देवघर: सुहागिनों द्वारा पति की लंबी आयु, सुख -समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए बट सावित्री पूजा श्रद्धा और धूमधाम से मनाया गया

 


सुहागिनों द्वारा पति की लंबी आयु, सुख -समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए बट सावित्री पूजा श्रद्धा और धूमधाम से मनाया गया

देवघर।वैसे तो हिन्दू धर्म में अनेकों पर्व और त्यौहार उत्साह पूर्वक मनाये जाते हैं, मगर वट सावित्री का पर्व सुहागिन महिलाओं के लिये खास महत्व रखता है। वट सावित्री व्रत हिन्दू महिलाओं के लिये सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक व्रतों में से एक है। अपने अखंड सौभाग्य और कल्याण के लिये महिलाये ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को वट सावित्री व्रत रखती हैं। इसी दिन सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा की थी। वट का वृक्ष त्रिमूर्ति को दर्शाता है, यानि यह वृक्ष भगवान ब्रह्मा , विष्णु और महेश का प्रतीक है। इसके नीचे बैठकर पूजन करने, व्रत कथा आदि सुनने से मनोकामना पूरी होती है। भगवान बुद्ध को भी इसी वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। अतः वट वृक्ष को ज्ञान, निर्वाण व दीर्घायु का पूरक माना गया है। यह त्यौहार देश के विभिन्न राज्यो में पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। वट सावित्री व्रत को कुंवारी और विवाहित दोनों ही महिलाओं द्वारा रखा जाता है। इसमें जहां कुंवारी कन्यायें इच्छानुसार वर की कामना के लिये ये व्रत करती हैं, तो वहीं शादीशुदा महिलायें अपने अखंड सौभाग्य और परिवार की समृद्धि के लिये इस व्रत को रखती हैं। जो पत्नी इस व्रत को सच्ची श्रद्धा के साथ करती है उसे ना केवल पुण्य की प्राप्ति होती है बल्कि उसके पति के सभी कष्ट भी दूर हो जाते हैं। आज के दिन सौभाग्यवती महिलायें सोलह श्रृंगार करके बरगद, पीपल के पेड़ की विधिवत पूजा कर पेंड़ के तने के चारो ओर पीले रंग का पवित्र कच्चा धागा एक सौ आठ बार बांधती और फेरे लगाती हैं ताकि उनके पति दीर्घायु हों। प्यार, श्रद्धा और समर्पण का यह भाव हमारे देश में सच्चे और पवित्र प्रेम की कहानी के लिये प्रसिद्ध है। भारतीय संस्कृति में यह व्रत आदर्श नारीत्व का प्रतीक माना जाता है। वटवृक्ष दीर्घायु, अमरत्व, ज्ञान, निर्वाण का भी प्रतीक है। इस कारण पति की दीर्घायु और सुख समृद्धि और अखंड सौभाग्य को प्राप्त करने के लिए बट सावित्री पूजा मनाया जाता है।