विषमता का तमाशा: ८० करोड़ याचक और एशिया का शीर्ष अमीर—एक राष्ट्रीय आत्मचिंतन

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला

विषमता का तमाशा: ८० करोड़ याचक और एशिया का शीर्ष अमीर—एक राष्ट्रीय आत्मचिंतन

१. विरोधाभास की पराकाष्ठा

किसी भी विकासशील राष्ट्र के सामाजिक और आर्थिक स्वास्थ्य का सबसे प्रामाणिक पैमाना यह नहीं होता कि उसकी भौगोलिक सीमाओं के भीतर कितनी अकूत संपदा का सृजन हो रहा है। वास्तविक पैमाना यह होता है कि उस सृजित संपदा का प्रवाह समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक किस अनुपात में हो रहा है। आज का समकालीन भारत एक ऐसे विचित्र और त्रासद विरोधाभास के चौराहे पर खड़ा है, जहाँ एक ओर देश की लगभग ७० प्रतिशत आबादी (८० करोड़ लोग) जीवन जीने की बुनियादी आवश्यकता यानी 'राशन' के लिए सरकारी सहायता पर निर्भर है, और दूसरी ओर उसी देश का एक नागरिक पूरे एशिया महाद्वीप—जिसमें चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसी आर्थिक महाशक्तियां शामिल हैं—का सबसे अमीर शख्स बन जाता है।


यह स्थिति केवल आर्थिक असमानता का आंकड़ा भर नहीं है, यह हमारे राष्ट्रीय चरित्र, हमारी प्राथमिकताओं और हमारी सामूहिक चेतना पर एक अत्यंत गंभीर प्रश्नचिह्न है। क्या यह वास्तव में 'गर्व' का विषय है, या यह हमारी व्यवस्थागत विफलता की सबसे तीखी गूँज है?


२. आर्थिक परिप्रेक्ष्य: संसाधनों का संकेंद्रण बनाम 'ट्रिकल-डाउन' का भ्रम


अर्थशास्त्र का एक पुराना सिद्धांत है जिसे 'ट्रिकल-डाउन थ्योरी' (Trickle-Down Theory) कहा जाता है। इसके अनुसार, यदि शीर्ष पर पूंजी का संचय होगा, तो वह धीरे-धीरे रिसकर नीचे आम जनता तक पहुँचेगी और रोज़गार व समृद्धि का निर्माण करेगी। परंतु, भारतीय संदर्भ में यह सिद्धांत पूरी तरह विफल और बेअसर साबित हुआ है।


ऑक्सफैम (Oxfam) जैसी वैश्विक संस्थाओं की रिपोर्ट्स लगातार इस कड़वी सच्चाई को उजागर करती रही हैं कि भारत की शीर्ष १% आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का ४०% से अधिक हिस्सा है। जब संसाधनों का ऐसा उग्र संकेंद्रण (Extreme Concentration of Wealth) होता है, तो वह मुक्त बाज़ार का विकास नहीं, बल्कि 'क्रोनी कैपिटलिज्म' (Crony Capitalism) का पोषण करता है।


यदि देश का एक व्यक्ति विकसित देशों (जैसे चीन या जापान) के अरबपतियों को पछाड़कर शीर्ष पर पहुँच रहा है, तो इसका सीधा आर्थिक निहितार्थ यह है कि देश के प्राकृतिक, वित्तीय और डिजिटल संसाधनों पर मुट्ठी भर कॉर्पोरेट्स का एकाधिकार स्थापित हो चुका है। यदि यह विकास समावेशी (Inclusive) होता, तो देश की क्रय शक्ति (Purchasing Power) बढ़ती और ८० करोड़ लोगों को मुफ्त राशन की कतार में खड़े होने की आवश्यकता नहीं रह जाती।


३. सामाजिक एवं दार्शनिक परिप्रेक्ष्य: नागरिकता का अवमूल्यन और 'याचक समाज' का निर्माण


एक लोक-कल्याणकारी राज्य (Welfare State) की दार्शनिक नींव इस बात पर टिकी होती है कि वह अपने नागरिकों को 'स्वावलंबी' बनाए, न कि 'आश्रित'। ८० करोड़ लोगों को सरकारी राशन देना किसी भी सरकार की तात्कालिक मजबूरी या राहत हो सकती है, लेकिन इसे एक दीर्घकालिक नीति या उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करना सामाजिक पतन का सूचक है।


जब समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा केवल दो वक्त की रोटी के संघर्ष में उलझा रहेगा, तो वह शिक्षा, स्वास्थ्य, कला और अधिकारों के प्रति सचेत कैसे होगा? इस विषमता ने समाज को दो स्पष्ट वर्गों में विभाजित कर दिया है:


