उपहास, असंतोष और सत्ता की संवेदनहीनता
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
उपहास, असंतोष और सत्ता की संवेदनहीनता
कभी-कभी एक व्यंग्य, एक तंज या एक असंयमित वाक्य अपने भीतर पूरे समय की नब्ज़ छिपाए होता है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का उभार भी इसी तरह समझा जाना चाहिए—एक ओर यह CJI सुर्या कांत की “cockroaches” और “parasites” वाली टिप्पणी के बाद उपजा व्यंग्यात्मक प्रतिवाद है, तो दूसरी ओर यह बेरोज़गारी, परीक्षा-व्यवस्था की गड़बड़ियों और युवाओं की बढ़ती हताशा का प्रतीकात्मक विस्फोट भी बन गया है। बाद में CJI ने मामले पर “don’t take it so sentimentally” जैसी टिप्पणी भी की, जिससे विवाद और गहराया।
इसलिए प्रश्न केवल इतना नहीं है कि CJP मज़ाक है या आंदोलन। असली प्रश्न यह है कि मज़ाक कब सार्वजनिक असंतोष की भाषा बन जाता है, और आंदोलन कब सत्ता की संवेदनहीनता के सामने समाज का आईना। जो युवा अपने भविष्य को पेपर लीक, भर्ती-अनियमितता और संस्थागत उपेक्षा के बीच फँसा हुआ देख रहे हैं, वे कभी नारे में, कभी मीम में, कभी प्रतिरोध के नए नामों में अपनी पीड़ा ढूँढ़ते हैं। CJP के संदर्भ में रिपोर्टें भी यही संकेत देती हैं कि यह छात्र-युवाओं की बेचैनी, परीक्षा-प्रक्रिया की अनियमितताओं और जवाबदेही की कमी पर केंद्रित एक डिजिटल-संघर्ष के रूप में फैल रहा है।
लेकिन इस कथा का दूसरा पक्ष उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। जब सत्ता, संस्थाएँ और उनके समर्थक असहमति को सुनने के बजाय उसका उपहास करना शुरू कर दें, तब असंतोष तर्क से अधिक प्रतीक बनकर सामने आता है। यही कारण है कि किसी आंदोलन को केवल उसके नाम, उसके प्रतीकों या उसके व्यंग्य से न तो खारिज किया जा सकता है, और न ही उसके पीछे खड़ी पीड़ा को भुलाया जा सकता है। लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है कि वह असहमति को अपराध नहीं, संकेत माने; और संकेत को सुनकर अपनी भूलों का पुनर्मूल्यांकन करे।
इसी परिप्रेक्ष्य में यह भी ध्यान देने योग्य है कि CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने 6 जून को दिल्ली आने, समर्थकों से हवाईअड्डे पर मिलने, और फिर जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति लेने के लिए पुलिस स्टेशन जाने की अपील की थी। उनके सार्वजनिक संदेश का केंद्रीय दावा यही था कि आंदोलन अहिंसक रहेगा और संवैधानिक तरीके से अपनी बात रखेगा। उसके बावजूद दिल्ली पुलिस ने बाद में स्पष्ट किया कि जंतर-मंतर प्रदर्शन के संबंध में कोई FIR दर्ज नहीं की गई, छह लोगों को एहतियाती तौर पर हिरासत में लिया गया, और पूरे इलाके में भारी सुरक्षा व्यवस्था की गई।
