भगवान श्रीजगन्नाथ का स्नानयात्रा महोत्सव : ज्येष्ठ पूर्णिमा का दिव्य अनुष्ठान, करुणामय लीला और अनंत पुण्य का उत्सव

 


भगवान श्रीजगन्नाथ का स्नानयात्रा महोत्सव : ज्येष्ठ पूर्णिमा का दिव्य अनुष्ठान, करुणामय लीला और अनंत पुण्य का उत्सव : ज्येष्ठ पूर्णिमा का दिव्य अनुष्ठान, करुणामय लीला और अनंत पुण्य का उत्सव

"यः स्नानं करोति जगदीशस्य, स एव स्नातः भवति संसारमलात्।"


नमो नीलाचलनिलयाय, नमः करुणासागराय।

नमो जगन्नाथाय, नमो भक्तवत्सलाय।


मङ्गलाचरण


जयति जयति देवो देवकीनन्दनोऽयं,

जयति जयति कृष्णो नीलशैलाधिवासी।

जयति जयति नाथो लोकनाथो दयालुः,

जयति जगदधीशः श्रीजगन्नाथदेवः॥


ज्येष्ठपूर्णिमायाः प्रातःकाले, जब पूर्व दिशा से उदीयमान सूर्य की प्रथम अरुण-किरणें नीलाचल के स्वर्ण-कलशों का स्पर्श करती हैं, तब सम्पूर्ण पुरुषोत्तम-क्षेत्र एक अलौकिक माधुर्य में स्नात हो उठता है। समुद्र की लहरें मानो वेदमंत्रों का उच्चारण करती हैं; मलय-पवन चन्दन और अगरु की सुगन्ध लेकर मन्दिर की परिक्रमा करता है; शंखध्वनि, घंटानाद और वेदघोष से दिशाएँ गुँजायमान हो उठती हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं ब्रह्माण्ड आज अपने स्वामी का अभिषेक करने के लिए उपस्थित हुआ हो।


* यह कोई सामान्य स्नान नहीं।

* यह परब्रह्म का लोकमंगल-स्नान है।

* यह करुणा का अभिषेक है।

* यह भक्ति का महासमुद्र है।


पुरी धाम केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक चेतना का जीवित आकाश है। यहाँ भगवान श्रीजगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन चक्र केवल विग्रह रूप में विराजमान नहीं हैं, बल्कि वे लोक-जीवन के भीतर उतरकर मनुष्य को यह सिखाते हैं कि परमात्मा दूर नहीं, अत्यन्त निकट है। वे केवल मंदिर के भीतर प्रतिष्ठित देवता नहीं, अपितु जन-जन के जीवन में करुणा, संरक्षण, संतुलन और मोक्ष के साक्षात् आश्वासन हैं। पुरी की बारह मास की यात्राएँ इसी दिव्य निकटता का विविध रूप हैं, और उनमें सर्वाधिक भावपूर्ण, आलोकित तथा जन-सुलभ पर्व है—"स्नानयात्रा महोत्सव"।


ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा के दिन मनाया जाने वाला यह महोत्सव भगवान की उस लीला का स्मरण कराता है जिसमें वे लोक के बीच, लोक की भाषा में, लोक की पीड़ा और लोक के आनंद के साथ उपस्थित होते हैं। श्रीजगन्नाथ परब्रह्म हैं, फिर भी वे स्वयं को भक्तों के लिए सुलभ बनाने हेतु मानवीय लीलाओं का आश्रय लेते हैं। वे खाते हैं, पीते हैं, जलविहार करते हैं, ऋतु के अनुसार वेश धारण करते हैं, ज्वरग्रस्त होकर अनवसर में विश्राम भी करते हैं, और आरोग्य होने पर रथयात्रा में जनसाधारण के बीच प्रकट होते हैं। यही उनकी अनुपम करुणा है—कि वे भक्तों से केवल दर्शन नहीं, अपनापन भी देते हैं।


## स्नानयात्रा : ब्रह्म के शारीरिक नहीं, भक्तिमय प्रकटीकरण का पर्व


स्नानयात्रा केवल एक अनुष्ठान नहीं, वरन् भगवान के “लोकवत्” आचरण का एक अत्यन्त पावन दृश्य है। यह दिन बताता है कि भगवान जितने अनन्त हैं, उतने ही निकट भी हैं। मनुष्य जैसे स्नान से शरीर को शुद्ध करता है, वैसे ही इस दिव्य स्नान से भक्त अपनी चेतना को शुद्ध करता है। पर यहाँ एक विशेषता है—यह स्नान भगवान का है, पर लाभ भक्त को मिलता है। यह वही सनातन भाव है जिसमें ईश्वर स्वयं कर्म करते हैं और जीव को फल देते हैं।


