‘सैंया भए कोतवाल’ का दौर?—बाज़ार, सत्ता और लोकतंत्र के बीच संतुलन का संकट

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला


‘सैंया भए कोतवाल’ का दौर?—बाज़ार, सत्ता और लोकतंत्र के बीच संतुलन का संकट

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत केवल उसकी चुनावी प्रक्रिया नहीं, बल्कि उसके संस्थानों और बाज़ार व्यवस्था की निष्पक्षता है। जब यह धारणा कमजोर पड़ने लगती है कि नियम सबके लिए समान हैं, तब संकट केवल अर्थव्यवस्था का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास का बन जाता है। हाल के घटनाक्रमों और आरोप-प्रत्यारोपों के बीच अनिल अग्रवाल जैसे बड़े उद्योगपति की सार्वजनिक नाराज़गी इसी गहरे असंतोष का संकेत देती है—जहाँ सवाल एक डील से आगे बढ़कर ‘सिस्टम की विश्वसनीयता’ तक जा पहुंचता है।

## नीलामी की प्रक्रिया: पारदर्शिता या पूर्व-निर्धारित परिणाम?

आर्थिक सुधारों के बाद भारत ने जिस ‘प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी’ (competitive bidding) मॉडल को अपनाया, उसका मूल उद्देश्य था—राज्य और निजी क्षेत्र के बीच एक निष्पक्ष, पारदर्शी और नियम-आधारित संबंध स्थापित करना। किंतु जब किसी नीलामी प्रक्रिया पर ही प्रश्नचिह्न खड़े होने लगें, तो यह संकेत केवल एक विवाद का नहीं, बल्कि व्यापक प्रणालीगत चिंता का होता है।


यदि यह धारणा बनती है कि ‘उच्चतम बोली’ भी अंतिम निर्णय का आधार नहीं है, तो यह बाजार के मूल सिद्धांत—विश्वास (trust)—को चोट पहुँचाता है। निवेशक केवल लाभ की संभावना से नहीं, बल्कि नियमों की स्थिरता और पूर्वानुमेयता से आकर्षित होते हैं। नियमों की अनिश्चितता, निवेश के माहौल को अस्थिर करती है।


## कॉरपोरेट एकाग्रता और प्रतिस्पर्धा का प्रश्न


भारत की अर्थव्यवस्था में कुछ बड़े समूहों का तेज़ी से विस्तार कोई नई घटना नहीं है। परंतु जब यह विस्तार कई रणनीतिक क्षेत्रों—जैसे ऊर्जा, अवसंरचना, बंदरगाह, हवाई अड्डे—में एक साथ दिखाई देता है, तो स्वाभाविक रूप से प्रतिस्पर्धा (competition) और एकाधिकार (monopoly) को लेकर बहस तेज़ हो जाती है।


गौतम अदाणी के नेतृत्व में विकसित समूह की तीव्र वृद्धि ने इस बहस को और धार दी है। यह वृद्धि अपने आप में गलत नहीं है—किसी भी अर्थव्यवस्था में बड़े कॉरपोरेट समूह विकास के इंजन होते हैं। किंतु प्रश्न तब उठता है, जब बाजार में अवसरों का वितरण संतुलित और पारदर्शी प्रतीत न हो।


लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्था का मूल सिद्धांत यही है कि सफलता प्रतिस्पर्धा के आधार पर तय हो, न कि ‘निकटता’ (proximity) के आधार पर। यदि यह संतुलन बिगड़ता है, तो बाजार धीरे-धीरे ‘ओपन सिस्टम’ से ‘क्लोज्ड नेटवर्क’ में परिवर्तित हो सकता है।


## नीति, नैतिकता और ‘धर्म’ का विमर्श


भारतीय राजनीतिक संस्कृति में ‘धर्म’ केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि नैतिक कर्तव्य और वचनबद्धता का प्रतीक रहा है। शासन-प्रणाली में ‘धर्म’ का अर्थ है—नियमों का पालन, पारदर्शिता और निष्पक्षता।


जब नीतिगत निर्णयों पर ही संदेह उत्पन्न होने लगे, तो यह केवल आर्थिक प्रश्न नहीं रहता, बल्कि नैतिक प्रश्न बन जाता है। क्या राज्य अपने ही बनाए नियमों के प्रति प्रतिबद्ध है? क्या संस्थागत प्रक्रियाएं व्यक्ति-विशेष से ऊपर हैं?


इन प्रश्नों के उत्तर ही लोकतंत्र की गुणवत्ता को निर्धारित करते हैं।


## Ease of Doing Business या Ease of Selective Doing Business?


भारत ने वैश्विक मंचों पर ‘Ease of Doing Business’ के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति का दावा किया है। किंतु इस सूचकांक का वास्तविक अर्थ केवल प्रक्रियाओं के सरलीकरण तक सीमित नहीं है; इसमें ‘न्यायसंगत प्रतिस्पर्धा’ और ‘नियमों की निष्पक्षता’ भी शामिल है।


यदि बड़े उद्योगपति भी सार्वजनिक रूप से न्याय और उचित मंच की बात करने लगें, तो यह संकेत है कि प्रणाली के भीतर कहीं न कहीं असंतुलन की अनुभूति है। छोटे और मध्यम उद्यमियों के लिए यह संदेश और भी चिंताजनक हो सकता है—क्योंकि उनके पास संसाधन और प्रभाव, दोनों सीमित होते हैं।


## लोकतंत्र, बाज़ार और संस्थानों का त्रिकोण


किसी भी आधुनिक राष्ट्र-राज्य की स्थिरता तीन स्तंभों पर टिकी होती है—लोकतंत्र, बाज़ार और संस्थान। यदि इनमें से किसी एक में भी असंतुलन उत्पन्न होता है, तो उसका प्रभाव अन्य दो पर भी पड़ता है।


* यदि बाज़ार निष्पक्ष नहीं दिखता, तो निवेश और नवाचार प्रभावित होते हैं।

* यदि संस्थानों की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठते हैं, तो लोकतांत्रिक विश्वास कमजोर होता है।

* और यदि लोकतंत्र कमजोर होता है, तो नीति-निर्माण में पारदर्शिता घटती है।

इसलिए यह बहस केवल ‘कौन सही है’ या ‘कौन गलत’ का नहीं, बल्कि उस व्यापक संतुलन का है, जो भारत की विकास यात्रा को टिकाऊ बनाता है।

## विमर्श की आवश्यकता, निष्कर्ष की नहीं

वर्तमान परिस्थितियाँ हमें किसी त्वरित निष्कर्ष पर पहुँचने के बजाय एक गंभीर, तथ्यों पर आधारित और संस्थागत विमर्श की ओर ले जानी चाहिए। आरोप और प्रत्यारोप लोकतंत्र का हिस्सा हैं, परंतु उनका समाधान केवल पारदर्शी जांच, स्पष्ट नीति और संस्थागत जवाबदेही से ही संभव है।

भारत जैसे उभरते हुए वैश्विक शक्ति-केन्द्र के लिए यह आवश्यक है कि वह अपनी आर्थिक नीतियों को केवल विकास दर के आंकड़ों से नहीं, बल्कि ‘न्यायसंगत अवसर’ और ‘विश्वसनीय संस्थानों’ के आधार पर भी परखे।

क्योंकि अंततः कोई भी राष्ट्र केवल पूंजी से नहीं, बल्कि विश्वास से चलता है—और यदि यह विश्वास कमजोर पड़ता है, तो सबसे बड़ी कीमत वही राष्ट्र चुकाता है, जिसकी अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र दोनों उस पर निर्भर करते हैं।