महंगाई, मुनाफ़ा और मौन : पेट्रोल-डीज़ल की राजनीति में पिसता आम आदमी
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
महंगाई, मुनाफ़ा और मौन : पेट्रोल-डीज़ल की राजनीति में पिसता आम आदमीभारत में पेट्रोल और डीज़ल केवल ईंधन नहीं हैं; वे देश की अर्थव्यवस्था की धड़कन हैं। खेत से मंडी तक, फैक्टरी से बाज़ार तक, बस से ट्रक तक, शहर से गाँव तक — जीवन का लगभग हर पहिया तेल की कीमतों से जुड़ा हुआ है। इसलिए जब पेट्रोल-डीज़ल महंगे होते हैं, तो केवल वाहन चलाना महंगा नहीं होता; पूरा जीवन महंगा हो जाता है। रसोई से रोज़गार तक, खेती से किराये तक, हर क्षेत्र उसकी चपेट में आ जाता है।
ऐसे समय में जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की जा रही हो, और उसी दिन भारत में पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें फिर बढ़ा दी जाएँ, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं। जनता पूछती है — यदि वैश्विक बाज़ार में तेल सस्ता हुआ है, तो भारत में ईंधन महंगा क्यों हो रहा है? यदि सरकारी तेल कंपनियाँ भारी मुनाफ़ा कमा रही हैं, तो घाटे की भरपाई का तर्क कितना न्यायसंगत है? और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न — विकास और राजस्व के नाम पर आखिर यह बोझ कब तक आम आदमी पर डाला जाता रहेगा?
## तेल की कीमतें और आम आदमी का जीवन
पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें केवल व्यक्तिगत खर्च का विषय नहीं हैं; वे व्यापक आर्थिक संरचना को प्रभावित करती हैं। डीज़ल विशेष रूप से कृषि, माल परिवहन और सार्वजनिक परिवहन का आधार है। जैसे ही डीज़ल महंगा होता है, ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ती है और उसका असर खाद्यान्न, सब्ज़ियों, दूध, निर्माण सामग्री और रोज़मर्रा की वस्तुओं पर पड़ता है।
यानी ईंधन महंगाई “प्रत्यक्ष” से अधिक “अप्रत्यक्ष” रूप में जनता को प्रभावित करती है।
* एक मजदूर जो रोज़ बस से काम पर जाता है,
* एक किसान जो डीज़ल पंप से सिंचाई करता है,
* एक ट्रक चालक जो माल ढोता है,
* एक छोटा दुकानदार जो परिवहन पर निर्भर है —
इन सबकी लागत बढ़ती है।
परिणामतः महंगाई केवल आर्थिक आँकड़ा नहीं रहती; वह सामाजिक पीड़ा में बदल जाती है।
## अंतरराष्ट्रीय बाज़ार बनाम घरेलू राजनीति
सरकार और तेल कंपनियों का तर्क अक्सर यह होता है कि वैश्विक परिस्थितियाँ, युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव तेल कीमतों को प्रभावित कर रहे हैं। यह बात आंशिक रूप से सही भी है। पश्चिम एशिया में तनाव, होर्मुज़ जलडमरूमध्य की अनिश्चितता और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाज़ार की अस्थिरता का प्रभाव भारत जैसे आयात-निर्भर देश पर पड़ता ही है।
लेकिन प्रश्न यह है कि जब कच्चे तेल की कीमतें गिरती हैं, तब उसका लाभ जनता तक क्यों नहीं पहुँचता? और जब कीमतें बढ़ती हैं, तब बोझ तुरंत जनता पर क्यों डाल दिया जाता है? यही वह बिंदु है जहाँ आर्थिक नीति और राजनीतिक प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े होते हैं।
यदि तेल कंपनियाँ लगातार मुनाफ़ा दर्ज कर रही हैं, यदि सरकार भारी उत्पाद शुल्क वसूल रही है, तो यह पूछना अनुचित नहीं कि आखिर राहत देने की गुंजाइश कहाँ गायब हो जाती है।
## टैक्स आधारित अर्थव्यवस्था और जनता पर बोझ
पिछले वर्षों में केंद्र और राज्य सरकारों के लिए पेट्रोल-डीज़ल टैक्स राजस्व का बड़ा स्रोत बन चुके हैं। ईंधन पर लगने वाला उत्पाद शुल्क और वैट सरकारों को विशाल आय देता है। समस्या यह नहीं कि सरकार राजस्व जुटा रही है; समस्या यह है कि इसका भार अपेक्षाकृत अधिक उस वर्ग पर पड़ता है जो पहले से आर्थिक दबाव में है।
अर्थशास्त्र की दृष्टि से देखें तो अप्रत्यक्ष कर (Indirect Taxes) गरीब और मध्यम वर्ग पर अपेक्षाकृत अधिक बोझ डालते हैं, क्योंकि हर व्यक्ति एक ही दर पर टैक्स देता है — चाहे उसकी आय कुछ भी हो। यानी एक अमीर उद्योगपति और एक दिहाड़ी मजदूर, दोनों जब एक लीटर पेट्रोल खरीदते हैं, तो समान कर चुकाते हैं। इससे सामाजिक असमानता और बढ़ती है।
## रूस, अमेरिका और ऊर्जा कूटनीति
ऊर्जा नीति केवल आर्थिक नहीं, रणनीतिक प्रश्न भी है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा को कुछ हद तक संतुलित किया था। लेकिन यदि वैश्विक दबावों या भू-राजनीतिक समीकरणों के कारण भारत महंगे स्रोतों से तेल आयात करने पर अधिक निर्भर होता है, तो उसका आर्थिक असर स्वाभाविक रूप से जनता पर पड़ेगा।