पुरी के श्रीमंदिर के आनंदबाजार के समीप स्थित "स्नानवेदी" पर चारों विग्रह—श्रीजगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन—को मंगलमय विधि से लाया जाता है। इस प्रक्रिया को परंपरा में "पहण्डी" कहा जाता है। ध्वनि, ताल, शंख, जयघोष और भक्तिमय उल्लास के बीच देवविग्रहों की यह यात्रा स्वयं एक दृश्य-उपनिषद् की भाँति प्रतीत होती है। एक-एक करके देवताओं का आगमन होता है, और पूरा परिसर मानो तीर्थमय होकर स्पंदित होने लगता है।


स्नानवेदी को वस्त्रों, पताकाओं, पुष्पों और धूप-गंध से विशेष रूप से अलंकृत किया जाता है। इसके पश्चात् "सुनागा/सुनाखुआ" या स्वर्णकूप से लाए गए १०८ कलशों के पवित्र जल से भगवान का महाभिषेक किया जाता है। यह केवल जल नहीं। यह गङ्गा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, सरस्वती, कावेरी और समस्त तीर्थों का सार है। 108 की संख्या भारतीय परंपरा में पूर्णता, अखण्डता और ब्रह्मांडीय समग्रता की प्रतीक मानी जाती है।


१०८ भारतीय अध्यात्म का दिव्य गणित है।


क्यों? क्योंकि—


१२ आदित्य × ९ ग्रह = १०८

२७ नक्षत्र × ४ चरण = १०८

उपनिषदों की परम्परागत संख्या = १०८

जपमाला के मनके = १०८


अर्थात् सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रतिनिधित्व इन १०८ कलशों में समाहित है। इस प्रकार स्नान केवल भगवान का नहीं— सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का अभिषेक बन जाता है।


इस स्नान के समय भगवान की स्तुति में जो भाव प्रकट होता है, वह केवल प्रशंसा नहीं, आत्मसमर्पण है। “पुरुषोत्तम”, “जगत्पालक”, “सृष्टि-स्थिति-संहारकर्ता”, “भक्तवत्सल”, “मोक्षदाता”—ये सब शब्द भगवान के लौकिक नाम नहीं, बल्कि उनके अनंत गुणों की झलक हैं। श्रीजगन्नाथ का शरीर “तीसी के फूल” के समान श्याम और सौम्य माना गया है; बलभद्र नीलाम्बरधारी हैं; और सुभद्रा करुणा तथा शक्ति की मधुर प्रतिमा हैं। इन सबका स्नान देखना मानो भक्त की दृष्टि में अपने ही अंतःकरण का अभिषेक देखना है।


## स्नान के बाद गणेश-वेश : करुणा और लोकस्वीकार की अद्भुत लीला


स्नानयात्रा के संध्याकाल में भगवान को "गणेश-वेश" या "गज-वेश" धारण कराया जाता है। यह श्रृंगार श्रीजगन्नाथ की अनंत लीला का अत्यंत मनोहर और गूढ़ अंग है। परंपरा के अनुसार यह वेश कर्नाटक के गणपति भक्त गणपति भट्ट को भगवान के गणेशरूप में दर्शन की स्मृति से जुड़ा माना जाता है। इस वेश में भगवान हाथी की आकृति-सदृश अलंकरण से सुशोभित होते हैं और सुभद्रा जी हल्दी-रंग के, जबकि जगन्नाथ और बलभद्र कत्थई-आभा के वस्त्रों से सजाए जाते हैं।


यह वेश हमें बताता है कि श्रीजगन्नाथ केवल एक रूप में नहीं, अनेक रूपों में भक्त को प्राप्त होते हैं। वे कभी विष्णु, कभी कृष्ण, कभी नरसिंह, कभी गणपति-स्वरूप—हर भाव में उपास्य हैं। इससे सिद्ध होता है कि भगवान की लीला किसी एक सीमित देव-रूप तक बँधी नहीं है; वह भक्त के हृदय की भाषा में स्वयं को ढाल लेती है।


## “ज्वर” की लीला और अनवसर : भगवान का मानवीय रूप


स्नानयात्रा के तुरंत बाद एक और अद्भुत परंपरा प्रारंभ होती है—भगवान का "अतिस्नानजनित ज्वर"। विश्वास है कि प्रचुर स्नान के कारण भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं और लगभग पंद्रह दिनों के लिए दर्शन से ओझल रहते हैं। इस अवधि को "अनवसर" कहा जाता है। भक्तजन इस समय प्रत्यक्ष दर्शन नहीं कर पाते, क्योंकि भगवान का उपचार, विश्राम और काढ़े-पानी आदि से सेवा की जाती है। यह दृश्य साधारण प्रतीत हो सकता है, पर वास्तव में यह अत्यंत गहन है।


