आँकड़ों की चमक बनाम ज़मीन की हकीकत: एक तथ्य-जांचित संपादकीय

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


आँकड़ों की चमक बनाम ज़मीन की हकीकत: एक तथ्य-जांचित संपादकीय

यह बहस “विकास हुआ या नहीं” की कम, और “विकास को कैसे गिना गया” की ज़्यादा है। सरकारी दावों में अक्सर चालू, स्वीकृत, निर्माणाधीन, योजना-स्तर और वास्तव में उपयोग में आ रही संपत्तियाँ एक ही फ्रेम में दिखा दी जाती हैं। इसलिए किसी भी बड़े दावे को उसकी परिभाषा के साथ पढ़ना पड़ता है — और यही वजह है कि AAI, CAG, NHAI, RBI, PIB, MNRE और CEA के आँकड़े साथ रखकर देखने पर तस्वीर न तो पूरी तरह प्रचार की बनती है, न ही पूरी तरह भ्रम की।

हवाईअड्डों के मामले में सरकार का “74 से 160+” वाला दावा पूरी तरह हवा में नहीं है: AAI स्वयं कहता है कि भारत में संचालनरत हवाईअड्डे 2014 के 74 से बढ़कर 2025 में 164 हो गए। लेकिन इसी विस्तार के भीतर CAG की UDAN ऑडिट रिपोर्ट बहुत कठिन सवाल उठाती है: UDAN-3 तक आवंटित 774 रूट्स में से 403, यानी 52%, संचालन शुरू ही नहीं कर पाए; और शुरू हुए 371 रूट्स में केवल 112, यानी 30%, तीन साल टिक सके। CAG ने यह भी दर्ज किया कि 83 airports/heliports/water aerodromes पर संचालन शुरू ही नहीं हुआ या बाद में बंद हो गया, जबकि उस पर ₹1,089 करोड़ खर्च हो चुके थे। इसका निष्कर्ष यही है कि संख्या बढ़ी है, पर regional connectivity की सफलता उतनी रेखीय नहीं रही जितनी मंचों पर दिखाई गई।


सड़कों में भी तस्वीर “फर्जी” से ज्यादा “metric mixing” की है। NHAI की 2023-24 वार्षिक रिपोर्ट कहती है कि 31 मार्च 2024 तक 7,214 किमी high-speed corridors award किए जा चुके थे, जिनमें 2,432 किमी expressways और 4,781 किमी access-controlled corridors शामिल थे; और 7,371 किमी ऐसे corridors planned या विभिन्न चरणों में development में थे। वहीं 2022-23 की NHAI रिपोर्ट national highways/expressways की कुल लंबाई 1,44,955 किमी बताती है। इसलिए “6,700 किमी expressway” जैसे दावे अक्सर एक ही breath में corridor length, access control और lane expansion को मिलाकर बोले जाते हैं; यह सड़क निर्माण की उपलब्धि को झूठ नहीं बनाता, लेकिन उसे समझने के लिए उसके पैमाने को ठीक से पढ़ना पड़ता है। टोल वसूली भी शून्य नहीं है: MoRTH/NHAI के आधिकारिक बयानों के अनुसार FASTag से औसत दैनिक संग्रह FY 2025-26 में लगभग ₹184–186 करोड़ रहा।


मेट्रो का मामला भी इसी तरह का है। 2014 में भारत में मेट्रो नेटवर्क 248 किमी और 5 शहरों तक सीमित था; मई 2025 तक यह 1,013 किमी और 23 शहरों तक पहुँच चुका था, और मार्च 2026 तक 1,143 किमी तथा 29 शहरों का आँकड़ा PIB दे रहा है। दैनिक ridership भी 28 लाख से बढ़कर 1.12–1.15 करोड़ के दायरे में पहुँच चुका है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि मेट्रो सिर्फ फीता काटने की संस्कृति है; हाँ, यह जरूर सही है कि हर नए शहर में शुरू हुई मेट्रो नेटवर्क एक-सी परिपक्व नहीं है, और कुछ कॉरिडोर अभी भी अपने उपयोग और वित्तीय स्थायित्व की परीक्षा से गुजर रहे हैं।


