लोकतंत्र का विदूषक: भारतीय मीडिया की दशा, दुर्दशा और दिशा

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


लोकतंत्र का विदूषक: भारतीय मीडिया की दशा, दुर्दशा और दिशा

## बुखार बनाम कैंसर (लक्षण और रोग का भ्रम)

हर रात ठीक नौ बजे जब आपके ड्राइंग रूम में टीवी स्क्रीन लाल और पीली पट्टियों से सुसज्जित होती है, और एक कड़कती हुई आवाज़ आपके भीतर भय, नफरत और उत्तेजना का रसायन घोलना शुरू करती है, तो आप सोचते हैं कि भारतीय मीडिया बीमार हो गया है। आप इसे 'गोदी मीडिया' कहते हैं, आप इसे 'सस्ते टीआरपी का अखाड़ा' कहते हैं।

परंतु ठहरिए! यह मीडिया की बीमारी नहीं है। यह तो सिर्फ बुखार है—एक ऐसा लक्षण जो यह बता रहा है कि भीतर शरीर को किसी गहरे कैंसर ने जकड़ लिया है। जब किसी समाज में बेरोजगारी, बदहाल स्कूल, टपकती अस्पताल की छतें और किसानों की अर्थियाँ 'लो टीआरपी कंटेंट' बन जाएं और किसी मौलवी की दाढ़ी या पंडित का तिलक 'प्राइम टाइम' की हेडलाइन बन जाए, तो समझ लीजिए कि खराबी सिर्फ कैमरे के आगे बैठे एंकर में नहीं है; खराबी उस पूरी व्यवस्था और चेतना में है जिसने इस तमाशे को अपनी मौन स्वीकृति दे दी है।


१. 'ब्रेड एंड सर्कस' का आधुनिक कोलोसियम


प्राचीन रोम के सम्राटों के पास एक अचूक फॉर्मूला था—"ब्रेड एंड सर्कस" (रोटी और तमाशा)। जब भी साम्राज्य में भुखमरी फैलती, आर्थिक संकट गहराता या राजा की अकर्मण्यता पर सवाल उठते, सम्राट कोलोसियम के बड़े-बड़े अखाड़ों में खूंखार शेरों और ग्लैडिएटरों (गुलाम योद्धाओं) की खूनी लड़ाई का आयोजन करवा देता था। भूखी जनता अपनी खाली थाली भूलकर उस अखाड़े के रोमांच में चीखने-चिल्लाने लगती थी।


आज दो हजार साल बाद भी सत्ता का वह क्रूर फॉर्मूला बदला नहीं है, बस उसका भूगोल बदल गया है। आज कोलोसियम की जगह टीवी स्टूडियो ने ले ली है, शेरों की जगह चिल्लाते हुए बदतमीज एंकर बैठ गए हैं, और ग्लैडिएटरों की जगह अलग-अलग धर्मों के ठेकेदार। परिणाम वही है—"रोटी कम पड़ जाए, तो तमाशा बढ़ा दो।"

[प्राचीन रोम का कोलोसियम]-(रूपांतरण)>[मॉर्डन टीवी स्टूडियो]

(भूख बनाम खूनी खेल) (बेरोजगारी v/s 

                                                                  हिंदू-मुस्लिम डिबेट)


कभी सोचा है कि दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक भारत में, जहाँ हर साल लाखों नौजवान डिग्री के टुकड़े हाथ में लिए दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते बूढ़े हो रहे हैं, वहाँ युवाओं के रोजगार पर 'विशेष शो' क्यों नहीं चलता? क्योंकि सच दिखाना जोखिम भरा है; उसमें सत्ता से सवाल पूछना पड़ता है। इसके विपरीत, किसी धर्मगुरु का विवादित बयान दिखाना बेहद सुरक्षित और सस्ता है। उसमें किसी को जवाबदेह नहीं ठहराना पड़ता, बस दो पक्षों को आपस में लड़ाकर करोड़ों का विज्ञापन समेटना होता है।


२. आर्थिक संकट से बड़ा बौद्धिक संकट: चरित्र प्रमाण पत्र का दौर


भारतीय मीडिया की इस दुर्दशा ने समाज में एक गहरा 'बौद्धिक दिवालियापन' पैदा कर दिया है। हमने इतिहास के सबसे खतरनाक समझौते को स्वीकार कर लिया है—"हमने बदलते हुए मीडिया को 'नॉर्मल' (सामान्य) मान लिया है।"


* हमने मान लिया है कि पत्रकार का काम अब सत्ता के गलियारों में असहज करने वाले सवाल पूछना नहीं, बल्कि विपक्ष से जवाब मांगना है।

* हमने मान लिया है कि न्यूज चैनल सूचना देने का माध्यम नहीं, बल्कि खुद ही पुलिस, अदालत, जज और जल्लाद हैं जो लाइव स्क्रीन पर किसी का भी 'मीडिया ट्रायल' करके उसका चरित्र हनन कर सकते हैं।


आज देश का सबसे बड़ा संकट आर्थिक नहीं, बल्कि बौद्धिक है। हमने सोचना और तर्क करना छोड़ दिया है। जब कोई साहसी नागरिक या पत्रकार आंकड़ों के साथ खड़े होकर सरकार से शिक्षा, स्वास्थ्य या महंगाई पर सवाल पूछता है, तो व्यवस्था और उसके पालतू एंकर उसे 'तथ्य' से जवाब नहीं देते। वे झट से उसकी निष्ठा का 'चरित्र प्रमाण पत्र' मांगने लगते हैं: "तुम किस टूलकिट के हिस्से हो? तुम्हारा धर्म क्या है? तुम्हारी पार्टी कौन सी है?"


