"गंगा में अस्थियों का विसर्जन: अंत कहाँ, आरंभ कहाँ?"

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


"गंगा में अस्थियों का विसर्जन: अंत कहाँ, आरंभ कहाँ?"

हर हर गंगे!

गंगा—नदी नहीं, नाड़ी है।

सिर्फ़ जल नहीं, जीवन की तरल चेतना है।

पतित पावनी, दिव्य, देवत्व का वह स्रोत, जो स्वर्ग से उतरी नहीं—स्वर्ग को धरती पर उतार लाई।

शास्त्र कहते हैं—गंगा भगवान विष्णु के चरणों से प्रकट हुई और शिव की जटाओं में ठहरी। तभी वह संतुलित हुई। तभी वह पावन और शांत बनी। और तभी वह बनी मुक्ति का मार्ग

गंगा का प्रश्न और श्रीहरि का उत्तर:

एक दिन स्वयं गंगा ने श्रीहरि से प्रश्न किया, कि "प्रभु! मैं हर किसी के पाप धोती हूँ, पर इन पापों का क्या होगा? मैं तो स्वयं ही मैली हो जाऊँगी!"

भगवन विष्णु मुस्कराए, और बोले: "जब संत, साधु और वैष्णव तुम्हारे जल में स्नान करेंगे, तब वही पावन ऊर्जा तुम्हारे पापों को हर लेगी।"


यह संवाद केवल संवाद नहीं था, धर्म और विज्ञान का एक शाश्वत सूत्र था।


अस्थियों का रहस्य: कहां जाती हैं वे?


हर हिंदू की अंतिम इच्छा होती है कि उसकी अस्थियों का विसर्जन गंगा में हो।

लेकिन... प्रश्न यह है:

इतनी अस्थियां गंगा में विसर्जित होती हैं, तो वे जाती कहां हैं?

ना दिखती हैं, ना जमती हैं, ना सड़न होती है... फिर कहाँ?


वैज्ञानिक भी उत्तर नहीं दे पाए।

गंगासागर तक शोधकर्ता गए—पर हड्डियों का कोई ठिकाना नहीं मिला। पर सनातन श्रद्धा कहती है:


"ये अस्थियां पवित्र जल के माध्यम से सीधे श्रीहरि के चरणों तक पहुंचती हैं।"

"जो गंगा को अपनाता है, गंगा उसे मोक्ष तक पहुंचाती है।"


विज्ञान की दृष्टि: गूढ़, किंतु संतुलित


गंगा के जल में पारा (Mercury) होता है।


* हड्डियों में जो कैल्शियम और फॉस्फोरस होता है, वह इस पारे में घुलकर जलजीवों के लिए पौष्टिक आहार बनता है।

* हड्डियों में मौजूद गंधक (Sulphur), पारे से मिलकर मरकरी सल्फाइड (HgS) बनाता है—जो जल को शुद्ध रखने वाला यौगिक है।

* यही मरकरी सल्फाइड, धार्मिक रूप से 'पारद', शिव का प्रतीक माना जाता है।

* गंधक 'शक्ति' का प्रतीक है।

और इस प्रकार अस्थियाँ, अंततः शिव और शक्ति में विलीन हो जाती हैं।


गंगा: पाप धोने वाली नहीं, मोक्ष दिलाने वाली है


गंगा केवल शरीर की अस्थियाँ नहीं बहाती—वह जीवन की यात्रा को पूर्णता तक पहुँचाती है।


* उसमें आत्मा घुलती है,

* पाप गलते हैं,

* और व्यक्ति बैकुण्ठ की ओर बढ़ता है।


यह कोई अंधश्रद्धा नहीं—यह शाश्वत विश्वास है, जिसे ना विज्ञान काट सका, ना समय मिटा सका।


हर हर गंगे!


“गंगा में जो गिरता है, वह गिरता नहीं—वह उठता है, ऊपर उठता है।”

“वह मिटता नहीं, वह शिव और शक्ति में समा जाता है।”


गंगा जल केवल जल नहीं, वह एक आकाशगंगा है—जिसमें हर आत्मा एक दिन विलीन होती है।


हर हर गंगे!

जय श्रीहरि।

जय भोलेनाथ।