वैदिक-सनातन-संस्कृति में एकत्व और अनेकत्व
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
वैदिक-सनातन-संस्कृति में एकत्व और अनेकत्व
(दार्शनिक समन्वय, प्रस्थानत्रयी का अनुशीलन और अद्वैत की अंतिम परिणति)
वैदिक-सनातन-संस्कृति संसार की उन विरल और प्राचीनतम प्रज्ञा-परम्पराओं में से है, जिसने विविधता को कभी विघटन का पर्याय नहीं माना। उसने मतभेदों को संघर्ष का कारण समझने के स्थान पर उन्हें सत्य की बहुस्तरीय अभिव्यक्ति के रूप में स्वीकार किया। यही कारण है कि भारतीय मनीषा में “एक” और “अनेक” परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक तत्त्व हैं। बाह्य दृष्टि से जगत में असंख्य रूप, नाम, मार्ग, संप्रदाय और उपासनाएँ दिखाई देती हैं, परन्तु गहन तात्त्विक दृष्टि से सबका लक्ष्य एक ही है—उस परम सत्य की उपलब्धि, जो शब्द, रूप, काल और सीमा से परे है।
सनातन दृष्टि का मूल यह है कि सत्य किसी एक भाषा, एक पद्धति, एक संप्रदाय या एक बौद्धिक प्रणाली में बंद नहीं किया जा सकता। वह अनन्त है; इसलिए उसकी अभिव्यक्तियाँ भी अनन्त हो सकती हैं। इसी भाव को ऋग्वेद के सुप्रसिद्ध मंत्र “एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति” में अत्यन्त संक्षेप और गरिमा के साथ व्यक्त किया गया है। सत्य एक है, किन्तु ज्ञानीजन उसे अपनी दृष्टि, अपनी साधना, अपने संस्कार और अपने आध्यात्मिक अधिकार के अनुसार अनेक रूपों में कहते हैं। यह अनेकत्व सत्य का खंडन नहीं, बल्कि उसके ऐश्वर्य का प्रमाण है।
## देह-जीव न्याय : एकत्व में अनेकत्व का सजीव प्रतीक
इस समन्वय को समझाने के लिए भारतीय दार्शनिक परम्परा ने देह-जीव न्याय को बार-बार अपनाया है। शरीर एक है, पर उसमें असंख्य अंग, तंत्र, क्रियाएँ और प्रवृत्तियाँ विद्यमान हैं। आँख देखती है, कान सुनता है, जिह्वा रस का अनुभव करती है, हाथ ग्रहण करते हैं, पैर गति देते हैं। फिर भी इन सबकी चेतना एक ही जीव में एकीकृत रहती है। यदि शरीर के किसी अंग का कार्य भिन्न है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसके पीछे की चेतना भिन्न है। भिन्नता कार्य में है, सत्ता में नहीं।
इसी प्रकार समस्त विश्व एक विराट शरीर के समान है। उसमें विविध प्राणी, मत, भाषा, संस्कार, संस्कृति और साधनाएँ हैं। कोई ज्ञान-मार्ग से चलता है, कोई भक्ति-मार्ग से, कोई कर्म-मार्ग से, कोई योग-मार्ग से। परन्तु इनके भीतर स्पंदित चेतना एक ही परम तत्त्व की ही अभिव्यक्ति है। उपाधियाँ बदलती हैं, पर उपहित चैतन्य नहीं बदलता। वस्त्र बदलने से देह नहीं बदलती; नाम बदलने से सत्ता नहीं बदलती; प्रतीक बदलने से सत्य नहीं बदलता। यही सनातन तत्त्वदृष्टि है।
## पंचदेव-उपासना : एक ब्रह्म के अनेक स्वरूप
सनातन धर्म में विविध देव-उपासना की परम्पराएँ इस बात का प्रमाण हैं कि एक ही परम सत्ता अनेक भावों में अनुभूत की जा सकती है। वैष्णव, शैव, शाक्त, सौर और गाणपत्य—ये केवल पृथक सम्प्रदाय नहीं, बल्कि साधक की भिन्न-भिन्न चैतसिक प्रवृत्तियों के अनुरूप विकसित आध्यात्मिक द्वार हैं।