३. नफरत का समाजशास्त्र: जब पड़ोसी दुश्मन बन जाए


इस प्रायोजित शोर का सबसे दुखद और भयावह दृश्य वह नहीं है जब कोई करोड़पति एंकर कैमरे के सामने सफेद झूठ बोलता है। सबसे वीभत्स दृश्य तो आपके पड़ोस की उस गली में दिखता है, जहाँ करोड़ों आम लोग उस झूठ को सच मानकर अपने ही उस पड़ोसी से नफरत करने लगते हैं जिसके साथ उन्होंने कल शाम तक चाय पी थी।


यह मीडिया आपके अवचेतन में धीरे-धीरे यह जहर घोलता है कि आपकी बदहाली का कारण सरकार की नीतियां नहीं, बल्कि बगल वाले घर में रहने वाला दूसरे धर्म का व्यक्ति है। परिणाम?


* जिसके बच्चों के साथ आपके बच्चे स्कूल जाते थे, आप उसे शक की निगाह से देखने लगते हैं।

* जिस देश ने अपनी आजादी की लड़ाई साझी शहादत से जीती थी, वह देश टीवी डिबेट के पैमानों पर खुद को टुकड़ों में बांटने लगता है।


परंतु इस नफरत की आड़ में जो सच छुपाया जाता है, वह बहुत क्रूर है। जब महंगाई की मार पड़ती है, तो पेट्रोल पंप पर खड़ा हिंदू भी उतनी ही कीमत चुकाता है जितना मुसलमान। जब गैस सिलेंडर के दाम बढ़ते हैं, तो आंच दोनों की रसोई को सुलगती है। जब अस्पताल में बेड नहीं मिलता, तो तड़प दोनों की साझी होती है। और जब बैंक की ईएमआई (EMI) भरनी होती है, तो कोई भी बैंक धर्म देखकर ब्याज दरें माफ नहीं करता। लेकिन कितनी कुशलता से, दोनों बेरोजगारों और पीड़ितों को एक-दूसरे के सामने तलवारें लेकर खड़ा कर दिया गया है ताकि वे कभी 'असली खलनायक' की तरफ मुड़कर देख भी न सकें!


४. दिशा और दशा: आईने के सामने खड़ा समाज


गंभीरता से सोचें, तो यह गोदी मीडिया कोई बाहरी आक्रमणकारी नहीं है। यह तो केवल एक आईना है।


# मीडिया : 

* वर्तमान स्थिति (दुर्दशा) : सत्ता का लाउडस्पीकर और जन-मुद्दों से भटकाव। 

* वांछित स्थिति (दिशा) : निष्पक्ष सूचना, खोजी पत्रकारिता और तीखे सवाल। |

# राजनीति : 

* वर्तमान स्थिति (दुर्दशा) : विभाजनकारी विमर्श और जवाबदेही से पलायन। 

* वांछित स्थिति (दिशा : नीतियों, विकास और लोक-कल्याण पर बहस। |

# समाज/नागरिक : 

* वर्तमान स्थिति (दुर्दशा) : अंधभक्ति, पूर्वाग्रह और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी पर निर्भरता। 

* वांछित स्थिति (दिशा) : विवेकशील, प्रश्नकर्ता और जागरूक नागरिकता। |


"किसी देश को तबाह करने के लिए हमेशा सीमाओं पर टैंक और मिसाइलें भेजने की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी इतना ही काफी होता है कि वहाँ की जनता के हाथों में नफरत का रिमोट कंट्रोल थमा दिया जाए।"


जब जनता का ध्यान उसके भविष्य से हटाकर अतीत के विवादों में उलझा दिया जाता है, उसे इतना व्यस्त कर दिया जाता है कि वह अपने बच्चों की शिक्षा के बारे में सोच ही न सके, उसे इतना क्रोधित कर दिया जाए कि उसकी सोचने की क्षमता मर जाए—तो समझ लीजिए कि बिना किसी युद्ध के वह देश भीतर से हार चुका है।


## विवेक की आवाज़ ही एकमात्र विकल्प है


इस दुर्दशा की दिशा तब तक नहीं बदलेगी, जब तक हम स्वयं को नहीं बदलेंगे। बीमारी हम भी हैं—जब हम तथ्यों की जांच किए बिना 'व्हाट्सएप फॉरवर्ड्स' को सच मान लेते हैं, जब हम किसी तार्किक सवाल के जवाब में गाली देना शुरू कर देते हैं, और जब हम एक सजग 'नागरिक' होने से पहले किसी नेता के 'भक्त' या 'विरोधी' बन जाते हैं।


याद रखिए, लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी संसद या उसका वोट बैंक नहीं होती; लोकतंत्र की वास्तविक रीढ़ 'सोचने वाला, प्रश्न पूछने वाला नागरिक' होता है।


जिस दिन इस देश की जनता टीवी के रिमोट को बंद करके अपने विवेक की खिड़की खोलेगी, जिस दिन वह एंकरों के चिल्लाने पर तालियाँ बजाने के बजाय उनसे अपने बच्चों की नौकरियों का हिसाब मांगेगी—उस दिन किसी गोदी मीडिया, किसी पेड-प्रचारक और किसी भी नकली राष्ट्रवाद की बिसात नहीं बचेगी कि वह आपको मूर्ख बना सके। देश चैनलों के बदलने से नहीं, हमारे बदलने से बदलेगा। टीवी के शोर को खारिज कीजिए और अपने भीतर के विवेक को आवाज़ दीजिए!