आत्म-साक्षात्कार की सनातन यात्रा: स्वप्नवत संसार से शाश्वत परमार्थ सत्य की ओर
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
आत्म-साक्षात्कार की सनातन यात्रा: स्वप्नवत संसार से शाश्वत परमार्थ सत्य की ओर
"न जायते म्रियते वा कदाचित्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥"
(श्रीमद्भगवद्गीता २.२०)
— यह आत्मा न कभी जन्म लेती है, न कभी मरती है; और न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाली ही है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है; शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारी जाती।
# प्रबोधन: मायिक प्रपंच और जीव का आत्म-विस्मरण
मानव जीवन का स्थूल रूप जन्म और मृत्यु के दो तटों के मध्य बहने वाली एक अनवरत धारा प्रतीत होता है। किंतु सनातन वांग्मय और ऋषियों की प्रज्ञा इस गतिशीलता के मूल पर एक अत्यंत तीखा दार्शनिक प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है: यह यात्रा जिस जाग्रत जगत् में घटित हो रही है, क्या वह वस्तुतः परमार्थ सत्य (Absolute Reality) है, अथवा यह केवल चित्त के धरातल पर तैरती हुई एक मायिक भ्रांति है?
श्रीमद्आद्यशंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत के निचोड़ के रूप में लोकप्रसिद्ध उद्घोष किया था: ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।
यह सूक्त सनातन दर्शन का वह महास्तंभ है जो स्पष्ट करता है कि त्रिकालबाधित (भूत, भविष्य, वर्तमान में अपरिवर्तनीय) सत्य केवल ब्रह्म है। यह दृश्यमान प्रपंच (संसार) 'मिथ्या' अर्थात् परिवर्तनशील और व्यावहारिक रूप से सत्य होते हुए भी पारमार्थिक रूप से असत्य है। जीव और ब्रह्म में कोई तात्विक भेद नहीं है; अज्ञान की निद्रा के कारण ही जीव स्वयं को कर्ता, भोक्ता और परिच्छिन्न (सीमित) मान बैठता है।
१. संसार की स्वप्नवत प्रकृति: माया का विलास
सनातन ग्रंथों के अनुसार, इस संसार की समस्त गतियां—सुख-दुख के द्वंद्व, लाभ-हानि के समीकरण, और जन्म-मरण के चक्र—एक विराट स्वप्न के सदृश हैं।
मांडूक्य उपनिषद की 'कारिका' में आचार्य गौड़पाद ने जाग्रत और स्वप्न अवस्था की समरूपता को सिद्ध किया है। जिस प्रकार रात्रि में देखा गया स्वप्न गहन और पूर्णतः सत्य प्रतीत होता है—वहाँ की नदियाँ वास्तविक प्यास बुझाती दिखती हैं और वहाँ का भय हृदय की धड़कन बढ़ा देता है—किंतु आँख खुलते ही (जागरण काल में) वह संपूर्ण संसार विलीन हो जाता है; ठीक उसी प्रकार, जब ज्ञान रूपी सूर्य का उदय होता है, तब यह जाग्रत संसार भी आत्मा की सर्वोच्च चेतना के सम्मुख स्वप्नवत और बाधित हो जाता है।
योगेश्वर श्रीकृष्ण इस परिवर्तनशीलता को वस्त्र के रूपक से समझाते हैं:
"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥"
(श्रीमद्भगवद्गीता २.२२)
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[चेतन आत्मा] ─── (वस्त्र परिवर्तन की भांति) ───> [जीर्ण शरीर का त्याग] ───> [नूतन काया का ग्रहण]
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└───────────────────────> (अपरिवर्तित एवं अछूती) <──────────────────────────┘
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यह श्लोक संसार की क्षणभंगुरता और आत्मा की नित्यता का अनुपम दर्शन है। शरीर केवल एक आवरण है जो प्रकृति के पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से निर्मित है और काल के नियम के अधीन नष्ट होने के लिए विवश है। परंतु 'देही' (आत्मा) उस संपूर्ण परिवर्तन के मध्य दृष्टा रूप में अचल और अक्षुण्ण रहती है।
