सिंहासन पर बैठे शठ जो, सच को धूल चटाते हैं

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


सिंहासन पर बैठे शठ जो, सच को धूल चटाते हैं,

हक़ मांगने वाले वीरों पर, जो लाठियाँ चलाते हैं!

सुन ले ओ अभिमानी शासक! यह पाप नहीं छुप पाएगा,

जनता की आँखों का शोला, तेरा तख़्त जलाएगा!


कौड़ी के भाव बिकी शिक्षा, जब प्रश्नपत्र बिक जाते हैं,

लाखों बच्चों के स्वप्नों पर, जब गिद्ध यहाँ मँडराते हैं!

मेधा की इस बलिबेदी पर, कब तक मौन रहा जाए?

यह सौदेबाज़ी पाप महा, कैसे इसको सहा जाए?


न्याय-नीति की बात न कर, प्रशासन में बैठे हत्यारे,

भ्रष्टाचार के नए जाल, बुनते हैं ये चालाक सारे!

'उच्चस्तरीय जांच' का जो, तुम ढोंग यहाँ रचवाते हो,

अपनी ही काली करतूतों पर, बस पर्दा डलवाते हो!


दर-दर भटक रहा तरुण देश का, सड़कों पर जो मजबूर खड़ा,

शोषण की इस भट्टी में, हर एक युवा का भाग्य सड़ा!

ज़िम्मेदार पिएं जो ख़ून यहाँ, उनका अब काल निकट आया,

जागो ओ भारत के युवाओं! जिसने तुमको भरमाया!


हुंकार भरो अब अंबर में, कुरुक्षेत्र का शंख बजाओ तुम,

अधिकार अगर न मिले सहज, तो छीन उसे ले आओ तुम!