूर्वक अपना जीवन जी सके?


* क्या आर्थिक सफलता का पैमाना केवल कॉरपोरेट बैलेंस शीट होनी चाहिए?

* या फिर उस रसोई की स्थिति भी जिसमें देश की अधिकांश आबादी अपना जीवन बिताती है?


## जनता की सहनशीलता की भी एक सीमा होती है


इतिहास गवाह है कि समाज केवल राजनीतिक अधिकारों के लिए ही नहीं, आर्थिक न्याय के लिए भी आवाज़ उठाता है। जब रोज़मर्रा का जीवन लगातार महँगा होता जाता है, जब आय और व्यय के बीच की खाई बढ़ती जाती है, जब नागरिक को हर मोर्चे पर अतिरिक्त भुगतान करना पड़ता है, तब असंतोष धीरे-धीरे सामाजिक प्रश्न में बदल जाता है।


₹942 का सिलेंडर केवल एक मूल्य नहीं है। यह एक प्रतीक है। उस व्यवस्था का प्रतीक जिसमें आम आदमी से लगातार अधिक त्याग की अपेक्षा की जाती है, जबकि उसे बदले में मिलने वाली राहत सीमित होती जाती है।


* सरकारें आती-जाती रहती हैं।

* नीतियाँ बदलती रहती हैं।


लेकिन लोकतंत्र का एक शाश्वत सिद्धांत है—किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके नागरिकों की क्रय-शक्ति, सम्मान और जीवन की गुणवत्ता में निहित होती है।


यदि रसोई कमजोर होगी, तो अर्थव्यवस्था की चमक भी अंततः फीकी पड़ जाएगी। और यदि जनता को केवल राजस्व का स्रोत समझा जाएगा, तो एक दिन वही जनता यह पूछेगी कि विकास आखिर किसके लिए हुआ था।