राष्ट्रवाद बनाम कॉर्पोरेटवाद : क्या 21वीं सदी में राष्ट्र-राज्य धीरे-धीरे बाज़ार की शाखा बनता जा रहा है?
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
राष्ट्रवाद बनाम कॉर्पोरेटवाद : क्या 21वीं सदी में राष्ट्र-राज्य धीरे-धीरे बाज़ार की शाखा बनता जा रहा है?
21वीं सदी की वैश्विक राजनीति के सबसे असहज और निर्णायक प्रश्नों में से एक यह है कि आज राष्ट्र किसके लिए काम कर रहे हैं—अपने नागरिकों के लिए, या उन विशाल कॉर्पोरेट संरचनाओं के लिए जिनकी आर्थिक शक्ति अब कई देशों की GDP से भी बड़ी हो चुकी है?
यह प्रश्न केवल भारत का नहीं है। अमेरिका से चीन तक, रूस से खाड़ी देशों तक, यूरोप से अफ्रीका तक—हर जगह राष्ट्रवाद और कॉर्पोरेटवाद (Corporate Capitalism) के बीच एक नया और जटिल गठबंधन उभरता दिखाई दे रहा है। और यही गठबंधन आने वाले दशकों में लोकतंत्र, संप्रभुता और नागरिक अधिकारों की दिशा तय कर सकता है।
भारत में यह बहस हाल के वर्षों में इसलिए तीखी हुई है क्योंकि विदेश नीति, राष्ट्रीय परियोजनाओं, रणनीतिक इंफ्रास्ट्रक्चर और बड़े कॉर्पोरेट समूहों के बीच बढ़ती निकटता ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि कहीं “राष्ट्रहित” की अवधारणा धीरे-धीरे “कॉर्पोरेट हित” में तो परिवर्तित नहीं हो रही।
## राष्ट्रवाद का मूल विचार क्या था?
आधुनिक राष्ट्रवाद का जन्म मूलतः सामूहिक राजनीतिक आत्मनिर्णय की अवधारणा से हुआ था। राष्ट्र-राज्य का उद्देश्य था—
* जनता की संप्रभुता की रक्षा,
* संसाधनों पर सामूहिक नियंत्रण,
* सामाजिक सुरक्षा,
* और बाहरी आर्थिक-राजनीतिक प्रभुत्व से मुक्ति।
20वीं सदी के उपनिवेश-विरोधी आंदोलनों में राष्ट्रवाद जनता की आकांक्षाओं का प्रतीक था। भारत जैसे देशों में राष्ट्रवाद का अर्थ था—राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ आर्थिक स्वावलंबन और सामाजिक न्याय।
लेकिन 21वीं सदी में राष्ट्रवाद का चरित्र बदलता दिखाई दे रहा है।
अब वह केवल सांस्कृतिक पहचान या सीमाओं की सुरक्षा तक सीमित नहीं है; वह वैश्विक पूँजी के साथ एक नए संबंध में प्रवेश कर चुका है।
## कॉर्पोरेटवाद : नया वैश्विक साम्राज्यवाद?
पारंपरिक साम्राज्यवाद सेनाओं और उपनिवेशों के माध्यम से काम करता था। आज का कॉर्पोरेटवाद बंदरगाहों, डेटा नेटवर्क, ऊर्जा गलियारों, खनिज संसाधनों, डिजिटल प्लेटफॉर्म, रक्षा समझौतों और वित्तीय नियंत्रण के माध्यम से अपना प्रभाव स्थापित करता है। आज दुनिया की अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ—
* सरकारों से अधिक संसाधन नियंत्रित करती हैं,
* चुनावी राजनीति को प्रभावित करती हैं,
* मीडिया नैरेटिव गढ़ती हैं,
* और विदेश नीतियों को आकार देने की क्षमता रखती हैं।
यानी शक्ति का केंद्र धीरे-धीरे निर्वाचित संस्थाओं से हटकर पूँजी-नियंत्रित संरचनाओं की ओर स्थानांतरित हो रहा है।
