सब सामान्य है” से “सोना मत खरीदिए” तक : क्या भारत एक नए आर्थिक दबाव की ओर बढ़ रहा है?

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


“सब सामान्य है” से “सोना मत खरीदिए” तक : क्या भारत एक नए आर्थिक दबाव की ओर बढ़ रहा है?

राजनीति में कई बार संकट पहले अर्थव्यवस्था में आता है, लेकिन उसकी भाषा बाद में बदलती है। लंबे समय तक यदि सरकार यह कहती रहे कि “सब नियंत्रण में है”, “अर्थव्यवस्था मजबूत है”, “भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है”, और फिर अचानक प्रधानमंत्री जनता से पेट्रोल-डीजल कम खर्च करने, विदेश यात्राएँ टालने, वर्क फ्रॉम होम अपनाने और एक साल तक सोना न खरीदने की अपील करने लगें—तो यह केवल सामान्य सलाह नहीं रह जाती। यह उस आर्थिक बेचैनी का संकेत बन जाती है जिसे सरकार खुलकर स्वीकार नहीं करना चाहती, लेकिन पूरी तरह छिपा भी नहीं पा रही।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तेलंगाना के सिकंदराबाद में दिया गया बयान इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने मिडिल ईस्ट संकट, यूक्रेन युद्ध और वैश्विक अस्थिरता का हवाला देते हुए कहा कि भारत को ऊर्जा खपत कम करनी चाहिए, वर्क फ्रॉम होम जैसी व्यवस्थाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए और लोग एक वर्ष तक सोना खरीदने से बचें। पहली नज़र में यह अपील ऊर्जा संरक्षण और आर्थिक संयम का सामान्य संदेश लग सकती है, लेकिन इसके भीतर भारत की अर्थव्यवस्था की कई गहरी चिंताएँ छिपी दिखाई देती हैं।

भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में से एक है। उसकी ऊर्जा निर्भरता बहुत हद तक पश्चिम एशिया पर टिकी हुई है। यदि मिडिल ईस्ट में युद्ध या अस्थिरता बढ़ती है, तो सबसे पहला असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ता है। तेल महँगा होने का अर्थ केवल पेट्रोल-डीजल महँगा होना नहीं है; इसका अर्थ है परिवहन लागत बढ़ना, महँगाई बढ़ना, रुपये पर दबाव बढ़ना और विदेशी मुद्रा भंडार पर अतिरिक्त बोझ आना। यहीं प्रधानमंत्री की अपील का दूसरा अर्थ समझ में आता है।


जब सरकार जनता से कहती है कि पेट्रोल-डीजल कम इस्तेमाल कीजिए, ट्रकों की बजाय रेल परिवहन बढ़ाइए, और वर्क फ्रॉम होम अपनाइए—तो वह केवल पर्यावरणीय नैतिकता की बात नहीं कर रही होती; वह ऊर्जा आयात बिल कम करने की आवश्यकता की ओर भी संकेत कर रही होती है। सबसे दिलचस्प और असामान्य अपील सोना न खरीदने को लेकर थी।


भारतीय समाज में सोना केवल आभूषण नहीं है; वह सांस्कृतिक सुरक्षा, सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक बचत का पारंपरिक माध्यम है। विशेषकर ग्रामीण और मध्यवर्गीय भारत में संकट के समय लोग बैंकिंग सिस्टम से अधिक भरोसा सोने पर करते हैं। लेकिन यही सोना भारत के आयात बिल को भी भारी बनाता है। जब तेल और सोना दोनों का आयात बढ़ता है, तो चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) और विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ता है। ऐसे समय में सरकारें अक्सर जनता से “गोल्ड इंपोर्ट” कम करने की अपील करती हैं। यानी प्रधानमंत्री का यह बयान केवल सामाजिक सलाह नहीं, बल्कि आर्थिक संकेत भी हो सकता है।


यहाँ एक महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रश्न भी उभरता है। यदि वैश्विक संकट इतना गंभीर था, तो चुनावों के दौरान उसकी चर्चा क्यों नहीं हुई? चुनावी अभियानों में लगातार यह संदेश दिया जाता रहा कि भारत दुनिया की सबसे स्थिर और मजबूत अर्थव्यवस्था है, रुपया सुरक्षित है, निवेश बढ़ रहा है और विकास की रफ्तार तेज़ है। लेकिन चुनाव समाप्त होते ही यदि सरकार संयम, बचत और उपभोग कम करने की अपील करने लगे, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि क्या वास्तविक आर्थिक चुनौतियों को चुनावी राजनीति के कारण पीछे रखा गया था?