* प्रथम वर्ग: जो देश के नीतिगत फैसलों, मीडिया और संसाधनों को नियंत्रित करता है।

* द्वितीय वर्ग: जो केवल सरकारी योजनाओं का 'याचक' बनकर रह गया है।


यह स्थिति किसी भी परिपक्व लोकतंत्र के लिए अत्यंत चिंताजनक है क्योंकि यहाँ नागरिक अपनी संप्रभुता खोकर केवल एक 'लाभार्थी' (Beneficiary) में तब्दील हो जाता है।


४. मीडिया का दृष्टिकोण: 'छद्म राष्ट्र-गौरव' का ग्लैमर


इस पूरे परिदृश्य में मुख्यधारा के मीडिया की भूमिका सबसे अधिक आत्मघाती रही है। जब भी किसी भारतीय उद्योगपति की संपत्ति में अरबों डॉलर का इजाफा होता है, तो मीडिया इसे 'राष्ट्रीय गौरव' और 'वैश्विक पटल पर भारत की विजय' के रूप में विज्ञापित करता है।


यह दरअसल 'नैरेटिव बिल्डिंग' (Narrative Building) का वह चतुर खेल है, जो वास्तविक संकट से जनता का ध्यान भटकाता है। चीन और जापान जैसे देशों ने अपने अरबपतियों को चमकाने से पहले अपने मध्यम वर्ग को सुदृढ़ किया। चीन ने पिछले तीन दशकों में लगभग ८० करोड़ लोगों को अत्यधिक गरीबी के जाल से बाहर निकाला, जिससे वहाँ एक मजबूत घरेलू बाज़ार तैयार हुआ। इसके विपरीत, हमारे यहाँ मीडिया उस 'ग्लेमर' को बेचता है जो देश के ६ लाख गांवों की झोपड़ियों में बैठी गरीबी को ढँक देता है। किसी एक व्यक्ति की अमीरी पूरे देश का पैमाना कैसे हो सकती है, जबकि देश का मानव विकास सूचकांक (Human Development Index) आज भी निचले पायदानों पर सिसक रहा हो?


५. विधिक एवं नीतिगत सापेक्षता: दोहरी आर्थिक चोट और नीतिगत पक्षपात


एक सजग नागरिक के रूप में यह सोचना बिल्कुल न्यायसंगत है कि यह व्यवस्था किसके हितों की रक्षा कर रही है। देश का आम मध्यवर्गीय और निम्नवर्गीय नागरिक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष (जीएसटी आदि) टैक्स के रूप में सरकार के खजाने को भरता है। इसी धन से सरकारें कॉर्पोरेट्स को टैक्स में छूट (Corporate Tax Cuts), लोन माफी (NPA Write-offs) और बुनियादी ढांचा (Infrastructure) बनाकर देती हैं।


इसके बदले में जब आम नागरिक को बेरोज़गारी, महँगी शिक्षा और बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं मिलती हैं, तो यह उसके साथ होने वाली एक क्रूर आर्थिक चोट है। नीतियों का झुकाव जब आम जनता के बजाय केवल कुछ पूंजीपतियों को लाभ पहुँचाने की ओर होने लगे, तो आर्थिक न्याय की संवैधानिक प्रस्तावना (Constitutional Preamble of Economic Justice) केवल कागज़ों तक सीमित रह जाती है।


६. संदेशात्मक चेतना का आह्वान


यह आलेख इस कड़वे सच को स्वीकार करने की मांग करता है कि "जब तक भूख का साम्राज्य बड़ा रहेगा, तब तक अमीरी के किसी भी शिखर पर गर्व नहीं किया जा सकता।" ८० करोड़ लोगों का राशन लेना देश की संपन्नता का नहीं, बल्कि हमारी आर्थिक नीतियों के खोखलेपन का विज्ञापन है।


अब समय आ गया है कि हम राष्ट्र-गौरव की परिभाषा को बदलें। राष्ट्र का गौरव इस बात से तय नहीं होना चाहिए कि हमारे यहाँ कितने अरबपति पैदा हो रहे हैं, बल्कि इस बात से तय होना चाहिए कि हमने कितने लोगों को गरीबी, कुपोषण और लाचारी की कतारों से मुक्त कराया है। जब तक धन का यह पुनर्वितरण (Redistribution of Wealth) नीतिगत स्तर पर लागू नहीं होता, तब तक ऐसी वैश्विक रैंकिंग्स हमारे सामूहिक गाल पर एक तमाचा हैं, जिसे हम अनजाने में 'पुरस्कार' समझकर मुस्कुरा रहे हैं।