अदृश्य ढाँचा, दृश्य प्रभाव: जवाबदेही, पारदर्शिता और भारतीय लोकतंत्र की परीक्षा
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
अदृश्य ढाँचा, दृश्य प्रभाव: जवाबदेही, पारदर्शिता और भारतीय लोकतंत्र की परीक्षा
भारतीय लोकतंत्र में सबसे कठिन प्रश्न अक्सर वही होते हैं जिनका उत्तर कानून, परंपरा और प्रभाव—तीनों की धुंध में छिपा दिया जाता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर उठने वाला सवाल भी इसी श्रेणी में आता है: एक ऐसा संगठन, जिसका सार्वजनिक प्रभाव असंदिग्ध है, लेकिन जिसकी संगठनात्मक संरचना, औपचारिक सदस्यता, वित्तीय पारदर्शिता और विधिक पहचान पर बहस बार-बार लौट आती है। RSS की अपनी FAQ कहती है कि संगठन में “formal membership enrolment” नहीं है; कोई शुल्क, रजिस्ट्रेशन फॉर्म या औपचारिक आवेदन नहीं है, और शाखा ही मूल इकाई है। यह भी कहा गया है कि जो शाखा में नियमित रूप से आता है, वही स्वयंसेवक माना जाता है।
यही वह बिंदु है जहाँ सवाल भावनात्मक नहीं, संस्थागत हो जाता है। हाल के वर्षों में RSS की कानूनी और सार्वजनिक पहचान पर बहस तेज़ हुई है। 2025 में RSS प्रमुख मोहन भागवत ने सार्वजनिक रूप से यह दलील दी कि 1925 में ब्रिटिश शासन के दौरान संगठन का पंजीकरण अपेक्षित नहीं था, स्वतंत्र भारत में पंजीकरण अनिवार्य नहीं किया गया, और RSS को “body of individuals” के रूप में मान्यता मिली है। समाचार रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने यह भी कहा कि अदालतें और आयकर विभाग RSS को इसी श्रेणी में देखते रहे हैं। यह उनका पक्ष है; लेकिन यही पक्ष अपने-आप में यह स्वीकार भी करता है कि संगठन की विधिक संरचना पर अस्पष्टता बनी हुई है।
लोकतंत्र में प्रभाव का मूल्यांकन केवल चुनावी सफलता से नहीं होता, बल्कि इस बात से भी होता है कि कोई संस्था किस हद तक सार्वजनिक जवाबदेही स्वीकार करती है। यदि किसी संगठन की गतिविधियाँ व्यापक हों, उसकी शाखाएँ देशभर में फैली हों, और उसका सांस्कृतिक, शैक्षिक तथा सामाजिक प्रभाव गहरा हो, तो उसके लिए पारदर्शिता का मानक साधारण नागरिक या छोटे संगठन से कम नहीं, बल्कि अधिक होना चाहिए। RSS की अपनी सामग्री बताती है कि उसका दायरा शाखाओं, प्रशिक्षण-शिविरों और लाखों स्वयंसेवकों के माध्यम से फैला हुआ है; संगठन अपने वार्षिक प्रतिवेदनों में भी देशव्यापी उपस्थिति का दावा करता है।
इतिहास का संदर्भ इस बहस को और गहरा करता है। RSS की अपनी वेबसाइट के अनुसार संगठन पर 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद प्रतिबंध लगा था और 1975 के आपातकाल में भी वह प्रतिबंधित रहा। यह तथ्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाता है कि राज्य और संघ के संबंध कभी सरल नहीं रहे; वे हमेशा तनाव, अविश्वास और वैचारिक टकराव से परिभाषित होते रहे हैं। ऐसे में जब संगठन आज “हमारे पास औपचारिक सदस्यता नहीं है” या “हम body of individuals हैं” जैसा तर्क देता है, तो प्रश्न और भी तीखा हो जाता है: क्या कोई इतना बड़ा सार्वजनिक प्रभाव रखते हुए भी वैसी ही पारदर्शिता से बच सकता है जैसी हम राजनीतिक दलों, कंपनियों और अन्य संस्थाओं से अपेक्षा करते हैं?
