नकली दवाओं का अदृश्य साम्राज्य: जब 'जीवनदायिनी' ही 'प्राणघातक' बन जाए
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
नकली दवाओं का अदृश्य साम्राज्य: जब 'जीवनदायिनी' ही 'प्राणघातक' बन जाए
"सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा पर एक संगठित आक्रमण"
भारतीय चिकित्सा तंत्र के हृदय में एक कैंसर पनप रहा है, जिसकी आहटें अक्सर 'नकली दवाएं पकड़ी गईं' जैसी छोटी सुर्खियों में दब जाती हैं। किंतु, यदि गहराई से देखा जाए तो यह केवल एक आपराधिक समाचार नहीं, बल्कि देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा (Public Health Security) के विरुद्ध एक अघोषित युद्ध है। जब एक जीवन रक्षक गोली केवल चाक और रंग का मिश्रण बन जाती है, तो वह केवल धोखाधड़ी नहीं, बल्कि एक 'मौन हत्या' (Silent Killing) की साजिश है।
1. निगरानी का संकट: 'फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड' की साख दांव पर
भारत विश्व स्तर पर जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा प्रदाता है, लेकिन यह वैश्विक प्रतिष्ठा एक दोधारी तलवार है।
* नियामक विफलता: यदि देश के भीतर ही एक समानांतर और संगठित नकली दवा उद्योग पनप रहा है, तो यह हमारे राज्य और केंद्रीय दवा नियंत्रण तंत्र (CDSCO) की प्रभावशीलता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।
* समन्वय का अभाव: कानून कागजों पर कठोर हैं, लेकिन जमीन पर प्रवर्तन एजेंसियों के बीच तालमेल की कमी अपराधियों को 'सिस्टम की दरारों' में छिपने की जगह देती है।
2. एक 'औद्योगिक' अपराध: संगठित सिंडिकेट का उदय
नकली दवाओं का निर्माण अब किसी अंधेरी गली का काम नहीं रहा। यह एक सुव्यवस्थित 'समानांतर औद्योगिक तंत्र' बन चुका है। इसके लिए आवश्यक है:
* परिष्कृत तकनीक: ब्रांडों की हूबहू नकल और परिष्कृत पैकेजिंग।
* वितरण नेटवर्क: थोक मंडियों से लेकर सुदूर ग्रामीण दवाखानों तक फैली एक अदृश्य कलाई।
यह सब बिना किसी उच्च-स्तरीय प्रशासनिक मिलीभगत या तकनीकी विशेषज्ञता के संभव नहीं है। यह अपराध अब 'फाइनेंशियल फ्रॉड' से कहीं अधिक घातक है।
3. सामाजिक विश्वास का विखंडन: सबसे बड़ी क्षति
एक मरीज और डॉक्टर के बीच का संबंध 'विश्वास' की धुरी पर टिका होता है।
* चिकित्सा तंत्र पर आघात: जब दवा ही संदेहास्पद हो जाए, तो उपचार की पूरी प्रक्रिया विफल हो जाती है। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति जनता में एक गहरी हताशा और अविश्वास पैदा करता है, जो किसी भी महामारी से अधिक खतरनाक है।
* आर्थिक दोहन: गरीब नागरिक अपनी जीवन भर की कमाई उन गोलियों पर खर्च कर देता है जो उसे स्वस्थ करने के बजाय उसकी मृत्यु को और समीप ले आती हैं।
4. जवाबदेही का अभाव: जब दंड विरल हो जाए
विडंबना यह है कि हर बड़ी जब्ती के बाद कार्रवाई का एक नाटक होता है, लेकिन ठोस परिणाम शून्य रहते हैं।
* दोषसिद्धि की दर: कितने मामलों में अपराधियों को कठोरतम सजा मिली? कितने लाइसेंस स्थायी रूप से निरस्त हुए?
* प्रशासनिक जवाबदेही: उन अधिकारियों की जांच क्यों नहीं होती जिनके क्षेत्राधिकार में ये अवैध फैक्ट्रियां वर्षों तक चलती रहती हैं? यदि दंड का भय समाप्त हो जाए, तो अपराध का 'प्रॉफिट मार्जिन' नैतिकता को निगल जाता है।
5. समाधान: तकनीक और पारदर्शिता का एकीकरण
छापेमारी केवल तात्कालिक उपचार है; स्थायी समाधान प्रणालीगत सुधार में है:
* ब्लॉकचेन और ट्रैक-एंड-ट्रेस: हर दवा की पट्टी पर एक ऐसा यूनिक कोड होना चाहिए जिसे मरीज स्कैन करके उसकी प्रामाणिकता (Batch and Origin) तुरंत जांच सके।
* डिजिटल वेरिफिकेशन: निर्माण से लेकर वितरण तक की हर कड़ी का डिजिटल ऑडिट अनिवार्य हो।
* फास्ट-ट्रैक न्याय: नकली दवाओं से संबंधित मामलों के लिए विशेष न्यायालयों का गठन हो, जहाँ सजा का प्रावधान 'हत्या' के समतुल्य हो।
## यह राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न है
नकली दवाएं केवल एक 'कानून और व्यवस्था' का मुद्दा नहीं हैं; यह राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय है। यदि हम अपनी दवाओं की प्रामाणिकता सुनिश्चित नहीं कर सकते, तो 'स्वस्थ भारत' और 'विकसित भारत' के सारे दावे खोखले हैं।
अब समय आ गया है कि इस मुद्दे को ड्राइंग रूम की चर्चाओं से निकालकर संसद के पटल पर एक 'आपातकालीन राष्ट्रीय संकट' के रूप में संबोधित किया जाए। चुप्पी का अर्थ है—अपराधियों के साथ मूक सहमति।
