राख के ढेर पर बैठती संवेदनाएँ और व्यवस्था का अंतहीन विलाप
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
राख के ढेर पर बैठती संवेदनाएँ और व्यवस्था का अंतहीन विलाप
"लखनऊ के अलीगंज की त्रासदी केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक प्रशासनिक चेतना और सुरक्षा मानकों की क्रूर हत्या है। कब तक हम अपनों को खोकर कागज़ी जाँच और मुआवज़ों के मरहम से अपने ज़ख़्मों को सहलाते रहेंगे?"
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज इलाके से सोमवार, 22 जून को उठी आग की लपटें महज़ एक व्यावसायिक इमारत की तीन मंजिलों तक सीमित नहीं थीं; वे हमारे पूरे तंत्र की खोखली बुनियाद को झुलसा रही थीं। इस भीषण अग्निकांड में कम से कम 15 जिंदगियाँ असमय ही काल के गाल में समा गईं। सबसे अधिक मर्मांतक पहलू यह है कि मरने वालों में अधिकांश मासूम बच्चे और सुनहरे भविष्य का सपना देखने वाले छात्र थे। धुएँ और लपटों से घिरे उन बच्चों की बेबसी की कल्पना मात्र से रूह काँप उठती है, जिन्होंने अपनी जान बचाने की आस में खुद को वॉशरूम के भीतर बंद कर लिया था। वे नहीं जानते थे कि जिसे वे जीवन की ढाल समझ रहे थे, वही उनके लिए मौत का बंद चैंबर बन जाएगा।
हर त्रासदी के बाद लिखे जाने वाले सरकारी स्क्रिप्ट की तरह, इस बार भी मुआवजे की घोषणाओं में तनिक भी देर नहीं की गई। 'उच्च स्तरीय जाँच' के आदेश तुरंत जारी कर दिए गए। प्रशासनिक विमर्श में 'उच्च स्तरीय जाँच' जैसे शब्द अब एक ऐसी दर्दनिवारक दवा बन चुके हैं, जो तात्कालिक तौर पर जनता के आक्रोश और दर्द को सुन्न कर देते हैं। मरीज़ (जनता) कुछ समय के लिए शांत हो जाता है, लेकिन दर्द की असली वजह—व्यवस्था की सड़न—जस की तस बनी रहती है। क्या कोई भी मुआवज़ा या कोई भी जाँच समिति उन माताओं की सूनी गोद को फिर से भर सकती है?
# प्रचार की राजनीति बनाम धरातल का सच
इस त्रासदी के बाद जिस तरह की खबरों का बाज़ार गर्म है, वह बेहद चिंताजनक है। मुख्यमंत्री द्वारा अपने सारे कार्यक्रम टालने, अधिकारियों को तलब करने, फोरेंसिक टीमों के पहुँचने और आरोपियों की धरपकड़ की ख़बरों को इस तरह प्रचारित किया जा रहा है मानो प्रशासनिक तत्परता का यह विज्ञापन मरे हुए मासूमों में फिर से जान फूँक देगा। सोशल मीडिया पर प्रसारित कुछ वीडियोज़ में पीड़ित परिवार मुख्यमंत्री से अपना सिसकता हुआ दर्द बयां कर रहे हैं, लेकिन विडंबना देखिए कि जहाँ मुख्यमंत्री का ढाढस बंधाता जवाब होना चाहिए था, वह हिस्सा 'म्यूट' (मौन) है। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता द्वारा चुने गए नेता की आवाज़ को अपनी ही जनता तक पहुँचने से रोकने के पीछे की मंशा क्या है? क्या सत्ता के पास इन आंसुओं का कोई ठोस जवाब नहीं था?
