शिक्षा, सत्ता और लोकतंत्र : एक राष्ट्र की चेतना पर चल रहा मौन संघर्ष
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
शिक्षा, सत्ता और लोकतंत्र : एक राष्ट्र की चेतना पर चल रहा मौन संघर्ष
किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी संसदों में कम और उसके विद्यालयों में अधिक लिखा जाता है। राजनीतिक दल आते हैं, जाते हैं, सरकारें बनती हैं, टूटती हैं, घोषणाएँ होती हैं, नारे गढ़े जाते हैं, लेकिन एक समाज की वास्तविक दिशा इस बात से तय होती है कि उसके बच्चे क्या पढ़ रहे हैं, उसके युवा क्या सोच रहे हैं, और उसके विश्वविद्यालय कितने स्वतंत्र हैं। इसीलिए इतिहास गवाह है कि हर वह सत्ता जो लंबे समय तक बिना प्रश्नों के टिके रहना चाहती है, वह सबसे पहले जनता की चेतना पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास करती है। और चेतना पर नियंत्रण का सबसे सरल मार्ग है—शिक्षा को कमजोर कर देना।
जब कोई समाज शिक्षित होता है, तब वह केवल डिग्रियाँ प्राप्त नहीं करता; वह प्रश्न पूछना सीखता है। वह सत्ता से जवाब माँगना सीखता है। वह इतिहास और प्रचार के बीच का अंतर समझने लगता है। वह भावनात्मक नारों और वास्तविक समस्याओं के बीच की दूरी को पहचानने लगता है। वह यह समझने लगता है कि राष्ट्रभक्ति और सत्ता-भक्ति एक ही चीज़ नहीं हैं। यही कारण है कि हर अधिनायकवादी प्रवृत्ति को सबसे अधिक भय किसी विपक्षी दल से नहीं, बल्कि एक जागरूक छात्र से होता है।
एक अशिक्षित समाज को नारों से संचालित किया जा सकता है। उसे धर्म, जाति, भय, क्रोध और भावनात्मक उन्माद के सहारे दिशा दी जा सकती है। लेकिन एक शिक्षित समाज तथ्यों की माँग करता है। वह पूछता है कि बेरोज़गारी क्यों बढ़ रही है? वह जानना चाहता है कि विश्वविद्यालयों का स्तर क्यों गिर रहा है? वह यह देखने लगता है कि शिक्षा का बजट कम क्यों हो रहा है जबकि प्रचार का बजट बढ़ता जा रहा है। और शायद यहीं से सत्ता और शिक्षा के बीच का सबसे बड़ा टकराव आरंभ होता है।
आज भारत में शिक्षा को लेकर जो वातावरण निर्मित हुआ है, वह केवल नीतिगत विफलता का प्रश्न नहीं है; वह लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा हुआ प्रश्न है। विद्यालयों की दुर्दशा, सरकारी विश्वविद्यालयों का संसाधन-संकट, शोध की गिरती गुणवत्ता, शिक्षकों की रिक्तियाँ, प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार हो रही अनियमितताएँ, और शिक्षा के बढ़ते निजीकरण—ये सब अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं। ये उस गहरे संकट के लक्षण हैं जिसमें एक राष्ट्र धीरे-धीरे अपनी बौद्धिक रीढ़ खोने लगता है। सबसे दुखद बात यह है कि इस संकट को केवल प्रशासनिक समस्या मान लिया गया है, जबकि यह मूलतः सभ्यता का संकट है।
जब किसी देश का युवा शिक्षा से निराश हो जाता है, तब वह केवल नौकरी नहीं खोता—वह अपने भीतर भविष्य पर विश्वास खोने लगता है। उसकी ऊर्जा धीरे-धीरे हताशा में बदलने लगती है। और हताश युवा या तो चुप हो जाता है, या फिर बहुत आसानी से भीड़ का हिस्सा बना दिया जाता है।
यह लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक स्थिति होती है। क्योंकि लोकतंत्र केवल मतदान से जीवित नहीं रहता। लोकतंत्र तब जीवित रहता है जब नागरिक सोचते हैं, पढ़ते हैं, असहमति व्यक्त करते हैं और सत्ता से प्रश्न पूछने का नैतिक साहस रखते हैं। अगर किसी समाज से यह क्षमता छीन ली जाए, तो चुनाव भले होते रहें, पर लोकतंत्र भीतर से खोखला होने लगता है।