२. आत्मा का तात्विक स्वरूप: सच्चिदानंद ब्रह्म
उपनिषदों के महावाक्य साक्ष्य देते हैं कि मनुष्य का मूल स्वरूप कोई हाड-मांस का पुंज नहीं, बल्कि स्वयं पूर्ण ब्रह्म है। माण्डूक्य उपनिषद् का उद्घोष है: “अयमात्मा ब्रह्म”
यह आत्मा ही ब्रह्म है। जब साधक अज्ञान के आवरणों (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोशों) का वेधन करता है, तब उसे यह बोध होता है कि जिसे वह अपनी 'मृत्यु' समझ रहा था, वह केवल पंचमहाभूतों का वियोजन था।
विवेकचूड़ामणि में कहा गया है कि आत्मा आकाश के समान व्यापक और निर्लेप है। जैसे घट (घड़े) के फूटने पर घट के भीतर का आकाश (घटाकाश) महाआकाश में विलीन नहीं होता, बल्कि वह पहले से ही महाआकाश था, वैसे ही देह के अवसान पर आत्मा कहीं आती-जाती नहीं; वह सर्वव्यापी सच्चिदानंद (सत्-चित्-आनंद) रूप में स्वतः सिद्ध रहती है।
३. आत्म-साक्षात्कार की मीमांसा: 'कोऽहम्' से 'सोऽहम्' तक
आत्म-साक्षात्कार की यह आंतरिक यात्रा किसी भौगोलिक दूरी को तय करना नहीं है, बल्कि यह भ्रम से सत्य की ओर और विस्मृति से स्मृति की ओर मुड़ने की अंतर्यात्रा है।
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"कोऽहम्?" (मैं कौन हूँ?) ── [ आत्म-विचार / नेति-नेति ]
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"नाहं देहो न च प्राणो..." (उपाधियों का निषेध)
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"अहं ब्रह्मास्मि" / "सोऽहम्" (परम सत्य का प्रकटन)
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इस यात्रा का प्रस्थान बिंदु है एक तीखा, प्राणवान आध्यात्मिक प्रश्न: "कोऽहम्?" (मैं कौन हूँ?)
* क्या मैं यह स्थूल शरीर हूँ जो रुग्ण होता है? नहीं, मैं तो इसका ज्ञाता हूँ।
* क्या मैं यह मन हूँ जिसमें विचार उठते हैं? नहीं, मैं तो विचारों के आने-जाने का साक्षी हूँ।
जब साधक उपनिषदों की 'नेति-नेति' (यह नहीं, यह नहीं) पद्धति से अपनी समस्त भौतिक उपाधियों का निषेध कर देता है, तब उसकी सारी इच्छाएं, वासनाएं और सूक्ष्म बंधन छिन्न-भिन्न हो जाते हैं।
भगवान बुद्ध का प्रसिद्ध उपदेश "अत्त दीपो भव" (आत्मदीपोभव—अपने दीपक स्वयं बनो) इसी सत्य का प्रतिपादन करता है। कोई बाह्य प्रकाश अंतःकरण के अंधकार को नहीं मिटा सकता; साधक को स्वयं विवेक की अरणि का मंथन करके अपने भीतर ज्ञान की अग्नि को प्रज्वलित करना होता है।
४. अंतःसाधना के चतुष्टय अंग: ध्यान, वैराग्य और आत्म-विचार
इस स्वप्नवत संसार के आकर्षणों से जागने और आत्म-संस्थान में प्रतिष्ठित होने के लिए शास्त्रों ने त्रिविध अचूक साधन बताए हैं:
(क) ध्यान (ध्यानयोग)
श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय (आत्मसंयमयोग) में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जैसे वायुशून्य स्थान में रखा हुआ दीपक चलायमान नहीं होता, वैसी ही स्थिति ध्यानस्थ योगी के चित्त की होती है। ध्यान विक्षेपणों का शमन कर चंचल मन को अंतर्मुखी बनाता है, जिससे बुद्धि शुष्क तर्क को छोड़कर आत्मा के प्रकाश में सराबोर होने लगती है।
(ख) वैराग्य (विवेकजन्य विरक्ति)
"वैराग्यमेव अभयम्।" (वैराग्य शतक)
