राष्ट्रवाद का बोझ केवल जनता पर क्यों?
राष्ट्रवाद का बोझ केवल जनता पर क्यों?
### “त्याग” की राजनीति, सत्ता का वैभव और भारतीय लोकतंत्र का मौन संकट
भारत का लोकतंत्र इस विश्वास पर टिका है कि सत्ता जनता की सेवक होती है, स्वामी नहीं। जनता अपने श्रम, कर और विश्वास से सरकारों को शक्ति देती है ताकि वे राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करें, सुरक्षा सुनिश्चित करें, रोजगार बढ़ाएं और भविष्य को स्थिर बनाएं। लेकिन जब वही सत्ता आर्थिक कठिनाइयों का समाधान जनता की जीवनशैली में कटौती खोजने लगे, तब प्रश्न उठना स्वाभाविक हो जाता है कि आखिर शासन चल कौन रहा है — एक लोकतांत्रिक गणराज्य या त्याग का उपदेश देने वाला कोई नैतिक अनुशासन शिविर?
पिछले कुछ समय में प्रधानमंत्री द्वारा नागरिकों से पेट्रोल कम जलाने, विदेश यात्राएं टालने, सोना न खरीदने, तेल कम खाने और खर्चों में कटौती करने की अपीलों ने देश में एक गहरी वैचारिक बहस को जन्म दिया है। यह बहस केवल अर्थव्यवस्था की नहीं है; यह शासन की नैतिकता, राजनीतिक जवाबदेही और राष्ट्रवाद की परिभाषा से जुड़ी हुई बहस है।
राष्ट्रवाद का अर्थ क्या केवल इतना रह गया है कि जनता अपनी इच्छाओं, आवश्यकताओं और जीवन की छोटी-छोटी खुशियों का त्याग करती रहे, जबकि सत्ता अपने वैभव, प्रचार और शाही तंत्र को उसी गति से चलाती रहे? यही वह प्रश्न है जो आज करोड़ों भारतीयों के मन में मौन रूप से उठ रहा है।
## “विश्वगुरु” की छवि और जनता की जेब
2014 में देश के सामने एक स्वप्न रखा गया था — “अच्छे दिन” का स्वप्न। कहा गया था कि भारत विश्व मंच पर नई शक्ति बनकर उभरेगा, रुपया मजबूत होगा, रोजगार बढ़ेंगे, निवेश आएगा और भारत आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर होगा। लेकिन 2026 आते-आते परिस्थितियां ऐसी बन गईं कि जनता से कहा जा रहा है — कम घूमो, कम खरीदो, कम खाओ, कम खर्च करो। यह विडंबना केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भी है।
प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं, चार्टर्ड विमानों, एयर इंडिया वन, सुरक्षा प्रबंधों और सरकारी व्यवस्थाओं पर हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के आंकड़े सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बन चुके हैं। यदि राष्ट्र आर्थिक संकट से गुजर रहा है, यदि विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव है, यदि तेल आयात चिंता का विषय है, तो सबसे पहले मितव्ययिता का उदाहरण सत्ता को प्रस्तुत करना चाहिए था।
लेकिन भारत की राजनीति में एक नया विरोधाभास विकसित हुआ है — "सत्ता के लिए वैभव राष्ट्रगौरव है, जबकि जनता का उपभोग राष्ट्रहित के विरुद्ध बताया जाने लगा है।"
जनता पूछ रही है कि इन विशाल विदेशी दौरों, वैश्विक आयोजनों, रोड शो और प्रचार अभियानों से देश को ठोस रूप में मिला क्या?
* क्या बेरोजगारी कम हुई?
* क्या रुपया मजबूत हुआ?
* क्या पेट्रोल सस्ता हुआ?
* क्या किसानों की आय दोगुनी हुई?
* क्या मध्यम वर्ग पर टैक्स का बोझ घटा?