यह केवल वर्तमान सरकार की समस्या नहीं है; आधुनिक लोकतांत्रिक राजनीति की एक सामान्य प्रवृत्ति है। चुनावी समय में सरकारें संकट की भाषा से बचती हैं, क्योंकि भय और अनिश्चितता राजनीतिक नुकसान पहुँचा सकती है। लेकिन अर्थव्यवस्था प्रचार से नहीं चलती। यदि वैश्विक तेल बाजार अस्थिर होता है, यदि रुपया दबाव में आता है, यदि विदेशी मुद्रा भंडार पर बोझ बढ़ता है, तो उसका असर अंततः जनता के जीवन पर दिखाई देता ही है।


वर्क फ्रॉम होम की पुनर्वापसी पर भी चर्चा दिलचस्प है। कोरोना काल में इसे मजबूरी के रूप में अपनाया गया था। उस समय यह तकनीकी आधुनिकता और कार्य-संस्कृति में बदलाव का प्रतीक माना गया। लेकिन अब यदि सरकार स्वयं इसे ऊर्जा बचत के उपाय के रूप में प्रस्तुत कर रही है, तो यह बताता है कि आने वाले समय में ईंधन लागत और शहरी परिवहन का दबाव गंभीर विषय बन सकता है।


हालांकि इसके सामाजिक और आर्थिक प्रभाव जटिल हैं। भारत का विशाल अनौपचारिक श्रम क्षेत्र, छोटे व्यापारी, परिवहन सेवाएँ, ऑफिस आधारित रोजगार और शहरी अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा physical mobility पर निर्भर करता है। व्यापक स्तर पर work from home मॉडल फिर लागू होता है, तो इससे रियल एस्टेट, छोटे व्यापार, शहरी परिवहन और लाखों service workers प्रभावित हो सकते हैं। यानी समाधान उतना सरल नहीं जितना भाषण में दिखाई देता है। इस पूरे घटनाक्रम में एक और गहरी बात छिपी है—भारत की आर्थिक संरचना अभी भी अत्यधिक आयात-निर्भर है।


* ऊर्जा आयात।

* इलेक्ट्रॉनिक आयात।

* सोना आयात।

* औद्योगिक कच्चा माल।


“आत्मनिर्भर भारत” के राजनीतिक नारे के बावजूद वास्तविक आर्थिक आत्मनिर्भरता अभी दूर है। यही कारण है कि वैश्विक युद्ध, तेल संकट या डॉलर की मजबूती का असर सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है लेकिन शायद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या भारत ने संभावित वैश्विक संकटों के लिए पर्याप्त संस्थागत तैयारी की है?


* क्या सार्वजनिक परिवहन पर्याप्त मजबूत है?

* क्या रेलवे माल परिवहन का वास्तविक विकल्प बन चुकी है?

* क्या नवीकरणीय ऊर्जा पर्याप्त स्तर तक पहुँची है?

* क्या शहरों का ढाँचा ऐसा है कि लोग कम ईंधन पर जीवन चला सकें?

* क्या ग्रामीण अर्थव्यवस्था इतनी सशक्त है कि वैश्विक झटकों को सह सके?


यदि इन प्रश्नों का उत्तर “नहीं” है, तो केवल नागरिकों से संयम की अपील पर्याप्त नहीं होगी।


यह भी सच है कि ऊर्जा संरक्षण, सार्वजनिक परिवहन, कम उपभोग और पर्यावरणीय संतुलन भविष्य की आवश्यकता हैं। लेकिन जब ऐसी अपीलें अचानक आर्थिक और भू-राजनीतिक तनावों के बीच सामने आती हैं, तो वे स्वाभाविक रूप से चिंता पैदा करती हैं; क्योंकि जनता यह समझती है कि सरकारें अक्सर वही बातें सार्वजनिक रूप से कहना शुरू करती हैं, जिनका दबाव भीतर बढ़ चुका होता है। और शायद यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण संकेत है— "भारत केवल एक राजनीतिक चुनावी दौर से नहीं गुजर रहा, बल्कि संभवतः एक नए आर्थिक दबाव के दौर की दहलीज पर भी खड़ा है।"