संसार की क्षणभंगुरता का बारंबार दर्शन करके नाशवान वस्तुओं के प्रति आसक्ति का स्वतः छूट जाना ही वैराग्य है। यह संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार के वास्तविक स्वरूप को समझकर उसमें तटस्थ (Unattached) हो जाना है।
(ग) आत्म-विचार (नित्य-अनित्य वस्तु विवेक)
आदि शंकराचार्य कृत 'आत्मबोध' के अनुसार, जैसे निरंतर अभ्यास से जल का मैल साफ हो जाता है, वैसे ही "मैं शुद्ध चैतन्य हूँ" यह निरंतर विचार (आत्म-विचार) अज्ञान जनित भ्रांतियों को काट देता है। यह साधना साधक को देहाध्यास (शरीर को ही स्वयं मानना) से मुक्त कर साक्षी भाव में स्थापित करती है।
५. महाफलश्रुति: अमृतत्व और निर्विकल्प स्थिति
जब साधक की साधना परिपक्व होती है, तब उसे किसी परोक्ष (भविष्य में मिलने वाले) स्वर्ग की आवश्यकता नहीं होती; वह इसी जीवन में 'जीवन्मुक्त' हो जाता है। उपनिषदों का वह महान ऋचा-वाक्य साक्षात् जीवंत हो उठता है: “अहं ब्रह्मास्मि”
मैं ही वह सर्वव्यापी, सनातन ब्रह्म हूँ। इस परम अनुभूति के घटित होते ही साधक के भीतर अमृतत्व (अमरता) का प्राकट्य होता है।
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┌─────────────────────────────────────────────────────────────┐
│ निर्विकल्प समाधि की स्थिति │
├──────────────────────────────┬──────────────────────────────┤
│ मोह का समूल नाश │ भय का पूर्ण उच्छेद │
├──────────────────────────────┴──────────────────────────────┤
│ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय के त्रिपुट का सर्वथा विलोपन │
└─────────────────────────────────────────────────────────────┘
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वहाँ केवल एक असीम, अगाध, और निष्कंप शांति शेष रह जाती है, जिसे शास्त्र 'निर्विकल्प समाधि' कहते हैं।
६. आत्म-साक्षात्कार की अपरिहार्यता: मानव जीवन का चरम लक्ष्य
सनातन दर्शन के अनुसार, आत्म-साक्षात्कार कोई ऐसा ऐच्छिक कार्य या विकल्प नहीं है जिसे वृद्धावस्था पर टाला जा सके। यह मानव योनि का एकमात्र परम और चरम पुरुषार्थ (मोक्ष) है।
जब तक यह जीव स्वयं को प्रकृति के विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) से युक्त मानता रहेगा, तब तक वह 'भवचक्र' (चौरासी लाख योनियों के आवागमन के चक्र) में पिसता रहेगा। अज्ञान ही बंधन है और आत्मज्ञान ही साक्षात् मुक्ति है।
## सभ्यता का शाश्वत पाथेय
इस संपूर्ण दार्शनिक विमर्श का निचोड़ इन तीन शाश्वत सत्यों में समाहित है:
संसारः स्वप्नतुल्यः (यह दृश्य जगत प्रतिक्षण परिवर्तनशील और स्वप्नवत है)
आत्मा एव परम सत्यम् (एकमात्र आत्मा ही अजन्मा, अमर और नित्य सत्य है)
आत्म-साक्षात्कारः एव परम मोक्षः (अपने वास्तविक स्वरूप को जान लेना ही दुखों की आत्यंतिक निवृत्ति है)
यद्यपि माया का आवरण अत्यंत सघन है और यह पथ 'क्षुरस्य धारा' (छुरे की धार) के समान दुर्गम बताया गया है, किंतु उपनिषद घोषणा करते हैं—"उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत" (उठो, जागो और श्रेष्ठ महापुरुषों के पास जाकर उस ज्ञान को जानो)। अटूट श्रद्धा, गुरुदेव के प्रति अनन्य प्रेम, और सतत तितिक्षा से यह साध्य परम पद इसी जीवन में प्राप्त किया जा सकता है।
"यत्र योगी परं ब्रह्म, सम्प्राप्तो न निवर्तते।" — जहाँ पहुँचकर वह परम योगी उस सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है, फिर उस अज्ञानमयी संसार-मरीचिका में उसका पुनरागमन नहीं होता। वह सदा-सदा के लिए शांत, मुक्त और पूर्ण हो जाता है।