अमेरिका से तेल आयात दूरी और परिवहन लागत के कारण अधिक महंगा हो सकता है। इसके अतिरिक्त भारतीय रिफाइनरियों की संरचना भी विशेष प्रकार के crude oil के अनुसार विकसित हुई है। इसलिए ऊर्जा नीति में केवल कूटनीतिक मित्रता नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित और आर्थिक विवेक भी आवश्यक हैं। किसी भी संप्रभु राष्ट्र के लिए ऊर्जा सुरक्षा केवल व्यापार का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्थिरता का प्रश्न होती है।
## लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका
किसी भी लोकतंत्र में मीडिया का काम केवल सरकार की घोषणाओं का प्रसारण करना नहीं, बल्कि जनता और सत्ता के बीच प्रश्नों का सेतु बनना होता है। महंगाई जैसे मुद्दों पर यदि मीडिया आलोचनात्मक विमर्श छोड़कर केवल सरकारी तर्कों को दोहराने लगे, तो लोकतांत्रिक संतुलन कमजोर होता है।
विडम्बना यह है कि जिन मुद्दों पर कभी सरकारों से कठोर सवाल पूछे जाते थे, आज कई बार वही मुद्दे “राष्ट्रहित” के नाम पर सामान्य बना दिए जाते हैं। इससे जनता के भीतर यह भावना गहराती है कि उसकी वास्तविक समस्याएँ विमर्श के केंद्र से बाहर होती जा रही हैं। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना राष्ट्रविरोध नहीं होती; बल्कि वही लोकतंत्र को उत्तरदायी बनाती है।
## महंगाई और राजनीतिक विमर्श का विचलन
यह भी एक गंभीर प्रश्न है कि जब जनता महंगाई, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी समस्याओं से जूझ रही हो, तब राजनीतिक विमर्श का केंद्र क्या होना चाहिए?
यदि सार्वजनिक बहसें लगातार सांस्कृतिक और धार्मिक ध्रुवीकरण की ओर मोड़ी जाती रहें, तो आर्थिक प्रश्न पीछे छूट जाते हैं। इससे सत्ता पर आर्थिक जवाबदेही का दबाव कम होता है।
इतिहास बताता है कि जब समाज भावनात्मक मुद्दों में अत्यधिक उलझ जाता है, तब आर्थिक नीतियों पर गंभीर सार्वजनिक विमर्श कमजोर पड़ने लगता है। यही स्थिति किसी भी लोकतंत्र के लिए खतरनाक हो सकती है।
## जनता की चुप्पी और लोकतंत्र का मनोविज्ञान
महंगाई का सबसे बड़ा असर केवल जेब पर नहीं, मनोविज्ञान पर भी पड़ता है। धीरे-धीरे लोग अपनी इच्छाएँ सीमित करने लगते हैं। वे बेहतर जीवन के सपने कम करने लगते हैं। परिवार खर्च काटने लगते हैं। छोटी खुशियाँ विलासिता लगने लगती हैं। और जब लगातार आर्थिक दबाव के बावजूद जनता को यह महसूस होने लगे कि उसकी आवाज़ से कुछ बदलने वाला नहीं है, तब लोकतंत्र के भीतर एक खतरनाक निराशा जन्म लेती है। क्योंकि लोकतंत्र केवल मतदान से नहीं चलता; वह इस विश्वास से चलता है कि जनता की पीड़ा सुनी जाएगी।
## असली प्रश्न : विकास किसके लिए?
सरकारें अक्सर विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक प्रतिष्ठा की बात करती हैं। ये महत्वपूर्ण भी हैं। लेकिन किसी भी विकास मॉडल की असली परीक्षा यही होती है कि क्या आम नागरिक का जीवन अधिक सुरक्षित, सम्मानजनक और सहज हो रहा है?
यदि तेल कंपनियाँ मुनाफ़े में हों और जनता लगातार महंगाई से टूट रही हो, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आर्थिक नीतियों का केंद्र कौन है — नागरिक या कॉरपोरेट लाभ?
विकास केवल बड़े प्रोजेक्ट्स, एक्सप्रेसवे और विदेशी निवेश से नहीं मापा जाता। विकास तब सार्थक होता है जब आम आदमी बिना भय और असुरक्षा के जीवन जी सके।
## राष्ट्रहित और जनहित अलग नहीं हो सकते
किसी भी सरकार के लिए राजस्व आवश्यक है। वैश्विक संकट भी वास्तविक हैं। लेकिन लोकतांत्रिक शासन की नैतिकता यही कहती है कि संकट का सबसे बड़ा बोझ उस जनता पर नहीं डाला जाना चाहिए जो पहले से संघर्ष कर रही हो।
राष्ट्रहित और जनहित अलग-अलग चीज़ें नहीं हैं।
* यदि आम नागरिक आर्थिक रूप से टूट रहा है,
* यदि मध्यम वर्ग असुरक्षित है,
* यदि किसान और मजदूर बढ़ती लागत से दबे हैं,
तो केवल विकास के दावे राष्ट्र को मजबूत नहीं बना सकते।
क्योंकि किसी भी राष्ट्र की असली शक्ति उसके तेल भंडार, टैक्स संग्रह या कॉरपोरेट मुनाफ़ों में नहीं होती — "वह उसके नागरिकों की गरिमा, भरोसे और जीवन की गुणवत्ता में होती है।"