* क्या भारत की ऊर्जा निर्भरता कम हुई?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर नकारात्मक हैं, तो फिर राष्ट्रवाद के नाम पर जनता से लगातार त्याग मांगने की नैतिक वैधता कितनी बचती है?
## त्याग की परंपरा बनाम सत्ता का प्रदर्शन
भारतीय इतिहास त्याग की परंपरा से भरा पड़ा है। इस देश ने युद्ध, अकाल, महामारी और आर्थिक संकटों में असाधारण धैर्य दिखाया है। लेकिन भारत की सांस्कृतिक चेतना में त्याग सदैव ऊपर से नीचे आया है। राजा पहले संयमित होता था, तब प्रजा उसका अनुसरण करती थी।
यही कारण है कि जब Lal Bahadur Shastri ने 1965 के युद्धकाल में “एक समय का भोजन छोड़ने” की अपील की, तो देश ने उसे आदेश नहीं, बल्कि नैतिक आह्वान माना। क्योंकि शास्त्री स्वयं सादगी का जीवन जीते थे। उनकी राजनीति प्रदर्शन की नहीं, सहभागिता की राजनीति थी।
इसके विपरीत आज का राजनीतिक वातावरण प्रतीकों, इवेंट प्रबंधन और वैभवपूर्ण प्रस्तुति पर अधिक आधारित दिखाई देता है। जनता से ईंधन बचाने को कहा जाता है, लेकिन राजनीतिक रैलियों और VIP काफिलों की भव्यता पर कोई चर्चा नहीं होती। मध्यम वर्ग को विदेश यात्रा टालने की सलाह दी जाती है, लेकिन सत्ता प्रतिष्ठान की वैश्विक यात्राओं और आलीशान व्यवस्थाओं पर मौन बना रहता है। यह दोहरी नैतिकता लोकतंत्र में विश्वास को कमजोर करती है।
## सोना : भारतीय अर्थव्यवस्था का सांस्कृतिक बीमा
भारत में सोना केवल आभूषण नहीं है। वह भारतीय समाज की सदियों पुरानी सामाजिक सुरक्षा प्रणाली है। गांव का किसान संकट में बैंक से पहले गहना गिरवी रखता है। मध्यम वर्ग कठिन समय में FD से पहले सोना बेचता है। भारतीय महिलाओं के पास विश्व का लगभग 11 प्रतिशत सोना होना केवल सांस्कृतिक तथ्य नहीं, बल्कि आर्थिक संरचना का हिस्सा है।
इसलिए जब सरकार सोना खरीदने से बचने की अपील करती है, तब जनता यह भी पूछती है कि क्या सरकार ने उस सामाजिक वास्तविकता को समझा है जिसमें सोना भारतीय परिवारों के लिए आर्थिक सुरक्षा कवच का कार्य करता है?
यदि विदेशी मुद्रा बचाना ही उद्देश्य है, तो फिर सबसे बड़ा प्रश्न तेल आयात पर क्यों नहीं उठता? भारत की तेल निर्भरता 2014 की तुलना में और बढ़ी है। कच्चे तेल के आयात पर सोने से कई गुना अधिक विदेशी मुद्रा खर्च होती है। फिर राजनीतिक विमर्श का केंद्र केवल जनता का उपभोग क्यों बनता है?
और सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि स्वयं Reserve Bank of India लगातार अपने स्वर्ण भंडार बढ़ा रहा है। दुनिया के केंद्रीय बैंक डॉलर आधारित अस्थिरता से बचने के लिए सोना खरीद रहे हैं। यानी संस्थागत स्तर पर सोना “सुरक्षित संपत्ति” है, लेकिन आम नागरिक के लिए वही सोना “राष्ट्रहित के विरुद्ध खर्च” का प्रतीक बना दिया जाता है।