डिजिटल भुगतान पर यह कहना कि 2014 से पहले “कुछ था ही नहीं”, तथ्यात्मक रूप से गलत है। RBI के अनुसार NEFT और RTGS लंबे समय से मौजूद केंद्रीय भुगतान प्रणालियाँ हैं; NPCI के अनुसार IMPS का सार्वजनिक लॉन्च 22 नवंबर 2010 को हुआ; और UPI का पायलट लॉन्च 11 अप्रैल 2016 को हुआ। यानी डिजिटल भुगतान 2014 के पहले भी मौजूद था, लेकिन UPI ने उसे mass scale, interoperability और QR-based व्यवहार में बदल दिया। रक्षा निर्यात के दावे भी आंशिक रूप से सही हैं: PIB के अनुसार FY 2024-25 में भारत का defence exports ₹23,622 करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँचा, लेकिन SIPRI अब भी भारत को 2020-24 अवधि में दुनिया के दूसरे सबसे बड़े arms importer के रूप में दर्ज करता है। इसलिए “निर्यात बढ़ा” कहना सही है, पर “आयात निर्भरता खत्म हो गई” कहना गलत होगा।


ऊर्जा और नवीकरणीय क्षेत्र में भी प्रचार और वास्तविकता को अलग करना ज़रूरी है। MNRE के आधिकारिक आँकड़े बताते हैं कि भारत की solar installed capacity 2014 के 2.82 GW से बढ़कर मई 2026 तक 157.05 GW हो चुकी है, और 13 अगस्त 2025 तक solar PV module manufacturing capacity 100 GW के आँकड़े तक पहुँच गई। यानी यह कहना कि सौर क्षमता सिर्फ कागज़ पर चमकी, सही नहीं होगा। दूसरी तरफ CEA के planning document साफ कहते हैं कि coal and lignite अभी भी बिजली मिश्रण में dominant हैं; 2026-27 के लिए coal share लगभग 64% के आसपास आँकी गई है। निष्कर्ष यह है कि स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार वास्तविक है, लेकिन coal dependence अभी भी एक कठोर तथ्य है, जिसे राजनीतिक नारों से नहीं मिटाया जा सकता।


एथेनॉल और सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में भी सरकार की कहानी एक-आयामी नहीं है। PIB ने 20% ethanol blending को 2025-26 लक्ष्य तक आगे बढ़ाने की पुष्टि की है, और यह भी स्वीकार किया है कि ethanol molasses के अलावा maize, damaged food grains और FCI rice से भी बनाया जा रहा है। इसलिए food-feed-fuel trade-off की आलोचना पूरी तरह बेबुनियाद नहीं है; लेकिन यह कहना कि देश में “अन्न संकट” सिद्ध हो गया है, एक राजनीतिक निष्कर्ष होगा, न कि आधिकारिक तथ्य। सेमीकंडक्टर पर PIB के अनुसार दिसंबर 2025 तक 10 projects मंजूर हुए थे, कुल निवेश ₹1.60 lakh crore का, जिनमें 2 fabs और 8 packaging units शामिल हैं; pilot production 4 units में शुरू भी हो चुकी थी। इसलिए इसे केवल packaging का खेल कहना भी अधूरा है, और इसे “अभी पूर्ण आत्मनिर्भरता” बताना भी जल्दबाज़ी होगी। यही वह जगह है जहाँ तथ्य-जांच सबसे ज़रूरी हो जाती है। 


अंततः, सबसे ईमानदार संपादकीय निष्कर्ष यह है: सरकार ने कुछ क्षेत्रों में वास्तविक भौतिक विस्तार किया है, लेकिन बहुत-से headline numbers ऐसे ढंग से प्रस्तुत किए गए हैं कि completed utility, sanctioned capacity और operational success एक ही चीज़ लगें। हवाईअड्डों में CAG की आलोचना गंभीर है; roads, metros, renewables और digital payments में विस्तार वास्तविक है; defence exports बढ़े हैं, पर imports भी ऊँचे हैं; और semiconductors अभी शुरुआती चरण में हैं। इसलिए सही आलोचना “सब झूठ है” नहीं, बल्कि यह है कि विकास की भाषा में metric inflation, category blurring और political branding बहुत ज़्यादा है। तथ्य यही कहते हैं कि उपलब्धियाँ भी हैं, कमियाँ भी; और बड़े लोकतंत्र में दोनों को एक साथ देखना ही ज़िम्मेदारी है।