जब अदालतें सत्ता की छाया में दिखने लगें

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


जब अदालतें सत्ता की छाया में दिखने लगें

लोकतंत्र में अदालतें केवल कानून लागू करने वाली संस्था नहीं होतीं; वे उस भरोसे का नाम होती हैं जिसके सहारे नागरिक मानते हैं कि शक्ति के सामने भी एक निष्पक्ष दीवार खड़ी है। इसीलिए सर्वोच्च न्यायपालिका पर सबसे बड़ा संकट तब आता है जब उसके फैसलों से नहीं, उसके चयन, उसकी गति और उसकी प्राथमिकताओं से जनता को यह लगने लगे कि संवैधानिक विवेक और सत्ता-निकटता के बीच की रेखा धुंधली हो रही है। रंजन गोगोई 3 अक्टूबर 2018 को भारत के मुख्य न्यायाधीश बने थे, और बाद में वे राज्यसभा के लिए राष्ट्रपति द्वारा नामित सदस्य बने; यही तथ्य भारतीय सार्वजनिक जीवन में न्यायपालिका की स्वतंत्रता, सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली भूमिकाओं और संस्थागत निष्पक्षता की बहस को और तीखा बनाता है। 


यह चिंता केवल किसी एक नाम की नहीं, बल्कि उस पूरे ढाँचे की है जिसमें कुछ अत्यंत संवेदनशील मामलों को लेकर “न्याय” की गति, पारदर्शिता और प्राथमिकता पर बार-बार सवाल उठते हैं। डी.वाई. चंद्रचूड़ के नेतृत्व में सर्वोच्च न्यायालय ने 11 दिसंबर 2023 को अनुच्छेद 370 पर निर्णय दिया, और 15 फरवरी 2024 के उसके संविधान पीठीय फैसले ने Electoral Bond Scheme को असंवैधानिक ठहराते हुए उसे अनुच्छेद 19(1)(a) और 14 का उल्लंघन माना। आधिकारिक रिकॉर्ड यह भी दिखाते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की अधिकारिता में habeas corpus जैसी writs शामिल हैं, यानी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में अदालत की भूमिका अत्यंत केंद्रीय है। ऐसे में जब नागरिकों को लगता है कि liberty petitions या राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में संस्थागत सख्ती उतनी नहीं दिखती जितनी दिखनी चाहिए, तो प्रश्न केवल किसी एक फैसले का नहीं रह जाता; वह न्यायपालिका की आत्म-छवि का प्रश्न बन जाता है।


संकट तब और गहरा हो जाता है जब अदालत का सार्वजनिक चेहरा “निष्पक्ष निर्णायक” से बदलकर “प्रबंधित संस्था” जैसा प्रतीत होने लगे। यह केवल किसी निर्णय से असहमति नहीं होती; यह उस व्यापक अनुभव का नाम होता है जिसमें नागरिक महसूस करते हैं कि संवैधानिक मामलों में न्याय की आकृति तो बनी रहती है, लेकिन उसकी आत्मा धीरे-धीरे दुर्बल हो रही है। लोकतंत्र के लिए यह बहुत बड़ा खतरा है, क्योंकि एक बार अदालत के प्रति जनविश्वास टूटने लगे तो फिर शासन की अन्य शाखाओं पर नियंत्रण रखने वाली अंतिम नैतिक दीवार कमजोर पड़ जाती है।


यही कारण है कि न्यायपालिका पर आलोचना व्यक्तिगत अपमान की भाषा में नहीं, बल्कि संस्थागत उत्तरदायित्व की भाषा में होनी चाहिए। सवाल यह होना चाहिए कि रोस्टर प्रणाली कितनी पारदर्शी है, संवेदनशील मामलों में पीठों का गठन कितनी विश्वसनीय प्रक्रिया से होता है, आदेशों में समय पर और स्पष्ट कारण कितने दिए जाते हैं, और सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली भूमिकाएँ क्या सार्वजनिक संदेह को जन्म देती हैं या नहीं। यह बहस किसी एक न्यायाधीश के चरित्र-चित्रण की नहीं, बल्कि एक ऐसे संवैधानिक तंत्र की रक्षा की है जिसकी विश्वसनीयता ही उसकी सबसे बड़ी पूँजी है।


अंततः, अदालतों की परीक्षा इस बात से होती है कि वे सत्ता को कितना आराम देती हैं, बल्कि इस बात से होती है कि वे नागरिक की स्वतंत्रता, समानता और असुरक्षा के सामने कितनी दृढ़ खड़ी रहती हैं। जब जनता को लगने लगे कि कुछ मामलों में परिणाम पहले से अनुमानित हैं, कुछ याचिकाएँ अनंतकाल तक लटकी रहती हैं, और कुछ संवेदनशील प्रश्नों पर संस्था अपनी नैतिक आवाज़ धीमी कर देती है, तब लोकतंत्र के भीतर एक चुप, धीमा और खतरनाक क्षय शुरू हो जाता है। और इतिहास, अक्सर, ऐसी धीमी मौतों को सबसे कठोर भाषा में याद रखता है।