लोकतंत्र में ‘लोक’ कहाँ है? : शक्ति, मीडिया और विमर्शहीन राजनीति का संकट

संवाददाता: प्रदीप कुमार शुक्ला 
लोकतंत्र में ‘लोक’ कहाँ है? : शक्ति, मीडिया और विमर्शहीन राजनीति का संकट
सेना की उस छोटी-सी कक्षा की कहानी केवल एक हास्यप्रद प्रसंग नहीं है; वह आधुनिक लोकतंत्र की एक गहरी त्रासदी का रूपक बन चुकी है। शिक्षक कहता है—“धरती तिकोनी है।” सैनिक कहता है—“नहीं सर, धरती गोल है, मैंने पढ़ा है।” लेकिन अंततः रैंक, अधिकार और अनुशासन के सामने तथ्य हार जाते हैं। सैनिक सलामी देकर कहता है—“जी सर, धरती तिकोनी ही है।” यहीं से “शक्ति का सिद्धांत” जन्म लेता है।
सत्य क्या है, यह तथ्य तय नहीं करते; सत्ता तय करती है।
अर्थ क्या होगा, यह तर्क तय नहीं करते; अधिकार तय करता है।
कौन सही है, यह ज्ञान नहीं तय करता; संस्थागत शक्ति तय करती है।
आज का सार्वजनिक जीवन, विशेषकर मीडिया और राजनीति, धीरे-धीरे इसी सिद्धांत की ओर बढ़ता दिखाई देता है। लोकतंत्र की संस्थाएँ अभी भी मौजूद हैं। चुनाव हो रहे हैं। संसद चल रही है। टीवी डिबेट हो रही हैं। अखबार छप रहे हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में स्वतंत्र विचार-विमर्श बचा हुआ है? या फिर पूरा विमर्श शक्ति-संरचनाओं द्वारा नियंत्रित एक पूर्वनिर्धारित आख्यान में बदलता जा रहा है?

लोकतंत्र केवल मतदान की प्रक्रिया नहीं होता। यदि केवल चुनाव होना ही लोकतंत्र होता, तो दुनिया के अनेक अधिनायकवादी शासन भी स्वयं को लोकतांत्रिक कह सकते थे। लोकतंत्र की आत्मा “लोक-विमर्श” में होती है—उस स्वतंत्र क्षमता में, जहाँ नागरिक सत्ता से प्रश्न पूछ सके, मीडिया सत्ता की जांच कर सके, और समाज तथ्यों व तर्कों के आधार पर अपनी राय बना सके।

लेकिन आज स्थिति धीरे-धीरे उलटती दिखाई देती है। मीडिया का बड़ा हिस्सा सूचना का माध्यम कम और सत्ता-समर्थित अर्थ-निर्माण का उपकरण अधिक बनता जा रहा है। अब समाचार केवल यह नहीं बताते कि “क्या हुआ”; वे यह भी तय करने लगे हैं कि “क्या सोचना है।” शब्दों के अर्थ बदल दिए जाते हैं। विरोध को “अराजकता” कहा जाता है, असहमति को “राष्ट्र-विरोध” कहा जाता है, प्रश्न पूछने को “षड्यंत्र” बना दिया जाता है।

यानी यदि सत्ता कहे कि “दिन है”, तो वह दिन है लेकिन यदि कोई नागरिक कहे कि “दिन है”, तो मीडिया पहले उसका राजनीतिक चरित्र देखेगा, फिर तय करेगा कि उसके “दिन” का अर्थ वास्तव में “रात” है या नहीं। यही शक्ति का सिद्धांत है।

यह केवल भारत की समस्या नहीं है। इतिहास में हर वह समाज, जहाँ सत्ता अत्यधिक केंद्रीकृत हुई, वहाँ सत्य धीरे-धीरे संस्थागत स्वीकृति पर निर्भर होने लगा। जॉर्ज ऑरवेल ने *1984* में इसी भयावह स्थिति की कल्पना की थी, जहाँ सत्ता कहती है—“दो और दो पाँच होते हैं”—और नागरिकों से अपेक्षा की जाती है कि वे केवल मानें ही नहीं, बल्कि उस पर विश्वास भी करें।

लोकतंत्र का संकट तब शुरू होता है जब नागरिक तथ्य से अधिक “आधिकारिक व्याख्या” पर निर्भर होने लगता है और आज राजनीति का चरित्र भी उसी दिशा में बदल रहा है।

पहले चुनाव विचारधाराओं, नीतियों, आर्थिक दृष्टिकोणों और सामाजिक कार्यक्रमों पर लड़े जाते थे। अब वे धीरे-धीरे व्यक्तियों के इर्द-गिर्द सिमटते जा रहे हैं। विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, रोजगार, श्रम अधिकार, पर्यावरण, स्थानीय अर्थव्यवस्था—ये सब मुद्दे पृष्ठभूमि में धकेल दिए गए हैं। केंद्र में केवल चेहरा रह गया है। राजनीति अब “नीति बनाम नीति” नहीं, बल्कि “व्यक्ति बनाम व्यक्ति” बनती जा रही है। यहीं सबसे बड़ा प्रश्न जन्म लेता है—इस पूरी प्रक्रिया में “लोक” कहाँ है?