## भारत : राष्ट्रवाद की भाषा, कॉर्पोरेट विस्तार की राजनीति?
भारत में पिछले एक दशक के दौरान राष्ट्रवाद राजनीतिक विमर्श का केंद्रीय तत्व बन गया। “नया भारत”, “विश्वगुरु”, “आत्मनिर्भरता”, “वैश्विक नेतृत्व”, “रणनीतिक शक्ति”—ये सभी विचार राष्ट्रीय गौरव की भाषा में प्रस्तुत किए गए। लेकिन इसी दौर में एक और प्रक्रिया समानांतर चलती दिखाई दी— रणनीतिक क्षेत्रों में कुछ चुनिंदा कॉर्पोरेट समूहों का असाधारण विस्तार।
बंदरगाह, एयरपोर्ट, ऊर्जा, रक्षा, डेटा सेंटर, खनन, लॉजिस्टिक्स, अंतरराष्ट्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर—ऐसे लगभग हर क्षेत्र में कुछ सीमित समूहों की उपस्थिति लगातार बढ़ती गई; और यहीं सबसे गंभीर प्रश्न उभरता है— ,"क्या राष्ट्रवाद जनता की सामूहिक शक्ति का विस्तार बन रहा है, या कुछ निजी आर्थिक साम्राज्यों के विस्तार का भावनात्मक कवच?"
## विदेश नीति और कॉर्पोरेट भू-राजनीति
21वीं सदी की विदेश नीति अब केवल राजनयिक वार्ताओं से नहीं चलती। वह आर्थिक गलियारों, निवेश समझौतों, बंदरगाह नियंत्रण, समुद्री मार्गों और ऊर्जा सुरक्षा से संचालित होती है।
इसीलिए जब किसी देश की विदेश नीति के साथ लगातार किसी एक कॉर्पोरेट समूह की परियोजनाएँ जुड़ने लगें, तो स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठते हैं।
केन्या, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, तंज़ानिया, इज़राइल जैसे देशों में भारतीय कूटनीतिक सक्रियता के बाद बड़े कॉर्पोरेट निवेशों का पैटर्न केवल व्यावसायिक घटना नहीं माना जा सकता; वह “कॉर्पोरेट भू-राजनीति” (Corporate Geopolitics) की ओर संकेत करता है।
यहाँ समस्या विदेशी निवेश नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब—
* राष्ट्र की रणनीतिक शक्ति और निजी आर्थिक हितों के बीच दूरी समाप्त होती दिखाई दे,
* और राज्य की संस्थाएँ “राष्ट्रीय हित” और “कॉर्पोरेट हित” के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखने में असफल होने लगें।
## लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट : State-Corporate Fusion
इतिहास बताता है कि लोकतंत्र तब सबसे अधिक कमजोर होता है जब राजनीतिक सत्ता और आर्थिक शक्ति का संलयन (fusion) हो जाता है। ऐसी स्थिति में—
* सरकारें कॉर्पोरेट विस्तार को राष्ट्रीय हित बताने लगती हैं,
* मीडिया आलोचना को राष्ट्र-विरोध की तरह प्रस्तुत करता है,
* और सार्वजनिक संस्थाएँ धीरे-धीरे निष्पक्षता खोने लगती हैं।
यह केवल आर्थिक असमानता पैदा नहीं करता; यह लोकतंत्र के नैतिक ढाँचे को भी प्रभावित करता है। क्योंकि लोकतंत्र का आधार “नागरिक” होता है, जबकि कॉर्पोरेट संरचना का आधार “लाभ” होता है।
दोनों का सहयोग संभव है, लेकिन जब लाभ और राष्ट्रवाद एक-दूसरे की भाषा बोलने लगें, तब लोकतंत्र के भीतर एक खतरनाक असंतुलन पैदा होता है।