यहाँ भगवान मनुष्य की तरह बीमार पड़ते हैं, आराम करते हैं, औषधि लेते हैं, और पुनः स्वस्थ होकर निकलते हैं। इसका आध्यात्मिक संकेत बड़ा गहरा है—परमात्मा भक्त से इतना निकट है कि वह मानवीय लीलाओं में भी सहभागी हो सकता है। जो ईश्वर सृष्टि का नियंता है, वह भक्त की भावनाओं में इतना उतर आता है कि ज्वर, विश्राम और उपचार भी उसकी लीला बन जाते हैं। यह परमात्मा की “सुलभता” का अद्भुत रूप है।


अनवसर के बाद जब भगवान "नवयौवन दर्शन" के रूप में पुनः प्रकट होते हैं, तब भक्तों की प्रतीक्षा फलित होती है। यह मानो आत्मा के प्रतीक्षाकाल के बाद ब्रह्म के पुनः साक्षात्कार का उत्सव है। यही कारण है कि स्नानयात्रा केवल आरंभ नहीं, पूरी रथयात्रा-परंपरा की आध्यात्मिक भूमिका है।


## रत्नसिंहासन और अन्तरवेदी का अलौकिक विधान


स्नान के बाद भगवान सामान्यतः रत्नसिंहासन पर विराजमान होते हैं। श्रीमंदिर के गर्भगृह का यह सिंहासन केवल स्थापत्य नहीं, एक पवित्र ब्रह्मस्थल है। इसे "अन्तर्वेदी" भी कहा जाता है। परंपरा में यह अत्यंत अलौकिक माना गया है, क्योंकि यह साधारण मनुष्य-निर्मित प्रतीत नहीं होता। यहाँ बलभद्र, सुभद्रा, श्रीजगन्नाथ, सुदर्शन, माधव, श्रीदेवी और भूदेवी आदि का दिव्य समावेश “सप्तावरण पीठ” के रूप में देखा जाता है। यह एक साथ देवत्व, समन्वय और वैभव का प्रतीक है।


रत्नसिंहासन यह बताता है कि भगवान की सत्ता केवल एकल नहीं, समन्वित है। वे एक ही मूल चेतना के विविध पक्ष हैं—करुणा, शक्ति, संरक्षण, आनंद, माधुर्य और न्याय। भक्त जब इस आसन का ध्यान करता है, तब वह वस्तुतः ब्रह्म के समग्र रूप का ध्यान करता है।


## स्नानयात्रा दर्शन का पुण्य और शास्त्रीय फलश्रुति


स्कन्दपुराण में स्नानयात्रा के दर्शन की महिमा का अत्यंत विस्तार से वर्णन मिलता है। परंपरा कहती है कि जो श्रद्धालु एकाग्र चित्त से भगवान के स्नान का दर्शन करता है, वह संसार-सागर में पुनः नहीं गिरता। उसके संचित पाप क्षीण हो जाते हैं। यह बात केवल दंड-विधान की भाषा में नहीं, बल्कि करुणा की भाषा में कही गई है। अर्थात् जब भगवान स्वयं शुद्धि का प्रतीक बनकर प्रकट हों, तो उनके दर्शन से जीव की चेतना भी शुद्ध हो जाती है।


इसी प्रकार, “जय बलभद्र! जय सुभद्रे! जय जगन्नाथ!” का उच्चारण केवल जयकार नहीं, आत्मा की उद्घोषणा है। यह ध्वनि वातावरण में नहीं, हृदय में उतरती है। और जो हृदय इस नाम-स्मरण में स्थिर हो जाता है, वह धीरे-धीरे भय, पाप और मोह के बंधनों से मुक्त होने लगता है।


ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा यदि वृष राशि के सूर्य और ज्येष्ठा नक्षत्र के योग से युक्त हो, तो उसे अत्यंत विशिष्ट माना गया है। उस समय भगवान के दर्शन का फल अन्य अनेक तीर्थों के समवेत पुण्य से भी अधिक बताया गया है। इस कथन का सार यही है कि तीर्थ बाह्य नहीं, आंतरिक है; और जब भगवान स्वयं भक्त के समक्ष हों, तब सारे तीर्थ उनके चरणों में समाहित हो जाते हैं।