यह पहली बार नहीं है। अभी इसी महीने 3 जून को दिल्ली के एक होटल में लगी आग ने देश को दहलाया था, जहाँ अवैध निर्माण और सुरक्षा मानकों की अनदेखी साफ़ उजागर हुई थी। अलीगंज की इस इमारत के मालिक वीरेंद्र शुक्ला और उनके बेटे अखिलेश शुक्ला (जो वहाँ ग्राफिक्स सेंटर चला रहे थे) घटना के बाद से फरार हैं। चश्मदीदों का यह आरोप कि दमकल विभाग की गाड़ियाँ देरी से पहुँचीं, अग्निशमन तंत्र की मुस्तैदी पर एक और गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
# कागज़ी जाँच और जवाबदेही का मज़ाक
अब जो 'उच्च स्तरीय जाँच' होगी, उसमें घिसे-पिटे सवाल पूछे जाएंगे—इमारत में अग्निशमन उपकरण थे या नहीं? आपातकालीन निकास था या नहीं? यह कवायद बेहद हास्यास्पद और क्रूर लगती है। अगर जाँच में यह साबित भी हो जाता है कि मानकों का उल्लंघन हुआ था, तो उससे क्या बदल जाएगा? क्या उन गुनहगारों को सज़ा मिलने से पीड़ित परिवारों को त्वरित न्याय मिल पाएगा?
अभी हाल ही में नोएडा की दो बहुमंजिला सोसायटियों में आग लगी थी। वहाँ ऊँची मंजिलों तक दमकल का पानी न पहुँच पाने के कारण भारी मशक्कत करनी पड़ी थी। गनीमत थी कि कोई जनहानि नहीं हुई, लेकिन हमारी व्यवस्था ने उस चेतावनी से भी कोई सबक नहीं लिया।
* असली कार्रवाई किसे कहते हैं?
"निचले स्तर के दो-चार कर्मचारियों या फायर इंस्पेक्टरों को निलंबित कर देना 'कार्रवाई' नहीं, बल्कि बली का बकरा बनाना है। असली कार्रवाई तब होगी जब सरकार बिल्डरों, रसूखदारों और भू-माफियाओं के दबाव से मुक्त होकर एक ऐसी पारदर्शी व्यवस्था बनाए, जहाँ अग्निशमन विभाग का 'अनापत्ति प्रमाणपत्र' (NOC) महज़ एक औपचारिक दस्तावेज़ न होकर सुरक्षा की अचूक गारंटी हो। आपातकालीन निकास से लेकर हर एक स्प्रिंकलर की बारीकी से जाँच के बिना किसी भी इमारत के व्यावसायिक उपयोग की अनुमति कतई नहीं मिलनी चाहिए।"
# उपहार से अलीगंज तक: कब थमेगा यह सिलसिला?
आज से ठीक 29 साल पहले, 13 जून 1997 को दिल्ली के उपहार सिनेमा कांड में 59 लोगों ने अपनी जान गँवाई थी। वजहें तब भी यही थीं—सुरक्षा मानकों की अनदेखी और बंद आपातकालीन द्वार। उस मामले में अंसल बंधुओं को सज़ा मिलने में दशकों लग गए; पीड़ितों के परिवारों ने न्याय के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी अदालतों के चक्कर काटने में गुज़ार दी।
सवाल यह है कि क्या हमारा समाज आज भी उसी अंतहीन और थका देने वाली कानूनी लड़ाई के ढर्रे पर चलेगा, या अब वक़्त आ गया है कि सरकारों को उनकी प्राथमिक ज़िम्मेदारी का अहसास कराया जाए? कोई मुख्यमंत्री हो, मंत्री हो या प्रशासनिक अधिकारी—उस कुर्सी का वैभव और अधिकार केवल विज्ञापनों में चमकने के लिए नहीं है। उस कुर्सी की पहली और आखिरी शर्त जनता के जीवन की सुरक्षा है। जब तक व्यवस्था 'प्रचार' के मोह से बाहर निकलकर 'प्रशासन' के दायित्व को नहीं समझेगी, तब तक अलीगंज जैसी त्रासदियाँ हमारे भविष्य को यूँ ही राख करती रहेंगी।