वैष्णव परम्परा में भगवान विष्णु को करुणा, संरक्षण और अनुग्रह का अधिष्ठान माना गया। यहाँ भक्ति, शरणागति और माधुर्य-भाव प्रधान है। शैव परम्परा में शिव को परम वैराग्य, गहन मौन, ज्ञान और समाधि का प्रतीक माना गया। शिव केवल विनाश के देव नहीं, अपितु उस मौन सत्ता के स्वरूप हैं, जहाँ सारे द्वन्द्व विलीन हो जाते हैं। शाक्त परम्परा में आद्याशक्ति को मूल चेतना माना गया, जो सृष्टि, स्थिति और संहार की समग्र ऊर्जा हैं। यहाँ जगत को जड़ नहीं, अपितु चेतन शक्ति का प्राकट्य माना गया है। सौर उपासना में सूर्य को प्रत्यक्ष जीवनदाता, आरोग्यदाता और विश्वात्मा के रूप में देखा गया। गाणपत्य परम्परा में गणेश को बुद्धि, विवेक, आरम्भ और विघ्नविनाश का अधिष्ठाता माना गया।
इन सबके बीच जो गहराई से देखने पर प्रकट होता है, वह यह कि उपासना-भेद साध्य-भेद नहीं हैं। ईश्वर अनेक नहीं; उपासकों की चेतना अनेक है। कोई उसे पुत्र-भाव से भजता है, कोई स्वामी-भाव से, कोई सखा-भाव से, कोई शक्ति-भाव से, कोई निर्गुण ब्रह्म के रूप में। परन्तु सबके मूल में वही एक अनन्त सत्ता है। इसीलिए सनातन परम्परा में इष्टदेव की संकल्पना अत्यन्त वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्त्व रखती है। यह साधक को उसकी प्रकृति के अनुसार ईश्वर से जोड़ती है, न कि उसे एक अमूर्त बौद्धिक आदर्श के भार से दबाती है।
## शास्त्रार्थ की परम्परा : विरोध नहीं, सत्य-परीक्षण की साधना
भारतीय दर्शन में शास्त्रार्थ की परम्परा को कभी साधारण वाद-विवाद नहीं माना गया। यह सत्य की खोज का एक गंभीर साधन था। न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदान्त—इन षड्दर्शनों में तर्क, विश्लेषण, खंडन और मंडन की जो परम्परा विकसित हुई, वह इस बात का प्रमाण है कि भारतीय मनीषा सत्य को अंध-स्वीकृति से नहीं, बल्कि सूक्ष्म परीक्षण से ग्रहण करती थी।
सतही दृष्टि से देखने पर ऐसा लगता है मानो ऋषियों और आचार्यों के बीच तीखा विरोध था। परन्तु गहरे स्तर पर यह विरोध नहीं, साधना के पथ का वैविध्य था। न्याय शास्त्र यदि प्रमाण, तर्क और युक्ति की शुद्धि पर बल देता है, तो सांख्य तत्त्वों के विवेचन द्वारा प्रकृति-पुरुष के भेद को स्पष्ट करता है। योग चित्त की वृत्तियों के निरोध पर बल देता है, मीमांसा कर्म की शुद्धि पर, और वेदान्त ब्रह्म-ज्ञान की अंतिम परिणति पर।
इन सभी की भाषा भिन्न हो सकती है, पर उनकी तपस्या एक है। वे मनुष्य को अज्ञान, आसक्ति, अहंकार और दुःख से मुक्त करना चाहते हैं। यह भेद विषयगत नहीं, पद्धतिगत है। जैसे एक ही रोग को अलग-अलग विशेषज्ञ अलग दृष्टि से देखते हैं, पर सभी का उद्देश्य रोगमुक्ति होता है, वैसे ही दर्शन भी सत्य के विभिन्न कोण हैं, सत्य के विरोधी नहीं।
