अच्छे दिनों का गणित: किसकी समृद्धि बढ़ी, किसका बोझ बढ़ा?

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


अच्छे दिनों का गणित: किसकी समृद्धि बढ़ी, किसका बोझ बढ़ा?

भारत की राजनीति में कुछ नारे केवल चुनावी घोषणा नहीं होते, वे एक युग की पहचान बन जाते हैं। "अच्छे दिन आने वाले हैं" भी ऐसा ही एक नारा था। यह केवल सत्ता परिवर्तन का वादा नहीं था, बल्कि करोड़ों भारतीयों के जीवन में आर्थिक सुधार, रोजगार, समृद्धि और अवसरों के विस्तार का सपना था।

बारह वर्ष बाद, जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि आखिर उन "अच्छे दिनों" का वास्तविक लाभ किसे मिला? क्या देश का आम नागरिक अधिक समृद्ध हुआ, या समृद्धि का बड़ा हिस्सा समाज के ऊपरी पायदानों पर केंद्रित हो गया? क्या राष्ट्र की आर्थिक शक्ति व्यापक रूप से फैली, या कुछ हाथों में और अधिक सिमटती चली गई? इन प्रश्नों का उत्तर भावनाओं से नहीं, बल्कि तथ्यों और आँकड़ों से खोजा जाना चाहिए।


## आंकड़ों का पहला पाठ: संपत्ति का अभूतपूर्व केंद्रीकरण


पिछले एक दशक में भारत ने आर्थिक विकास भी देखा है और वैश्विक मंच पर अपनी उपस्थिति भी मजबूत की है। लेकिन इसी अवधि में देश के सबसे धनी व्यक्तियों की संपत्ति जिस गति से बढ़ी, उसने आर्थिक असमानता पर नई बहस को जन्म दिया।

मुकेश अंबानी और गौतम अडानी जैसे उद्योगपति आज विश्व के सबसे धनी व्यक्तियों की सूची में शामिल हैं। यह अपने आप में भारत की आर्थिक क्षमता का संकेत भी माना जा सकता है। किसी भारतीय कंपनी का वैश्विक स्तर पर विस्तार होना राष्ट्र के लिए गौरव का विषय है।

किन्तु प्रश्न तब उठता है जब उसी अवधि में करोड़ों युवाओं के लिए रोजगार, किसानों की आय, छोटे व्यापारियों की स्थिति और मध्यम वर्ग की क्रय-शक्ति अपेक्षित गति से नहीं बढ़ती दिखाई देती।


एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था में कुछ लोगों का धनी होना समस्या नहीं है। समस्या तब होती है जब आर्थिक वृद्धि का बड़ा हिस्सा शीर्ष पर केंद्रित होने लगे और नीचे तक उसका लाभ अपेक्षित रूप से न पहुँचे। यही कारण है कि आज दुनिया भर में "वेल्थ कंसन्ट्रेशन" अर्थात् संपत्ति के केंद्रीकरण पर गंभीर चर्चा हो रही है।


## दूसरा पाठ: राजनीतिक दलों की बढ़ती आर्थिक शक्ति


लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को संसाधनों की आवश्यकता होती है। चुनाव महंगे होते हैं, संगठन चलाने के लिए धन चाहिए, प्रचार-प्रसार की लागत होती है।


लेकिन जब किसी राजनीतिक दल की आय और संसाधन उसके प्रतिस्पर्धियों की तुलना में असाधारण रूप से बढ़ने लगते हैं, तब लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा की निष्पक्षता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।


पिछले दशक में देश के प्रमुख राजनीतिक दलों की आय में वृद्धि हुई है, परंतु सबसे अधिक वृद्धि सत्तारूढ़ दल की वित्तीय क्षमता में दिखाई देती है। यहाँ मूल प्रश्न किसी एक दल का नहीं है।


मूल प्रश्न यह है कि क्या भारत का लोकतंत्र आर्थिक रूप से इतना असंतुलित होता जा रहा है कि चुनावी राजनीति भी पूँजी की प्रतिस्पर्धा बनकर रह जाए?


यदि एक पक्ष के पास हजारों करोड़ रुपये की संसाधन-संपन्न व्यवस्था हो और दूसरा पक्ष संसाधनों के लिए संघर्ष कर रहा हो, तो लोकतांत्रिक मैदान तकनीकी रूप से भले बराबर दिखे, व्यवहारिक रूप से बराबर नहीं रह जाता। लोकतंत्र केवल मतदान का अधिकार नहीं है; लोकतंत्र अवसरों की समानता भी है।


## तीसरा पाठ: बढ़ता सार्वजनिक ऋण


अब उस आंकड़े पर आइए जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है—सरकारी ऋण। सरकारें कर्ज़ लेती हैं। यह कोई असामान्य बात नहीं है। दुनिया का लगभग हर देश विकास परियोजनाओं, बुनियादी ढाँचे और सार्वजनिक निवेश के लिए ऋण लेता है।


