चाटुकारिता का दीमक और दरबारी लोकतंत्र
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
चाटुकारिता का दीमक और दरबारी लोकतंत्र
"जब राजनीतिक दल विचार नहीं, स्तुति के कारखाने बन जाएँ"
लोकतंत्र की असली ताकत चुनावी जीत में नहीं, बल्कि आत्म-संशोधन की क्षमता में होती है। कोई भी राजनीतिक दल केवल नारों, रैलियों और प्रचार-युद्ध से जीवित नहीं रहता; वह तब तक जीवंत रहता है, जब तक उसके भीतर प्रश्न पूछने की परंपरा बची रहती है। जिस संगठन में सत्य बोलने वाले को हाशिये पर डाल दिया जाए और चापलूस को पद, प्रतिष्ठा और निकटता का पुरस्कार मिलने लगे, वहाँ लोकतंत्र का नहीं, दरबारी व्यवस्था का जन्म होने लगता है।
समकालीन भारतीय राजनीति का सबसे चिंताजनक संकट यही है कि कई दलों में विचारधारा धीरे-धीरे पृष्ठभूमि में चली गई है और व्यक्तिपूजा, प्रचार-प्रबंधन तथा अंध-निष्ठा ने उसका स्थान ले लिया है। यह बीमारी केवल किसी एक दल की नहीं; यह लगभग पूरे राजनीतिक तंत्र में फैलती जा रही एक ऐसी प्रवृत्ति है, जो बाहर से संगठन को चमकदार दिखाती है, लेकिन भीतर से उसकी रीढ़ को खोखला करती जाती है।
## विचार से प्रशंसा तक: राजनीतिक संस्कृति का पतन
राजनीति का मूल कार्य विचारों का संघर्ष है। दलों के भीतर बहसें होती हैं, मतभेद उभरते हैं, रणनीतियाँ टकराती हैं, और उन्हीं टकरावों से नीति का बेहतर रूप निकलता है। लेकिन जब विचारों की जगह प्रशंसा की प्रतियोगिता शुरू हो जाए, तो संगठन अपने वैचारिक आधार से कटने लगता है।
आज कई राजनीतिक दलों में यह अघोषित नियम बन गया है कि जो नेता की जितनी ऊँची और जितनी लगातार प्रशंसा करेगा, वह उतना ही “विश्वसनीय” माना जाएगा। प्रश्न पूछने वाला असुविधाजनक कहलाता है, आलोचना करने वाला अनुशासनहीन ठहराया जाता है, और सत्य बोलने वाला अक्सर सबसे पहले किनारे कर दिया जाता है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र की आत्मा के विरुद्ध है, क्योंकि लोकतंत्र आज्ञापालन नहीं, उत्तरदायित्व मांगता है। जब कोई दल प्रश्नों से डरने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि वह जनादेश से नहीं, भय से चल रहा है।
## दरबार का पुनर्जन्म: नेता सेवक नहीं, केंद्र बन जाता है
लोकतंत्र में नेता जनता का प्रतिनिधि होता है, न कि किसी राजतंत्र का सम्राट। परंतु अनेक दलों के भीतर आज जो संस्कृति बनती जा रही है, उसमें नेता के इर्द-गिर्द एक आधुनिक दरबार खड़ा हो गया है। वहाँ नीति नहीं, निष्ठा का मूल्य है; वहाँ दक्षता नहीं, निकटता का महत्व है; वहाँ सच्चाई नहीं, सुविधाजनक चुप्पी की पूजा होती है।
यह दरबारी संस्कृति लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए विषैला वातावरण तैयार करती है। क्योंकि दरबार में सच बोलना खतरनाक होता है, और जहाँ सच बोलना खतरनाक हो जाए, वहाँ निर्णयों की गुणवत्ता गिरने लगती है। नेता को केवल वही सुनाई देता है जो सुनाया जाना सुरक्षित हो। परिणामतः वह वास्तविक असंतोष, जमीनी नाराज़गी, और संगठन के भीतर पनपती कमजोरी से कटता चला जाता है।
यहीं से राजनीतिक पतन की शुरुआत होती है। संगठन बाहर से अनुशासित दिख सकता है, पर भीतर से वह संवादहीनता की गिरफ्त में आ जाता है।
## पीआर का साम्राज्य और यथार्थ से दूरी
आज की राजनीति में विचारक कम, पीआर विशेषज्ञ अधिक दिखाई देते हैं। पहले दलों का आधार कार्यकर्ता, बहस और संगठनात्मक अनुशासन होता था। अब कई जगह छवि-निर्माण, नैरेटिव-मैनेजमेंट और नियंत्रित प्रचार ने उस स्थान को घेर लिया है। हर भाषण “ऐतिहासिक” घोषित हो जाता है, हर निर्णय “क्रांतिकारी” बताया जाता है, और हर विफलता को या तो विपक्ष की साजिश कहा जाता है या संचार-त्रुटि में समेट दिया जाता है।
यह प्रवृत्ति केवल हास्यास्पद नहीं, खतरनाक भी है। क्योंकि पीआर की दुनिया में सच्चाई नहीं, धारणा सबसे महत्वपूर्ण बन जाती है। और जब नेतृत्व को लगातार यह बताया जाए कि वह हर मोर्चे पर सफल है, तब वह असलियत से दूर होने लगता है। जनता के मन में जो असंतोष है, वह संगठन के कमरों तक नहीं पहुँचता। और जब चुनाव आता है, तो वही जनता चुपचाप अपना निर्णय सुना देती है।