## राष्ट्रवाद या आर्थिक अनुशासन का मनोवैज्ञानिक मॉडल?
पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति में राष्ट्रवाद का ऐसा मॉडल विकसित हुआ है जिसमें आर्थिक कठिनाइयों का समाधान संरचनात्मक सुधारों से अधिक, नागरिकों के व्यवहार नियंत्रण में खोजा जाने लगा है।
* कभी गैस सब्सिडी छोड़ो।
* कभी कम पेट्रोल जलाओ।
* कभी कम तेल खाओ।
* कभी विदेश मत जाओ।
* कभी कम खरीदो।
धीरे-धीरे यह संदेश स्थापित किया गया कि हर संकट का समाधान जनता की जेब, आदतों और इच्छाओं में कटौती से निकलेगा।
लेकिन कोई भी मजबूत अर्थव्यवस्था अपने नागरिकों को “कम खर्च करो” कहकर विकसित राष्ट्र नहीं बनती। विकसित अर्थव्यवस्थाएं नागरिकों की क्रयशक्ति बढ़ाती हैं, उत्पादन बढ़ाती हैं, रोजगार पैदा करती हैं और उपभोग क्षमता का विस्तार करती हैं। जब सरकारें लगातार नागरिकों को संयम और कटौती का पाठ पढ़ाने लगें, तो यह संकेत अक्सर आर्थिक संरचना की कमजोरी की ओर जाता है।
## लोकतंत्र में प्रश्न पूछना राष्ट्रविरोध नहीं
आज भारत के सामने सबसे बड़ा संकट केवल महंगाई या बेरोजगारी नहीं है। उससे बड़ा संकट है — सत्ता और जनता के बीच बढ़ती मानसिक दूरी। जनता महसूस कर रही है कि त्याग का बोझ एकतरफा है।
* EMI जनता भरे।
* महंगा पेट्रोल जनता खरीदे।
* बढ़ते टैक्स जनता दे।
* महंगी शिक्षा और स्वास्थ्य का बोझ जनता उठाए।
* और दूसरी ओर सत्ता का तंत्र निरंतर विस्तारित होता जाए।
लोकतंत्र में यह भावना अत्यंत खतरनाक होती है, क्योंकि इससे शासन के नैतिक आधार कमजोर होने लगते हैं।
राष्ट्रवाद का वास्तविक अर्थ सरकार से प्रश्न पूछने का अधिकार समाप्त करना नहीं है। सच्चा राष्ट्रवाद सत्ता को अधिक जवाबदेह बनाता है। यदि जनता पूछ रही है कि “त्याग केवल आम आदमी करेगा या सत्ता भी कभी अपने खर्चों का हिसाब देगी?”, तो यह लोकतंत्र की स्वस्थ चेतना का संकेत है, राष्ट्रविरोध नहीं।
## राष्ट्र निर्माण भाषणों से नहीं, विश्वास से होता है
भारत का नागरिक त्याग करने से पीछे नहीं हटता। उसने हर कठिन समय में राष्ट्र का साथ दिया है। लेकिन जनता यह भी चाहती है कि सत्ता केवल उपदेश न दे, बल्कि उदाहरण प्रस्तुत करे।
* यदि देश आर्थिक चुनौती में है, तो सबसे पहले राजनीतिक वैभव में कटौती दिखाई देनी चाहिए।
* VIP संस्कृति पर नियंत्रण दिखना चाहिए।
* अनावश्यक सरकारी खर्च कम होते दिखाई देने चाहिए।
* राजनीतिक प्रचार की अपव्ययी शैली पर पुनर्विचार होना चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र में राष्ट्र निर्माण केवल नारों, अभियानों और भावनात्मक भाषणों से नहीं होता। राष्ट्र निर्माण विश्वास, पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और साझा त्याग से होता है; और जब त्याग साझा नहीं होता, तब राष्ट्रवाद धीरे-धीरे प्रेरणा नहीं, बल्कि असंतोष का कारण बनने लगता है।