आज भारत का एक बड़ा युवा वर्ग डिग्रियों के बावजूद असुरक्षित है। उसके पास रोजगार नहीं है। उसके पास स्थिर भविष्य का भरोसा नहीं है। उसके विश्वविद्यालय राजनीतिक प्रयोगशालाओं में बदलते जा रहे हैं। वहाँ ज्ञान की जगह वैचारिक वफादारी का दबाव बढ़ रहा है। शोध की जगह प्रचार अधिक दिखाई देता है। विवेक की जगह उत्तेजना को महत्व दिया जा रहा है। और यह सब किसी एक सरकार या एक दल का संकट मात्र नहीं है; यह पूरे लोकतांत्रिक ढाँचे के लिए चेतावनी है। क्योंकि जब विश्वविद्यालय प्रश्न पूछना बंद कर देते हैं, तब समाज भी धीरे-धीरे प्रश्न पूछना भूल जाता है।
शिक्षा का उद्देश्य केवल “कुशल कर्मचारी” तैयार करना नहीं होता।
शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य स्वतंत्र चेतना का निर्माण करना होता है। एक अच्छा विश्वविद्यालय केवल इंजीनियर, डॉक्टर, वकील या अफसर नहीं बनाता; वह नागरिक बनाता है। ऐसे नागरिक जो तर्क कर सकें, संवेदना रख सकें, विविधता को समझ सकें और सत्ता से असहमति रखते हुए भी लोकतंत्र में विश्वास बनाए रख सकें। लेकिन यदि शिक्षा को केवल रोजगार तक सीमित कर दिया जाए, और रोजगार भी उपलब्ध न हो, तो युवा धीरे-धीरे वैचारिक रूप से असुरक्षित होने लगता है। ऐसे में राजनीति उसे पहचान, आक्रोश और भीड़ की ताकत देकर अपनी ओर आकर्षित करती है। इसीलिए इतिहास में हर वह दौर, जिसमें शिक्षा कमजोर हुई, वहाँ कट्टरता मजबूत हुई। जहाँ पुस्तकें कमजोर हुईं, वहाँ नारों ने जगह ले ली। जहाँ विश्वविद्यालय चुप हुए, वहाँ भीड़ बोलने लगी। और भीड़ कभी विचारशील नहीं होती। भीड़ केवल उत्तेजित होती है।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा आबादी कही जाती है।
लेकिन युवा केवल संख्या से शक्ति नहीं बनते। वे तब शक्ति बनते हैं जब वे शिक्षित, वैज्ञानिक दृष्टि से सम्पन्न, संवेदनशील और लोकतांत्रिक मूल्यों से युक्त हों। यदि शिक्षा कमजोर होगी, तो युवा केवल जनसंख्या बनकर रह जाएगा—राष्ट्र की सृजनात्मक शक्ति नहीं।
आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि शिक्षा को केवल चुनावी वादों का हिस्सा बनाया जाए। आवश्यकता इस बात की है कि उसे राष्ट्रीय अस्तित्व के प्रश्न की तरह देखा जाए। क्योंकि कोई भी राष्ट्र लंबे समय तक केवल धार्मिक उन्माद, भावनात्मक राष्ट्रवाद या मीडिया-निर्मित छवियों के सहारे नहीं चल सकता। अंततः उसे वैज्ञानिक चेतना, शोध, नवाचार और आलोचनात्मक सोच की आवश्यकता पड़ती ही है।
विडंबना यह है कि जिन देशों ने शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी, वे विश्व-शक्ति बने; और जिन्होंने जनता को भावनात्मक रूप से नियंत्रित रखने को प्राथमिकता दी, वे धीरे-धीरे भीतर से जर्जर हो गए।
भारत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ उसे तय करना है कि वह ज्ञान-आधारित समाज बनना चाहता है या भीड़-आधारित राजनीति का स्थायी मैदान। यह प्रश्न केवल सरकार से नहीं, समाज से भी पूछा जाना चाहिए।
क्या हम अपने बच्चों को केवल परीक्षा पास करने वाली मशीन बनाना चाहते हैं? या हम उन्हें ऐसा नागरिक बनाना चाहते हैं जो संविधान, लोकतंत्र, विज्ञान, करुणा और विवेक की भाषा समझे? क्या हम ऐसे विश्वविद्यालय चाहते हैं जहाँ स्वतंत्र विचार जीवित रहें? या ऐसे परिसर जहाँ केवल वैचारिक अनुशासन और राजनीतिक निष्ठा को ही देशभक्ति मान लिया जाए? क्योंकि किसी भी राष्ट्र का भविष्य अंततः उसकी कक्षाओं में तय होता है, चुनावी मंचों पर नहीं।
यदि एक समाज अपने युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में विफल हो जाता है, तो वह धीरे-धीरे अपने ही भविष्य के विरुद्ध षड्यंत्र करने लगता है। और यदि कोई सत्ता सचमुच चाहती है कि लोग हमेशा प्रश्नहीन बने रहें, तो उसे सबसे पहले शिक्षा को कमजोर करना ही पड़ेगा। क्योंकि शिक्षित मनुष्य को स्थायी रूप से भयभीत नहीं रखा जा सकता। उसे स्थायी रूप से भ्रमित नहीं रखा जा सकता। और सबसे महत्वपूर्ण बात—उसे स्थायी रूप से चुप नहीं रखा जा सकता। यही शिक्षा की सबसे बड़ी शक्ति है। और शायद सत्ता का सबसे बड़ा भय भी।