## प्रस्थानत्रयी : शास्त्रों की एक धारा, व्याख्याओं की अनेकता
भारतीय दार्शनिक परम्परा का प्रामाणिक आधार प्रस्थानत्रयी है—उपनिषद्, भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र। इन तीनों को आधार मानकर आचार्यों ने अपने-अपने दर्शन की स्थापना की। आश्चर्य की बात यह है कि मूल ग्रंथ एक हैं, पर भाष्य अनेक। यही तथ्य इस बात का प्रमाण है कि शास्त्र का आशय एकसूत्रीय नहीं, बहुआयामी है।
आदि शंकराचार्य ने उपनिषदों के अद्वैत को प्रकट किया। उनके लिए अंतिम सत्य ब्रह्म ही है—निर्गुण, निराकार, अखण्ड और अविभाज्य। जीव और ब्रह्म का भेद अविद्या के कारण प्रतीत होता है; ज्ञान के उदय पर वह भेद लुप्त हो जाता है।
रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैत का प्रतिपादन करते हुए कहा कि जीव और जगत ब्रह्म से पृथक नहीं, बल्कि उसके विशेषण हैं। ब्रह्म केवल निराकार चैतन्य नहीं, अपितु गुणसम्पन्न, कृपालु और सगुण है। उनके यहाँ भक्ति और प्रपत्ति मुक्ति के प्रमुख साधन हैं।
वल्लभाचार्य ने शुद्धाद्वैत की प्रतिष्ठा की, जिसमें जगत को ब्रह्म की ही लीला और अभिव्यक्ति माना गया। यहाँ संसार को मिथ्या नहीं, बल्कि ईश्वर के वैभव का प्राकट्य समझा गया। इस दृष्टि में भक्ति केवल उपासना नहीं, बल्कि ईश्वर के अनुग्रह में जीवन का पूर्ण समर्पण है।
निम्बार्काचार्य ने द्वैताद्वैत का मार्ग प्रस्तुत किया, जिसमें भेद और अभेद दोनों को युगपत स्वीकार किया गया। जीव ब्रह्म से भिन्न भी है और अभिन्न भी। यह दृष्टि सम्बन्ध की सूक्ष्मता को उद्घाटित करती है।
मध्वाचार्य ने द्वैत को सुस्पष्ट रूप से स्थापित किया। उनके मत में जीव, जगत और ईश्वर में शाश्वत भेद है। ईश्वर सर्वोच्च है; जीव उसका सेवक है। इस भेद के स्वीकार में विनय, भक्ति और ईश्वर-निर्भरता की गहनता है।
यदि इन सबको परस्पर विरोधी मत मान लिया जाए, तो यह अधूरी दृष्टि होगी। अधिक गहराई से देखने पर स्पष्ट होता है कि ये आचार्य मानवीय आध्यात्मिक यात्रा की भिन्न अवस्थाओं को संबोधित कर रहे हैं। किसी को प्रथम चरण में द्वैत की आवश्यकता है, किसी को भक्ति के निकट भाव की, किसी को अभेद के विलक्षण अनुभव की। साधक की पात्रता के अनुसार सत्य का प्रकाश अलग-अलग मात्रा में प्रकट होता है। सूर्य एक है, पर उसकी किरणें खिड़कियों के भिन्न आकारों से भिन्न ढंग से भीतर प्रवेश करती हैं।
## वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थ : शास्त्रीय व्याख्या की सूक्ष्मता
भारतीय मीमांसा और वेदान्त की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कुंजी है—वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थ का भेद। शब्द का जो प्रत्यक्ष, बाह्य और शाब्दिक अर्थ होता है, वह वाच्यार्थ कहलाता है। परन्तु जो गूढ़, अन्तर्निहित और संकेतित अर्थ होता है, वही लक्ष्यार्थ है।
दार्शनिक ग्रंथों को समझने में यह भेद अनिवार्य है। यदि कोई केवल शब्दों के आधार पर निष्कर्ष निकाले, तो वह आचार्यों के समन्वय को नहीं समझ पाएगा। किन्तु जब हम उनके लक्ष्यार्थ को पकड़ते हैं, तब पता चलता है कि सभी का केन्द्र एक ही है—अहंकार का विसर्जन, चित्त की शुद्धि, राग-द्वेष से मुक्ति और परम तत्त्व की उपलब्धि।