यहाँ एक सावधान, लेकिन जरूरी, विश्लेषण सामने आता है। RSS का ढाँचा केंद्रीकृत कॉरपोरेट संगठन जैसा नहीं है; उसकी संरचना शाखा-आधारित, विकेंद्रीकृत और नेटवर्क-जैसी है। यही विकेंद्रीकरण उसकी शक्ति भी है और उसकी अपारदर्शिता का कारण भी। जहाँ कोई एक केंद्रीय खाता, एक स्पष्ट सदस्यता-रजिस्टर, या एक मानक कॉर्पोरेट पिरामिड नहीं होता, वहाँ जिम्मेदारी की श्रृंखला धुंधली हो जाती है। यह एक तथ्य से निकला हुआ विश्लेषण है, आरोप नहीं। RSS की खुद की FAQ और संगठनात्मक विवरण इस विकेंद्रीकृत स्वरूप की पुष्टि करते हैं।
लोकतांत्रिक दृष्टि से असली प्रश्न यह नहीं है कि कोई संगठन “है” या “नहीं है”। असली प्रश्न यह है कि वह किस प्रकार जवाबदेह है, किसके प्रति जवाबदेह है, और उसके संसाधन, नेटवर्क तथा प्रभाव की निगरानी किन नियमों से होती है। यदि एक साधारण नागरिक, दुकान, संस्था या संगठन को कर, रजिस्ट्रेशन, रिपोर्टिंग और अनुपालन के कठोर ढाँचों से गुजरना पड़ता है, तो व्यापक सामाजिक प्रभाव वाली शक्ति-संरचना को केवल परंपरा या सांस्कृतिक पहचान के नाम पर पूर्ण छूट मिलनी चाहिए या नहीं—यही राष्ट्रीय बहस का केंद्रीय प्रश्न है।
यह बहस किसी एक विचारधारा के खिलाफ नहीं, बल्कि शक्ति के हर ऐसे रूप के विरुद्ध है जो स्वयं को सार्वजनिक जांच से ऊपर समझने लगे। भारत जैसे लोकतंत्र में समस्या तब पैदा होती है जब राजनीतिक प्रभाव, सामाजिक संगठन और सांस्कृतिक वैधता एक ही जगह आकर पारदर्शिता की माँग को कमजोर कर दें। तब कानून केवल कमजोर पर लागू होता दिखाई देता है, और प्रभावशाली नेटवर्क पर नहीं। यह असमानता ही संस्थागत अविश्वास को जन्म देती है।
RSS समर्थक यह कह सकते हैं कि यह संगठन राजनीतिक दल नहीं है, सदस्यता-आधारित कंपनी नहीं है, और उसकी प्रकृति सेवा तथा अनुशासन की है। यह बात आंशिक रूप से सही हो सकती है। RSS की अपनी सामग्री भी उसे शाखा-आधारित, सांस्कृतिक और संगठनात्मक आंदोलन के रूप में प्रस्तुत करती है। लेकिन यही बात पारदर्शिता की आवश्यकता को कम नहीं करती; उलटे, बढ़ाती है। क्योंकि जितना व्यापक प्रभाव, उतनी बड़ी जवाबदेही।
एक आधुनिक गणतंत्र में यह मानक स्वीकार्य नहीं कि जिस संस्था का सार्वजनिक प्रभाव प्रधानमंत्री-स्तर के नेतृत्व, शिक्षा-नीति, सामाजिक विमर्श और प्रशासनिक संस्कार तक महसूस किया जाए, उसकी विधिक और वित्तीय संरचना पर प्रश्न ही न उठाया जा सके। अगर संगठन स्वयं कहता है कि उसमें औपचारिक सदस्यता नहीं, तो उसे यह भी बताना होगा कि निर्णय किससे होते हैं, संसाधन कहाँ से आते हैं, और सार्वजनिक प्रभाव किस प्रक्रिया से बनता है। यही लोकतांत्रिक सभ्यता है। यही संस्थागत नैतिकता है। यही सार्वजनिक जीवन का न्यूनतम अनुशासन है।
इसलिए इस पूरे प्रसंग को किसी एक संगठन-समर्थन या विरोध की भाषा में नहीं, बल्कि राज्य, समाज और सत्ता की पारदर्शिता की कसौटी पर पढ़ना चाहिए। सवाल यह नहीं कि किसके पास ताकत है। सवाल यह है कि ताकत किस हद तक दिखाई देती है, समझी जा सकती है, और जवाबदेह बनाई जा सकती है। जब तक इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता, तब तक “अदृश्य साम्राज्य” जैसा वाक्य केवल अलंकार नहीं, लोकतंत्र की वास्तविक चिंता बना रहेगा।
