इनकाउंटर: अपराध की सज़ा नहीं, न्याय की पराजय

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


इनकाउंटर: अपराध की सज़ा नहीं, न्याय की पराजय

एक बात अच्छी हुई। कम-से-कम अब यह आवाज़ सुनाई देने लगी है कि "अपराधी को सज़ा अदालत देगी, पुलिस नहीं।" यह आवाज़ बहुत पहले उठ जानी चाहिए थी। यदि आज किसी विवादास्पद पुलिस मुठभेड़ के बाद समाज का एक बड़ा वर्ग इस सिद्धांत को स्वीकार कर रहा है, तो इसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन इसके साथ एक और आग्रह भी जुड़ा हुआ है—यह आवाज़ अब रुकनी नहीं चाहिए।

यह केवल भरत तिवारी के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए उठनी चाहिए जिसकी जान पुलिस कार्रवाई में गई है, चाहे उसका नाम पुष्पेन्द्र यादव हो, असद हो, नोमान हो, विकास दुबे हो या कोई और। क्योंकि संविधान व्यक्तियों को नहीं, सिद्धांतों को पहचानता है।

## असली प्रश्न: कौन मरा नहीं, कैसे मरा?


भारत का संविधान किसी नागरिक को यह अधिकार नहीं देता कि वह अपराध करे। लेकिन संविधान राज्य को भी यह अधिकार नहीं देता कि वह न्यायालय की भूमिका अपने हाथ में ले ले।


* यदि कोई व्यक्ति अपराधी है, तो उसे गिरफ्तार किया जाना चाहिए।

* यदि उसके विरुद्ध सबूत हैं, तो मुकदमा चलना चाहिए।

* यदि अपराध सिद्ध होता है, तो उसे दंड मिलना चाहिए।


लेकिन यदि अपराध सिद्ध करने, सज़ा तय करने और उसे लागू करने का पूरा अधिकार पुलिस को दे दिया जाए, तो फिर अदालतों, न्यायाधीशों, वकीलों और संविधान की आवश्यकता ही क्या रह जाएगी? लोकतंत्र और पुलिस राज्य के बीच यही सबसे बड़ा अंतर है।


## दोगलेपन का संकट


समस्या केवल इनकाउंटर नहीं है। समस्या उस सामाजिक और राजनीतिक मानसिकता की है जिसमें एक ही घटना का मूल्यांकन व्यक्ति की पहचान देखकर किया जाता है।


* यदि मृतक हमारी जाति, धर्म, विचारधारा या राजनीतिक खेमे का है, तो हम न्याय की बात करते हैं।

* यदि वह दूसरे खेमे का है, तो हम ताली बजाते हैं।

* यदि पीड़ित हमारा है, तो संविधान याद आता है।

* यदि पीड़ित दूसरा है, तो बुलडोज़र और एनकाउंटर न्याय लगने लगते हैं।


यहीं से लोकतंत्र का क्षरण शुरू होता है। कानून का शासन चयनात्मक नहीं हो सकता। संविधान का संरक्षण भीड़ की पसंद-नापसंद पर निर्भर नहीं कर सकता।


## जब समाज इनकाउंटर पर जश्न मनाने लगे


पिछले वर्षों में एक चिंताजनक प्रवृत्ति दिखाई दी है। किसी पुलिस मुठभेड़ के बाद तथ्यों की प्रतीक्षा करने के बजाय सोशल मीडिया पर उत्सव शुरू हो जाता है।


* हैशटैग चलाए जाते हैं।

* पटाखे फोड़े जाते हैं।

* राजनीतिक लाभ उठाए जाते हैं।

* टीवी स्टूडियो में पुलिस कार्रवाई को वीरगाथा की तरह प्रस्तुत किया जाता है।


यह भूलकर कि यदि राज्य को बिना न्यायिक परीक्षण के जीवन लेने का अधिकार मिल गया, तो कल यही शक्ति किसी भी नागरिक के विरुद्ध प्रयोग की जा सकती है।


आज जो व्यक्ति भीड़ की तालियाँ बटोर रहा है, कल वही व्यक्ति राज्य की मनमानी का शिकार भी हो सकता है। इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है।


## न्याय का सिद्धांत व्यक्ति देखकर नहीं बदलता


* यदि कोई व्यक्ति हथियार उठाता है, तो वह कानून के दायरे में आएगा।

* यदि कोई व्यक्ति हत्या करता है, तो उसे कठोर दंड मिलना चाहिए।

* यदि कोई व्यक्ति आतंकवादी गतिविधियों में शामिल है, तो उसके विरुद्ध कठोरतम कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।


लेकिन इन सब बातों के बावजूद एक सिद्धांत नहीं बदलता— "दोष सिद्ध करने का अधिकार अदालत का है।"


* यही सभ्यता और प्रतिशोध के बीच की रेखा है।

* यही लोकतंत्र और भीड़तंत्र के बीच का अंतर है।

* यही संविधान और जंगलराज के बीच की सीमा है।


## सबसे बड़ा खतरा: न्याय का राजनीतिककरण


जब किसी इनकाउंटर का समर्थन या विरोध मृतक की जाति, धर्म या राजनीतिक पहचान देखकर किया जाने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि समाज न्याय की नहीं, पहचान की राजनीति कर रहा है।


तब न्याय सिद्धांत नहीं रह जाता, हथियार बन जाता है। और हथियार कभी निष्पक्ष नहीं होते। आज यदि हम किसी दूसरे के अधिकारों के हनन पर चुप रहते हैं, तो कल अपने अधिकारों की रक्षा का नैतिक आधार भी खो देते हैं। इसलिए किसी भी लोकतांत्रिक समाज में नागरिक स्वतंत्रता का प्रश्न बहुमत या अल्पमत का नहीं होता। वह सभी का प्रश्न होता है।


## संविधान की कसौटी


किसी लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा यह नहीं है कि वह निर्दोषों के साथ कैसा व्यवहार करता है। वास्तविक परीक्षा यह है कि वह आरोपित, अलोकप्रिय और घृणा के पात्र व्यक्तियों के साथ भी कानून का पालन करता है या नहीं।


* यदि सबसे नापसंद व्यक्ति को भी निष्पक्ष सुनवाई मिलती है, तभी संविधान जीवित माना जाएगा।

* यदि राज्य केवल लोकप्रिय भावनाओं के आधार पर जीवन और मृत्यु का निर्णय लेने लगे, तो लोकतंत्र का भविष्य सुरक्षित नहीं रह सकता।


इसलिए यदि आज यह कहा जा रहा है कि "अपराधी को सज़ा अदालत देगी, पुलिस नहीं", तो इस वाक्य को किसी एक घटना तक सीमित नहीं रहने देना चाहिए।


* यह सिद्धांत भरत तिवारी पर भी लागू होना चाहिए।

* यह सिद्धांत पुष्पेन्द्र यादव पर भी लागू होना चाहिए।

* यह सिद्धांत असद, नोमान और हर उस नागरिक पर लागू होना चाहिए जिसके जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा का वचन संविधान ने दिया है।


न्याय की सबसे बड़ी शर्त यही है कि उसका तराजू व्यक्ति देखकर न झुके। क्योंकि जिस दिन हम यह तय करने लगेंगे कि किसके लिए संविधान लागू होगा और किसके लिए नहीं, उसी दिन संविधान एक पुस्तक रह जाएगा और न्याय केवल एक नारा। और लोकतंत्र की सबसे बड़ी त्रासदी यही होती है कि उसकी हत्या हमेशा संविधान के बाहर से नहीं, कई बार संविधान के नाम पर ही शुरू होती है।