* तालियाँ सच्चाई का प्रमाण नहीं होतीं।
* लाइक और रीट्वीट जनादेश नहीं होते।
* और मंच पर खड़ी प्रशंसा की भीड़, अक्सर सड़क पर मौजूद असंतोष को छिपा नहीं पाती।
## असहमति: लोकतंत्र की ऑक्सीजन
किसी भी दल की सेहत का सबसे अच्छा पैमाना यह है कि वहाँ असहमति को कैसे देखा जाता है। असहमति शत्रुता नहीं होती; वह सुधार का अवसर होती है। जो संगठन असहमति को सहन नहीं कर सकता, वह आत्ममंथन भी नहीं कर सकता। और जो संगठन आत्ममंथन नहीं कर सकता, वह लंबे समय तक प्रासंगिक नहीं रह सकता।
इतिहास गवाह है कि जिन दलों ने आत्म-आलोचना की क्षमता खो दी, वे धीरे-धीरे अपने जनाधार से भी दूर हो गए। वे चुनाव जीतते-हारते रहे, लेकिन अपने भीतर का जीवन खो बैठे। संगठन तब मरना शुरू करता है जब प्रश्न पूछना अपराध घोषित कर दिया जाए।
* असहमति लोकतंत्र की ऑक्सीजन है।
* चाटुकारिता उसका धुआँ।
एक शुद्ध विचारशील दल में आलोचक वह व्यक्ति नहीं होता जो संगठन को कमजोर करता है, बल्कि वही व्यक्ति होता है जो समय रहते बीमारी का पता लगा देता है। जिस दल ने अपने ईमानदार आलोचकों को खो दिया, उसने वास्तव में अपनी सबसे मूल्यवान संपत्ति खो दी।
## चापलूसी की कीमत: खोखला नेतृत्व, भ्रमित संगठन
चाटुकारिता का सबसे बड़ा खतरा यह है कि वह नेता को आईना नहीं दिखने देती। वह उसे एक काल्पनिक लोकप्रियता के महल में बंद कर देती है, जहाँ हर बात सफल लगती है, हर आलोचना “प्रायोजित” लगती है, और हर असंतोष “षड्यंत्र” प्रतीत होता है। यही वह मानसिक अवस्था है जहाँ नेतृत्व अपनी सीमाएँ नहीं देख पाता।
लेकिन राजनीति में सबसे बड़ी भूल यही होती है कि नेता जनता की बजाय अपने सलाहकारों की भाषा पर भरोसा करने लगे। जनता बहुधा मौन रहती है, पर वह मौन सहमति नहीं होता। वह प्रतीक्षा होती है। और मतदान के दिन वही प्रतीक्षा परिणाम बनकर सामने आती है।
इसलिए कोई भी दल यदि लंबे समय तक जीवित रहना चाहता है, तो उसे अपने भीतर आलोचनात्मक चेतना को बचाना होगा। उसे ऐसे लोगों को सम्मान देना होगा जो केवल ताली नहीं बजाते, बल्कि सही समय पर सच भी कहते हैं। वरना संगठन का बाहरी ढाँचा बना रहेगा, लेकिन उसकी अंतःशक्ति समाप्त हो जाएगी।
## लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना
लोकतंत्र का सबसे बड़ा शत्रु हमेशा विपक्ष नहीं होता। कई बार सबसे बड़ा शत्रु वह अपने ही दल के भीतर बैठा चापलूस होता है, जो नेता को वास्तविकता से काट देता है। विपक्ष तो चुनौती देता है, पर चापलूस भ्रम देता है। विपक्ष से तर्क किया जा सकता है, लेकिन चापलूसी धीरे-धीरे विवेक को सुन्न कर देती है।
और यही वजह है कि दीमक का प्रतीक यहाँ सबसे उपयुक्त है। दीमक शोर नहीं करती। वह बाहर से इमारत को जस का तस छोड़ती है, लेकिन भीतर से उसे खोखला करती जाती है। चाटुकारिता भी वैसी ही है। वह संगठन की दीवारों को सजाती रहती है, पर उसकी नींव को खाती जाती है।
## संगठन बचाना है तो सत्य को सम्मान देना होगा
यदि राजनीतिक दलों को सचमुच जीवंत, उत्तरदायी और जनाधारित बने रहना है, तो उन्हें अपने भीतर ऐसी संस्कृति पुनर्जीवित करनी होगी जिसमें प्रश्न करना असम्मान न माना जाए, और आलोचना को शत्रुता न समझा जाए। नेतृत्व को यह समझना होगा कि जो लोग आईना दिखाते हैं, वे दुश्मन नहीं होते; वे संगठन के सबसे ईमानदार सहयोगी होते हैं।
लोकतंत्र भाषणों से नहीं बचता, उसे बचाती है भीतर की ईमानदारी। दलों की शक्ति चेहरों से नहीं, चरित्र से बनती है और राजनीतिक भविष्य का सबसे बड़ा मूल्य प्रचार नहीं, आत्म-सुधार है।
जिस दिन दलों ने चाटुकारों के शोर से बाहर निकलकर विचारवान, साहसी और स्पष्टवादी लोगों को सम्मान देना शुरू कर दिया, उसी दिन भारतीय लोकतंत्र के भीतर जमी बहुत-सी क्षीणताएँ अपने-आप ध्वस्त होने लगेंगी। क्योंकि लोकतंत्र की रीढ़ नेता नहीं होता। लोकतंत्र की रीढ़ वह सच होता है, जिसे सुनने का साहस संगठन के भीतर बचा रहे।