## क्या यह केवल भारत में हो रहा है?
नहीं।
अमेरिका में टेक कंपनियों और सत्ता प्रतिष्ठान का संबंध,
चीन में राज्य-समर्थित कॉर्पोरेट विस्तार,
रूस में ऊर्जा-राजनीति गठबंधन,
खाड़ी देशों में शाही सत्ता और निवेश फंड—
ये सभी उदाहरण दिखाते हैं कि 21वीं सदी में राष्ट्र और पूँजी का संबंध अभूतपूर्व रूप से गहरा हो चुका है।
लेकिन भारत का मामला इसलिए विशेष है क्योंकि यहाँ राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि भावनात्मक-सांस्कृतिक शक्ति भी है। जब उसी राष्ट्रवाद का उपयोग कॉर्पोरेट केंद्रीकरण के साथ जुड़ता दिखाई दे, तब लोकतांत्रिक बहस और भी आवश्यक हो जाती है।
## राष्ट्रवाद बनाम कॉर्पोरेटवाद : वास्तविक संघर्ष क्या है?
यह संघर्ष “सरकार बनाम उद्योग” का नहीं है। किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था को मजबूत उद्योगों की आवश्यकता होती है। वास्तविक संघर्ष इस बात का है कि—
* क्या राष्ट्र की संस्थाएँ नागरिकों के प्रति जवाबदेह रहेंगी, या धीरे-धीरे पूँजी के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाएँगी?
* क्या विदेश नीति पूरे समाज के दीर्घकालिक हितों के लिए बनेगी, या कुछ सीमित आर्थिक समूहों की वैश्विक महत्वाकांक्षाओं के लिए?
* क्या राष्ट्रवाद सामाजिक न्याय और आर्थिक भागीदारी का माध्यम बनेगा, या केवल कॉर्पोरेट विस्तार को वैधता देने वाली भावनात्मक भाषा?
## सबसे बड़ा खतरा : लोकतांत्रिक प्रश्नों का अपराधीकरण
जब भी राज्य और कॉर्पोरेट शक्ति का गठबंधन गहरा होता है, तब सबसे पहले आलोचना को संदेह की नज़र से देखा जाने लगता है।
जो प्रश्न पूछे, उसे “विकास विरोधी”, “राष्ट्र-विरोधी” या “नकारात्मक” कहा जाता है। लेकिन लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति प्रश्न पूछने में ही है। यदि नागरिक यह नहीं पूछ सकते कि—
* राष्ट्रीय संसाधनों का लाभ किसे मिल रहा है,
* विदेश नीति से किसका विस्तार हो रहा है,
* और राज्य किसके प्रति अधिक जवाबदेह है,
तो लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया बनकर रह जाता है।
## राष्ट्र किसका है?
21वीं सदी का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न यही है—
* क्या राष्ट्र अभी भी जनता की सामूहिक संप्रभुता का प्रतीक है,
* या वह धीरे-धीरे वैश्विक पूँजी का प्रशासनिक ढाँचा बनता जा रहा है?
भारत जैसे लोकतंत्रों के सामने चुनौती यह नहीं कि वे कॉर्पोरेट शक्ति को समाप्त करें—यह संभव भी नहीं। वास्तविक चुनौती यह है कि वे यह सुनिश्चित करें कि—
* राज्य और कॉर्पोरेट के बीच संस्थागत दूरी बनी रहे,
* सार्वजनिक नीति पारदर्शी हो,
* प्रतिस्पर्धा निष्पक्ष हो,
* और राष्ट्रवाद का अर्थ केवल भावनात्मक नारा नहीं, बल्कि नागरिकों के वास्तविक सामाजिक-आर्थिक अधिकार भी हो।
क्योंकि जिस दिन राष्ट्रवाद पूरी तरह कॉर्पोरेट शक्ति की भाषा बोलने लगेगा, उस दिन लोकतंत्र में नागरिक नहीं, उपभोक्ता बचेंगे— और राष्ट्र, धीरे-धीरे, बाज़ार का एक विस्तारित संस्करण बन जाएगा।
