TET की अनिवार्यता और पूर्व नियुक्त शिक्षक: नियमों का न्याय या न्याय पर नियम?

 लखनऊ डेस्क प्रदीप shukla 


TET की अनिवार्यता और पूर्व नियुक्त शिक्षक: नियमों का न्याय या न्याय पर नियम?

शिक्षा सुधार के नाम पर नीतियाँ बनाना सरल है; उन्हें न्यायपूर्ण बनाना कठिन। Teacher Eligibility Test (TET) का उद्देश्य यदि शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करना है, तो यह लक्ष्य निस्संदेह स्वागतयोग्य है। परंतु जब यही परीक्षा उन शिक्षकों पर अनिवार्य कर दी जाती है जो TET के प्रावधान से पूर्व विधिसम्मत ढंग से नियुक्त हुए थे, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है — "क्या सुधार का मार्ग न्याय को दरकिनार कर तय किया जा सकता है?"

यह विवाद केवल परीक्षा का नहीं, बल्कि राज्य की नीतिगत नैतिकता का है।


## वैध नियुक्ति का सिद्धांत: राज्य की विश्वसनीयता का आधार


किसी भी विधि-शासित व्यवस्था में एक मौलिक सिद्धांत होता है: "जो नियुक्ति उस समय के नियमों के अनुरूप वैध थी, उसे बाद में नियम बदलकर संदिग्ध नहीं बनाया जा सकता।"


पूर्व नियुक्त शिक्षक:


✔ उस समय के पात्रता मानकों पर खरे उतरे

✔ विधिक प्रक्रिया से नियुक्त हुए

✔ वर्षों से सेवा दे रहे हैं


ऐसे में बाद में एक नई परीक्षा को अनिवार्य कर देना वस्तुतः यह संकेत देता है कि: "राज्य अपने ही पूर्व निर्णयों पर अविश्वास जता रहा है।"


यदि राज्य की नीतियाँ स्थिर न रहें, तो नागरिकों का विश्वास किस आधार पर टिके?


## अनुभव बनाम परीक्षा: वास्तविक दक्षता का प्रश्न


शिक्षण कोई यांत्रिक कार्य नहीं है। यह केवल विषय ज्ञान का प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक जीवंत सामाजिक-मानसिक प्रक्रिया है।


दीर्घकालिक शिक्षक अनुभव का अर्थ है:


✔ कक्षा प्रबंधन की दक्षता

✔ छात्र मनोविज्ञान की व्यवहारिक समझ

✔ स्थानीय सामाजिक संदर्भों का ज्ञान

✔ वास्तविक शिक्षण कौशल


एक लिखित परीक्षा इन बहुआयामी दक्षताओं को किस सीमा तक माप सकती है?


यदि 15–20 वर्षों से पढ़ा रहा शिक्षक अचानक एक सैद्धांतिक परीक्षा में असफल हो जाए, तो क्या उसका पूरा व्यावसायिक जीवन अमान्य हो जाता है?


## नीति का अंतर्विरोध: सुधार या प्रशासनिक औपचारिकता?


यहाँ एक असहज प्रश्न उभरता है: "क्या TET पूर्व नियुक्त शिक्षकों पर लागू करना वास्तव में गुणवत्ता सुधार है, या केवल औपचारिक मानकीकरण?"


यदि शिक्षक वर्षों से सेवा दे रहा है, छात्र परिणाम दे रहा है, संस्थागत जिम्मेदारियाँ निभा रहा है — तो 


* उसकी दक्षता का मूल्यांकन केवल एक परीक्षा पर क्यों निर्भर करे?

* क्या नीति अनुभव को शून्य मान रही है?


## न्याय का तत्व: समानता नहीं, युक्तिसंगतता


समानता का सिद्धांत यह नहीं कहता कि सबके साथ एक जैसा व्यवहार हो; वह कहता है कि युक्तिसंगत भेद (reasonable classification) स्वीकार्य है।


नए अभ्यर्थी और पूर्व नियुक्त शिक्षक एक ही श्रेणी में नहीं आते:


* एक → रोजगार पाने का प्रयास कर रहा है

* दूसरा → वैध रूप से वर्षों से सेवा दे रहा है


दोनों पर समान परीक्षा अनिवार्य करना सतही समानता तो हो सकती है, पर न्यायसंगत समानता नहीं।


## व्यावहारिक वास्तविकता: सुधार का मनोवैज्ञानिक प्रभाव


नीतियाँ केवल कागज़ पर नहीं, मनुष्यों पर लागू होती हैं।


पूर्व नियुक्त शिक्षकों पर परीक्षा का दबाव:


❗ पेशेवर असुरक्षा

❗ मानसिक तनाव

❗ सेवा-गरिमा पर प्रश्न

❗ अनुभव के अवमूल्यन की भावना


क्या शिक्षा सुधार का लक्ष्य शिक्षक समुदाय में अस्थिरता पैदा करना होना चाहिए? शिक्षा प्रणाली की गुणवत्ता का एक बड़ा स्तंभ है — शिक्षक का मनोबल।


## विकल्प मौजूद हैं — कठोरता ही एकमात्र रास्ता नहीं


यदि लक्ष्य वास्तविक गुणवत्ता सुधार है, तो अधिक न्यायसंगत उपाय उपलब्ध हैं:


✅ 1. अनुभव आधारित छूट


दीर्घकालिक सफल सेवा → TET से छूट / आंशिक छूट


✅ 2. ब्रिज ट्रेनिंग + मूल्यांकन


पूर्ण परीक्षा के स्थान पर प्रशिक्षण आधारित प्रमाणन


✅ 3. प्रदर्शन आधारित मूल्यांकन


* कक्षा अवलोकन

* छात्र सीखने के परिणाम

* अकादमिक ऑडिट


✅ 4. स्वैच्छिक उन्नयन मॉडल


दंडात्मक अनिवार्यता के बजाय प्रोत्साहन आधारित अनुपालन


## राज्य की भूमिका: नियामक नहीं, संरक्षक


शिक्षक केवल कर्मचारी नहीं, सार्वजनिक ज्ञान संरचना के निर्माता होते हैं। उनकी सेवा-वैधता और गरिमा की रक्षा राज्य का नैतिक दायित्व है। सुधार का अर्थ यह नहीं कि:


✔ पुराने को संदिग्ध बनाया जाए

✔ अनुभव को गौण कर दिया जाए

✔ नियमों को न्याय से ऊपर रखा जाए


## सुधार की वैधता का आधार


शिक्षा सुधार आवश्यक हैं। न्यूनतम मानक आवश्यक हैं,परंतु सुधार तभी टिकाऊ होते हैं जब वे न्यायपूर्ण हों। पूर्व नियुक्त शिक्षकों पर TET की अनिवार्यता यह संदेश देती है कि: "राज्य अपने ही अतीत से असहज है और समाधान के रूप में परीक्षा को चुन रहा है।"


एक परिपक्व नीति दृष्टिकोण यह स्वीकार करता है:


✔ अनुभव भी योग्यता है

✔ वैध नियुक्ति भी अधिकार है

✔ न्याय भी सुधार का अनिवार्य तत्व है


अन्यथा सुधार, सुधार नहीं — प्रशासनिक कठोरता का पर्याय बन जाते हैं, और शिक्षा व्यवस्था का भविष्य कठोरता से नहीं, विश्वास, न्याय और विवेकपूर्ण संतुलन से निर्मित होता है।