INDIA गठबंधन: एक अधूरी संभावना, बिखरी रणनीति और विपक्ष के भविष्य की कसौटी

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


INDIA गठबंधन: एक अधूरी संभावना, बिखरी रणनीति और विपक्ष के भविष्य की कसौटी

भारतीय राजनीति में गठबंधन केवल चुनावी गणित नहीं, बल्कि वैचारिक सामंजस्य, नेतृत्व-संतुलन और पारस्परिक विश्वास की जटिल संरचना होते हैं। 2023–24 के दौर में उभरा INDIA गठबंधन इसी जटिलता का एक महत्त्वाकांक्षी प्रयोग था—जिसका उद्देश्य स्पष्ट था: भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को चुनौती देना।

## जन्म: आशा, एकजुटता और राजनीतिक अनिवार्यता

23 जून 2023 को पटना में नीतीश कुमार की मेजबानी में पहली बैठक और जुलाई 2023 में बेंगलुरु में औपचारिक रूप—इन दोनों घटनाओं ने यह संकेत दिया कि विपक्ष ने अंततः अपनी बिखरी ताकत को एक मंच पर लाने का प्रयास किया है।


ममता बनर्जी द्वारा “INDIA” नाम प्रस्तावित करना और “इंडिया जीतेगा” का नारा देना प्रतीकात्मक रूप से प्रभावी था—यह केवल गठबंधन नहीं, बल्कि एक नैरेटिव निर्माण का प्रयास भी था।


इसमें राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव जैसे विभिन्न ध्रुवों के नेता एक साथ आए—जो भारतीय लोकतंत्र की बहुलता को भी दर्शाता था।


## अंतर्विरोध: जहां से दरारें शुरू हुईं


गठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती बाहरी नहीं, आंतरिक थी।


1. सीट बंटवारे का संकट

   राज्यों में क्षेत्रीय दल अपनी-अपनी जमीन छोड़ने को तैयार नहीं थे। परिणामतः कांग्रेस को कई जगह सीमित सीटें मिलीं, जिससे असंतुलन की स्थिति बनी।


2. नेतृत्व का प्रश्न

   प्रधानमंत्री पद के संभावित चेहरे को लेकर अस्पष्टता बनी रही। ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और अन्य नेताओं की महत्वाकांक्षाएँ स्वाभाविक थीं, परंतु सामूहिक रणनीति को प्रभावित करती रहीं।


3. राज्य बनाम केंद्र का द्वंद्व

   कई दल अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस के प्रतिद्वंद्वी रहे—जैसे पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश या दिल्ली। इस द्वंद्व ने “राष्ट्रीय एकजुटता” को व्यवहार में कमजोर किया।


4. राजनीतिक पुनर्संरेखण

   नीतीश कुमार का पुनः एनडीए में जाना इस गठबंधन के लिए बड़ा झटका था—क्योंकि वही इसके प्रारंभिक सूत्रधार थे।


## 2024 का परिणाम: सफलता या असफलता?


यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि गठबंधन पूरी तरह विफल रहा। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा 240 सीटों पर सिमटी—यह विपक्ष की सामूहिक रणनीति का एक परिणाम भी माना जा सकता है।


कांग्रेस, जो पहले हाशिये पर दिख रही थी, पुनः एक केंद्रीय विपक्षी शक्ति के रूप में उभरी और राहुल गांधी की सक्रियता—विशेषकर यात्राओं और जनसंपर्क अभियानों—ने उसे राजनीतिक पुनर्स्थापन में मदद की परंतु यह भी उतना ही सच है कि यदि गठबंधन अधिक संगठित, अनुशासित और रणनीतिक होता, तो परिणाम और भिन्न हो सकते थे।


## “साजिश” बनाम “रणनीतिक विफलता”: एक जरूरी अंतर


यह तर्क उभरता है कि विपक्षी दलों की टूट और कमजोर होना एक सुनियोजित साजिश का परिणाम है। यह आंशिक रूप से राजनीतिक दृष्टिकोण हो सकता है, परंतु विश्लेषणात्मक रूप से यह भी देखना होगा कि:


* क्या विपक्षी दलों की आंतरिक कमजोरियाँ कम जिम्मेदार थीं?

* क्या वैचारिक अस्पष्टता और नेतृत्व संघर्ष ने उन्हें अधिक नुकसान नहीं पहुँचाया?


लोकतंत्र में सत्ता पक्ष मजबूत होता है, पर विपक्ष की कमजोरी केवल बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि आंतरिक विफलताओं से भी पैदा होती है।


## वैचारिक प्रश्न: कौन स्थिर, कौन लचीला?


केवल कांग्रेस और वामदल ही वैचारिक रूप से स्थिर रहे। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और कांग्रेस की वैचारिक निरंतरता एक दृष्टिकोण हो सकता है, पर भारतीय राजनीति का यथार्थ अधिक जटिल है।


* क्षेत्रीय दल अक्सर व्यावहारिक राजनीति (pragmatic politics) के तहत गठबंधन बदलते हैं

* यह लचीलापन कभी अवसरवाद लगता है, तो कभी क्षेत्रीय हितों की रक्षा का साधन


इसलिए “स्थिरता बनाम समझौता” का प्रश्न भी संदर्भ-निर्भर है।


## ममता बनर्जी और क्षेत्रीय दल: भविष्य की दिशा


ममता बनर्जी, तृणमूल कांग्रेस या अन्य क्षेत्रीय दलों के भविष्य को लेकर यह कहना कि वे पूर्णतः कमजोर हो जाएंगे, अभी जल्दबाजी होगी।


भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की जड़ें गहरी हैं—भाषा, संस्कृति और स्थानीय आकांक्षाओं से जुड़ी हुई। वे कमजोर हो सकते हैं, पर समाप्त होना कठिन है।


## आगे का रास्ता: विपक्ष के लिए तीन स्पष्ट सबक


1. साझा न्यूनतम कार्यक्रम (Common Minimum Programme)

   केवल “विरोध” पर्याप्त नहीं—एक स्पष्ट वैकल्पिक दृष्टि जरूरी है।


2. नेतृत्व का स्पष्ट ढांचा

   बहु-नेतृत्व मॉडल तब तक सफल नहीं होता जब तक निर्णय-प्रक्रिया स्पष्ट न हो।


3. राज्य और केंद्र के बीच संतुलन

   क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा और राष्ट्रीय रणनीति के बीच संतुलन बनाना ही गठबंधन की कुंजी है।


## बिखराव से पुनर्निर्माण तक


INDIA गठबंधन का बिखराव केवल असफलता की कहानी नहीं, बल्कि सीख की प्रक्रिया भी है। यह प्रयोग यह दिखाता है कि:


* केवल अंकगणित (numbers) पर्याप्त नहीं

* रसायन (chemistry) और विश्वास अधिक महत्वपूर्ण हैं


भारतीय लोकतंत्र की प्रकृति ही ऐसी है कि यहाँ कोई भी राजनीतिक शून्य स्थायी नहीं रहता। यदि विपक्ष अपनी गलतियों से सीखता है, तो वह पुनः संगठित हो सकता है।


अंततः प्रश्न यह नहीं है कि कौन सा दल जीतेगा—"बल्कि यह है कि क्या भारत में एक प्रभावी, विश्वसनीय और समावेशी विपक्ष खड़ा हो पाएगा।"