लोकतंत्र में जनता केवल दर्शक नहीं होती; वह मूल शक्ति होती है। लेकिन यदि पूरी राजनीति दो व्यक्तियों की लोकप्रियता, छवि और प्रचार-युद्ध तक सीमित हो जाए, तो नागरिक धीरे-धीरे सक्रिय सहभागी से निष्क्रिय उपभोक्ता में बदल जाता है। वह विचार नहीं करता; वह केवल पक्ष चुनता है। वह नीतियों पर चर्चा नहीं करता; वह व्यक्तियों के समर्थन या विरोध में भावनात्मक रूप से खड़ा हो जाता है। यह लोकतंत्र का मनोरंजन में बदल जाना है।

टीवी स्टूडियो इस प्रवृत्ति के सबसे बड़े प्रतीक बन चुके हैं। वहाँ बहसें कम और वैचारिक कुश्ती अधिक होती है। एंकर मध्यस्थ नहीं, पक्षकार बन जाते हैं। जटिल आर्थिक और सामाजिक मुद्दों को “देशभक्त बनाम देशद्रोही” जैसे सरल और उत्तेजक फ्रेम में बदल दिया जाता है। नागरिकों का ध्यान वास्तविक समस्याओं से हटाकर प्रतीकात्मक संघर्षों में उलझा दिया जाता है और यह सत्ता के लिए सुविधाजनक भी है।

क्योंकि यदि राजनीति व्यक्ति-केंद्रित हो जाए, तो जवाबदेही कम हो जाती है। तब बेरोज़गारी, महँगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और संस्थागत संकट जैसे प्रश्न पीछे चले जाते हैं। नागरिक का संबंध संविधान से नहीं, व्यक्ति-विशेष से बनने लगता है। वह सरकार को “लोकसेवक” नहीं, “रक्षक” या “उद्धारक” की तरह देखने लगता है। यहीं लोकतंत्र और राजतंत्र के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।

प्रश्न—“यदि व्यक्ति ही मुद्दा है तो दोनों व्यक्ति आमने-सामने बहस कर लें और जनता फैसला कर दे”—दरअसल आधुनिक चुनावी राजनीति पर एक गहरा व्यंग्य है। क्योंकि जब पूरी राजनीति दो चेहरों तक सीमित कर दी जाती है, तब वास्तव में चुनाव विचारों का नहीं, व्यक्तित्वों का युद्ध बन जाता है। यह लोकतंत्र का सरलीकरण भी है और उसका संकट भी।

हालांकि यह भी सच है कि लोकतंत्र केवल नेताओं की वजह से कमजोर नहीं होता; वह तब कमजोर होता है जब समाज विमर्श छोड़ देता है। जब नागरिक प्रश्न पूछना छोड़ देता है। जब मीडिया सत्ता से अधिक सत्ता की भाषा बोलने लगता है। जब विश्वविद्यालय विचार की जगह करियर-फैक्ट्रियाँ बन जाते हैं। जब जनता अपने अधिकारों की जगह भावनात्मक पहचान को प्राथमिकता देने लगती है।

लोकतंत्र का वास्तविक स्वास्थ्य इस बात से तय होता है कि वहाँ असहमति कितनी सुरक्षित है। यदि कोई नागरिक यह कहने से डरने लगे कि “धरती गोल है”, क्योंकि सत्ता ने उसे “तिकोनी” घोषित कर दिया है, तो समझ लेना चाहिए कि समस्या केवल मीडिया की नहीं, पूरी लोकतांत्रिक संस्कृति की है।

लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव नहीं; लोकतंत्र का अर्थ है—तथ्य का सम्मान, प्रश्न का अधिकार, असहमति की सुरक्षा और जनता की वास्तविक भागीदारी। यदि ये तत्व कमजोर पड़ जाएँ, तो चुनाव होते रहने के बावजूद लोकतंत्र धीरे-धीरे केवल एक औपचारिक प्रक्रिया बन सकता है। और शायद आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है— "क्या हम अभी भी लोकतंत्र में रह रहे हैं, या केवल लोकतंत्र के दृश्य में?"