यहीं से एक गहरी विडंबना जन्म लेती है। जिस देश में अक्सर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के लिए बैरिकेड, कीलें, धारा 144, घेराबंदी और दमन जैसी भाषा तैयार रहती है, उसी देश में यदि किसी नए, अजीब, व्यंग्यपूर्ण या असुविधाजनक आंदोलन के प्रति असाधारण नरमी दिखे, तो जनता स्वाभाविक रूप से प्रश्न करेगी। प्रश्न यह नहीं कि अनुमति क्यों दी गई; प्रश्न यह है कि क्या राज्य की संवेदनशीलता सबके लिए एक-सी है, या फिर सत्ता से निकटता और असुविधा की तीव्रता के अनुसार उसका व्यवहार बदलता है।
और फिर न्यायपालिका का प्रश्न आता है। सर्वोच्च न्यायालय के शब्द साधारण शब्द नहीं होते। वे केवल एक सुनवाई का हिस्सा नहीं, बल्कि सार्वजनिक नैतिकता के संकेतक भी होते हैं। जब युवाओं, बेरोज़गारों या असंतुष्ट नागरिकों के लिए “cockroaches” और “parasites” जैसी उपमाएँ प्रयोग की जाती हैं, तो यह केवल एक तीखी टिप्पणी नहीं रह जाती; यह उस सामाजिक दृष्टि को उजागर करती है जिसमें हताशा को समझने के बजाय उसका अपमान किया जाता है। न्यायालय का काम असहमति को अपमानित करना नहीं, उसकी वैधता और सीमा को विधि के कसौटी पर परखना है।
इसीलिए यह संपादकीय किसी एक व्यक्ति, एक दल या एक संगठन पर केंद्रित नहीं है। इसकी चिंता कहीं अधिक व्यापक है—क्या भारतीय सार्वजनिक जीवन में असहमति अब केवल तभी सहनीय है जब वह सत्ता को असहज न करे? क्या युवाओं का रोष तब तक “अराजक” कहलाएगा जब तक वह सत्ता के अनुकूल न हो? क्या नागरिकों की पीड़ा तभी “वास्तविक” मानी जाएगी जब वह किसी स्वीकृत ढाँचे के भीतर व्यक्त की जाए?
सत्ता की सबसे बड़ी सुविधा यही होती है कि वह जनता के दुख को या तो शोर बताकर टाल देती है, या तमाशा बताकर हँस देती है। लेकिन इतिहास गवाह है कि जिसे केवल तमाशा समझकर टाल दिया जाता है, वही बाद में राजनीतिक चेतना का निर्णायक रूप ले लेता है। आज यदि CJP एक व्यंग्यात्मक नाम है, तो कल वह उस सामाजिक हताशा का रूपक बन सकता है जिसे लंबे समय तक अनसुना किया गया। और यदि ऐसा है, तो प्रश्न CJP की वैधता का नहीं, व्यवस्था की विश्वसनीयता का है।
भारत को आज ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो उपहास से विचलित न हो, पर उपहास के कारणों को गंभीरता से ले। ऐसा तंत्र चाहिए जो युवाओं को “परजीवी” कहकर उनकी पीड़ा से न मुँह मोड़े, बल्कि यह पूछे कि वे इतनी तीखी भाषा तक पहुँचे ही क्यों। लोकतंत्र का धर्म असहमति को दबाना नहीं, उसका कारण मिटाना है। यही कारण है कि इस पूरे प्रकरण को केवल व्यंग्य, सनसनी या सोशल मीडिया-नाटक की तरह देखना एक बड़ी भूल होगी।
अंततः, यह लड़ाई किसी ‘कॉक्रोच’ बनाम ‘सत्ता’ की नहीं है। यह उस भारत की लड़ाई है जहाँ नागरिक को अपने अधिकार माँगने के लिए उपहास का पात्र नहीं बनना चाहिए; जहाँ अदालतें नैतिक उत्तेजना से ऊपर उठकर न्यायिक मर्यादा में बोलें; और जहाँ शासन जनता की असुविधा पर हँसने के बजाय उसका उत्तर दे। क्योंकि जब सत्ता असहमति का मज़ाक उड़ाने लगे, तब लोकतंत्र की भाषा धीरे-धीरे कराह में बदलने लगती है। और कराह को लंबे समय तक नज़रअंदाज़ करना किसी भी सभ्यता की सबसे बड़ी भूल होती है।