## स्नानयात्रा का दार्शनिक अर्थ : शुद्धि, निकटता और लीला


स्नानयात्रा का गूढ़ दार्शनिक अर्थ है—ब्रह्म की शुद्धि नहीं, जीव की शुद्धि। भगवान तो शुद्धतम हैं; शुद्धि का अभिनय वे हमारे लिए करते हैं। यह भक्त को यह सिखाने के लिए है कि शुद्ध होना केवल बाहरी कर्म नहीं, बल्कि आंतरिक यात्रा है। देवताओं के स्नान में मनुष्य को अपने अंतःकरण के मल को धोने की प्रेरणा मिलती है।


यह उत्सव यह भी बताता है कि ईश्वर केवल योगियों के लिए नहीं, सामान्य जन के लिए भी हैं। पुरी की विशेषता यही है कि वहाँ भगवान “पुरुषोत्तम” होने के साथ “जनोचित” भी हैं। वे राजसी नहीं, जनजातीय, लोकधर्मी, ग्राम्य और आत्मीय हैं। यही कारण है कि जगन्नाथ की परंपरा में आदिवासी, वैष्णव, शैव, शाक्त और लोक-संस्कृतियों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। वे किसी एक सम्प्रदाय के नहीं, समस्त भारत की आध्यात्मिक आत्मा के देव हैं।


## स्नानयात्रा से रथयात्रा तक, शुद्धि से मिलन तक


स्नानयात्रा भगवान जगन्नाथ की उस लीला का आरंभ है, जिसमें करुणा, स्वास्थ्य, मानवीयता, भक्त-निकटता और शास्त्रीय वैभव एक साथ एकत्र होते हैं। यह केवल देव-स्नान नहीं, बल्कि भक्त-हृदय के अभिषेक का पर्व है। यह केवल मंदिर का उत्सव नहीं, बल्कि चेतना के मंदिर का उद्घाटन है।


ज्येष्ठ पूर्णिमा का यह पावन दिवस हमें यह सिखाता है कि जीवन में केवल भोग नहीं, शुद्धि भी आवश्यक है; केवल वैभव नहीं, विराम भी आवश्यक है; केवल दर्शन नहीं, प्रतीक्षा भी आवश्यक है; और केवल उत्सव नहीं, संवेदना भी आवश्यक है। भगवान जब स्नान करते हैं, तब वह हमें अपने भीतर के मल को धोने का आह्वान करते हैं। जब वे ज्वरग्रस्त होकर अनवसर में विश्राम करते हैं, तब वे हमें सिखाते हैं कि आरोग्य भी साधना है। जब वे गणेश-वेश धारण करते हैं, तब वे बतलाते हैं कि परमात्मा हर रूप में ग्राह्य हैं। और जब वे पुनः नवयौवन से प्रकट होते हैं, तब वे भक्त को यह अनुभूति कराते हैं कि ईश्वर की कृपा सदा नई, सदा ताज़ी, सदा जीवंत है।


इसीलिए स्नानयात्रा केवल एक तिथि नहीं, एक आध्यात्मिक स्थिति है। एक दर्शन नहीं, एक अनुभूति है। एक परंपरा नहीं, एक जीवंत ब्रह्मानुभव है।


धर्मः न जडः, धर्मः गतिमान्।

भक्तिः न कर्मकाण्डः, भक्तिः जीवनम्।

जगन्नाथः न केवलं देवः, अपितु लोकहृदयस्य स्पन्दनम्।


अतः ज्येष्ठ-पूर्णिमा का यह दिव्य स्नान-महोत्सव केवल एक उत्सव नहीं, वरन् वेदान्त, पुराण, भक्ति, लोकाचार और करुणा का ऐसा समन्वित महायज्ञ है जिसमें स्वयं परब्रह्म भक्तों के प्रेम में स्नान करते हैं और समस्त संसार को आत्मशुद्धि, समत्व, सेवा तथा मोक्ष का दिव्य संदेश प्रदान करते हैं।


नीलाचलाधिपतये नमो नमः।

पुरुषोत्तमाय नमो नमः।

भक्तवत्सलाय नमो नमः।

जगन्नाथस्वामिने नमो नमः।


"जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे।"


"हे जगत् के नाथ! आप केवल मंदिर में नहीं, मेरे नेत्रों के पथ पर, मेरे हृदय में, मेरे जीवन की प्रत्येक श्वास में सदैव विचरण करते रहें।"


जय श्रीजगन्नाथ।

जय बलभद्र।

जय सुभद्रा।

जय सुदर्शन।