बाह्य स्तर पर ज्ञान, भक्ति, कर्म, प्रपत्ति, ध्यान और सेवा अलग-अलग प्रतीत होते हैं। परन्तु इनमें अन्तर्निहित उद्देश्य एक ही है—मनुष्य को उसके सीमित अहं से मुक्त कर अनन्त के साथ जोड़ देना। यही कारण है कि उपनिषद् जहाँ “अहं ब्रह्मास्मि” की घोषणा करते हैं, वहीं गीता समर्पण और कर्मयोग का मार्ग दिखाती है। दोनों के लक्ष्य में विरोध नहीं; केवल अभिव्यक्ति में भेद है।
## समकालीन विश्व के लिए सनातन समन्वय का संदेश
आज का विश्व वैचारिक ध्रुवीकरण, धार्मिक असहिष्णुता और सत्य के एकाधिकार के दावों से त्रस्त है। प्रत्येक व्यवस्था स्वयं को अंतिम और सर्वश्रेष्ठ बताने की होड़ में लगी है। ऐसे समय में सनातन संस्कृति का समन्वयवादी दृष्टिकोण अत्यन्त प्रासंगिक हो जाता है।
सनातन हमें सिखाता है कि सत्य तक पहुँचने के अनेक मार्ग हो सकते हैं, क्योंकि मनुष्यों की प्रकृति एकसी नहीं होती। किसी के लिए मौन श्रेष्ठ साधना है, किसी के लिए कीर्तन; किसी के लिए ध्यान, किसी के लिए सेवा; किसी के लिए तत्त्वचिन्तन, किसी के लिए शरणागति। एक ही पर्वत-शिखर तक पहुँचने के लिए भिन्न दिशाओं से भिन्न पथ हो सकते हैं। पथों की भिन्नता शिखर की एकता को समाप्त नहीं करती।
इस समन्वय में उदारता है, पर सिद्धान्तहीनता नहीं। यहाँ विविधता का उत्सव है, पर सत्य की अवहेलना नहीं। यहाँ सभी मार्गों का सम्मान है, पर साध्य की एकनिष्ठता भी है। यही सनातन की विशेषता है—वह किसी को भी उसके स्वभाव के विरुद्ध नहीं ले जाती; बल्कि स्वभाव को साधन बनाकर स्वभावातीत सत्य तक पहुँचाती है।
## अनेकता के भीतर एकता का शाश्वत रहस्य
वैदिक-सनातन-संस्कृति का मौलिक संदेश यह है कि बहुलता और एकता, भेद और अभेद, सगुण और निर्गुण, ज्ञान और भक्ति, कर्म और संन्यास—ये सब किसी अंतिम संघर्ष के पक्ष नहीं, बल्कि एक विराट आध्यात्मिक समन्वय के विविध आयाम हैं। जो दृष्टि केवल भेद देखती है, वह अधूरी है; जो दृष्टि केवल अभेद देखती है, वह भी अधूरी हो सकती है। पूर्ण दृष्टि वही है जो दोनों को उनकी सही मर्यादा में समझे।
सनातन धर्म न तो विविधता से भयभीत होता है, न एकरूपता का आग्रह करता है। वह जानता है कि सत्य कोई संकीर्ण खांचा नहीं, अपितु अनन्त आकाश है। उसी आकाश में पक्षी अपने-अपने पंखों से उड़ते हैं, पर आकाश किसी का विरोध नहीं करता। उसी प्रकार भिन्न-भिन्न दर्शन, संप्रदाय और साधनाएँ भी उस एक परम सत्ता के ही विभिन्न प्रकाशन हैं।
अतः सनातन का अंतिम और शाश्वत संदेश यही है—मार्ग भिन्न हो सकते हैं, साधन भिन्न हो सकते हैं, भाषा भिन्न हो सकती है, पर लक्ष्य एक ही है। और वह लक्ष्य है—अज्ञान का विनाश, अहं का लय, हृदय का शुद्धिकरण और उस अनन्त, अव्यक्त, अखण्ड चैतन्य की उपलब्धि, जिसे कोई ब्रह्म कहता है, कोई भगवान, कोई शिव, कोई शक्ति, कोई नारायण और कोई परम सत्य। नाम अनेक हैं; सत्ता एक है। साधन अनेक हैं; सिद्धि एक है। यात्रा अनेक है; परम गन्तव्य एक है। यही वैदिक-सनातन संस्कृति का अमर दर्शन है।
