आज का हिंदुस्तान

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


आज का हिंदुस्तान

धुंधली सुबह, जैसे ख्वाबों की राख,  

सांसें भारी, दिल में एक सिहरन का आघात।  

आँखों में उम्मीदें, मगर घुटन का अहसास,  

हर पल जैसे जूझ रहा है, हर दिल का विश्वास।


ऊँची मीनारें, स्वर्णिम चमक में रंगी,  

पर नींव में घुटती आहें, हर दरार में संगी।  

बंटते हैं शब्द, सुलगते हैं रंग,  

भाई का लहू, क्यों बहा दी जाती है हर एक अंग?


मंदिर की घंटियाँ और मस्जिद की अज़ान,  

एक ही धड़कन में, ये कैसे बढ़े जंग का ध्यान?  

महंगाई का दानव, पंजे फैलाए हर ओर,  

पेट की आग में जलते हर इंसान के विचार, रोष।


युवाओं के हाथों में डिग्रियाँ तो हैं,  

पर राहों में सुलगती आग की चिंगारियाँ हैं।  

नियमों की कड़ाई में फंसा आदमी बेबस,  

अधिकारों की बातें अब बस एक काग़ज़ की तरह हैं खत्म।


सच कहने वालों की आवाज़ दबाई जाती है,  

झूठ के बाजार में हर सच्चाई सज़ा पाई जाती है।  

फिर भी कहीं उम्मीद की रौशनी की छांव,  

किसी कोने में पल रही है इंसानियत का गाँव।


मिट्टी से जन्मी उम्मीद, अब भी फूटेगी कोंपल,  

वो दिन आएगा, जब अंधकार मिटेगा, कोई न होगा अब अकेला।  

मंज़र बदलेगा, बोलेगी फिर ख्वाबों की भाषा,  

आओ, बदलें हम, अपने देश को एक और नया रूप दें।


यह देश हमारा, इसका दर्द भी हमारा,  

हर एक घाव में, हमारी संजीवनी है छुपी।  

मरहम भी हम ही, ख़ुद को फिर से जागो,  

जगाएं सपना, जो कभी टूटा था, फिर से हो सच्चा।


आओ मिलकर चलें, दिल से दिल जोड़ें,  

वो सोने की चिड़ीया, फिर से यहाँ उड़ें।  

हर कदम में बसी हो हमारी इक आवाज़,  

"हम हैं हिंदुस्तानी, और हम हैं हक़ के राह पर परवानों की ताज़।"