* प्रश्न यह नहीं है कि कर्ज़ लिया गया या नहीं।

* प्रश्न यह है कि उस कर्ज़ से प्राप्त धन का उपयोग किस प्रकार हुआ।


यदि कर्ज़ लेकर सड़कें, बंदरगाह, रेलवे, ऊर्जा अवसंरचना, डिजिटल नेटवर्क और उत्पादन क्षमता बढ़ाई जाए, तो वह भविष्य के विकास में निवेश माना जाता है। लेकिन यदि ऋण तेजी से बढ़ता जाए और उसके समान अनुपात में रोजगार, उत्पादकता तथा नागरिक आय में वृद्धि न दिखे, तो चिंताएँ उत्पन्न होना स्वाभाविक है।


भारत की सरकारी देनदारियाँ पिछले दशक में उल्लेखनीय रूप से बढ़ी हैं। यह वृद्धि केवल किसी एक सरकार की नहीं, बल्कि वैश्विक महामारी, आर्थिक झटकों, कल्याणकारी योजनाओं और पूँजीगत व्यय के संयुक्त प्रभाव का परिणाम भी है। फिर भी जनता को यह जानने का अधिकार है कि बढ़ते ऋण का दीर्घकालिक बोझ कौन वहन करेगा?


* सरकारी ऋण अंततः किसी न किसी रूप में करदाताओं की जिम्मेदारी बनता है।

* आज नहीं तो कल। प्रत्यक्ष करों, अप्रत्यक्ष करों, महंगाई अथवा भविष्य की वित्तीय नीतियों के माध्यम से।


## चौथा पाठ: GDP बनाम नागरिक समृद्धि


* अक्सर सरकारें GDP वृद्धि का उल्लेख करती हैं।

* GDP महत्वपूर्ण है, लेकिन यह सम्पूर्ण सत्य नहीं है।


यदि GDP बढ़ रही हो, परंतु रोजगार अनुपात संतोषजनक न हो;

यदि शेयर बाजार ऊँचाई पर हो, परंतु वास्तविक मजदूरी स्थिर हो;

यदि अरबपतियों की संख्या बढ़ रही हो, परंतु मध्यम वर्ग करों और महंगाई के दबाव में हो— तो आर्थिक विकास और आर्थिक समृद्धि के बीच का अंतर स्पष्ट दिखाई देने लगता है।


किसी राष्ट्र की सफलता का अंतिम पैमाना उसके अरबपति नहीं होते। उसकी सफलता का अंतिम पैमाना उसके नागरिक होते हैं।


## पाँचवाँ पाठ: क्या यह केवल भारत की समस्या है?


नहीं।


यह पूरी दुनिया की चुनौती है। अमेरिका में भी संपत्ति कुछ हाथों में केंद्रित हुई है। यूरोप में भी असमानता पर बहस है। लैटिन अमेरिका और अफ्रीका में भी यही प्रश्न उठते हैं। लेकिन भारत की स्थिति विशेष है क्योंकि यहाँ लोकतंत्र, जनसंख्या और विकास की आकांक्षाएँ असाधारण रूप से विशाल हैं।


* यदि आर्थिक अवसर व्यापक रूप से वितरित नहीं होंगे, तो सामाजिक असंतोष बढ़ेगा।

* यदि विकास के लाभ नीचे तक नहीं पहुँचेंगे, तो विकास की वैधता पर प्रश्न उठेंगे।

* यदि जनता को केवल सांख्यिकीय उपलब्धियाँ दिखाई जाएँगी और जीवन की वास्तविक कठिनाइयाँ बनी रहेंगी, तो राजनीतिक विमर्श और अधिक ध्रुवीकृत होगा।


## असली प्रश्न


इस पूरे विमर्श का सार किसी उद्योगपति-विरोध या किसी राजनीतिक दल-विरोध में नहीं है।


* भारत को सफल उद्योगपति चाहिए।

* भारत को मजबूत राजनीतिक दल भी चाहिए।

* भारत को विकास के लिए सार्वजनिक निवेश और ऋण भी चाहिए।


लेकिन साथ ही भारत को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि—


* संपत्ति का सृजन हो, पर उसका लाभ व्यापक हो।

* राजनीतिक वित्त पारदर्शी हो।

* सार्वजनिक ऋण उत्तरदायी ढंग से उपयोग हो।

* विकास का लाभ अंतिम नागरिक तक पहुँचे।


क्योंकि लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं होता कि देश में कितने अरबपति हैं।


सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह होता है कि क्या देश का सामान्य नागरिक अपने बच्चों के लिए पहले से बेहतर जीवन की उम्मीद कर सकता है। और "अच्छे दिनों" की वास्तविक परीक्षा भी अंततः वहीं होती है—शेयर बाज़ार के सूचकांक पर नहीं, अरबपतियों की सूची पर नहीं, बल्कि उस साधारण भारतीय के जीवन में, जो हर चुनाव में विश्वास के साथ मतदान करता है और हर बार यह उम्मीद करता है कि विकास की कहानी में उसका भी एक अध्याय होगा।