अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस विशेष
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस विशेष
बिखरती भाषाई विरासत — विकास, बाज़ार और पहचान के बीच संरक्षण की नई बहस
भाषा मनुष्य की सबसे सूक्ष्म, सबसे गहन और सबसे दीर्घजीवी सामाजिक रचना है। यह केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि अनुभवों का तंत्र, स्मृतियों का भंडार और पहचान का अदृश्य ढांचा है। किसी समाज को समझने के लिए उसकी भाषा को समझना आवश्यक होता है, क्योंकि भाषा में ही वह दृष्टि छिपी होती है जिससे समुदाय संसार को देखता, परिभाषित करता और अर्थ देता है। भारत जैसे बहुभाषी देश में भाषा का महत्व और भी व्यापक हो जाता है, जहाँ विविधता केवल एक सांस्कृतिक तथ्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संरचना का आधार है। किंतु विडंबना यह है कि जिस भाषाई बहुलता पर हम गर्व करते हैं, वही आज अस्तित्वगत संकट का सामना कर रही है।
विकास, शहरीकरण और वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में भाषाओं का क्षरण एक मौन सामाजिक परिवर्तन के रूप में उभर रहा है। यह प्रक्रिया न तो अचानक दिखाई देती है, न ही हमेशा सुर्खियाँ बनाती है, किंतु इसके परिणाम दूरगामी होते हैं। जब कोई भाषा लुप्त होती है, तब केवल संवाद का माध्यम नहीं खोता—उसके साथ स्थानीय ज्ञान प्रणालियाँ, लोककथाएँ, पर्यावरणीय अनुभव, सांस्कृतिक प्रतीक, यहां तक कि जीवन-दर्शन के विशिष्ट ढांचे भी विलुप्त हो जाते हैं। भाषा का अंत दरअसल एक संसार का अंत होता है।
भारत की भाषाई परंपरा ऐतिहासिक रूप से असाधारण रही है। सदियों से यहाँ भाषाएँ केवल सह-अस्तित्व में नहीं रहीं, बल्कि परस्पर प्रभाव, आदान-प्रदान और विकास के माध्यम से जीवंत बनी रहीं। बोलियाँ, उपभाषाएँ और जनजातीय भाषाएँ सामाजिक ताने-बाने में सहज रूप से समाहित थीं। परंतु आधुनिक राज्य व्यवस्था, केंद्रीकृत शिक्षा प्रणाली और बाज़ार-प्रेरित सामाजिक संरचनाओं ने भाषाई व्यवहार को नई दिशा दी है। भाषा अब केवल सांस्कृतिक पहचान नहीं, बल्कि आर्थिक अवसरों, सामाजिक प्रतिष्ठा और संस्थागत शक्ति से भी जुड़ गई है।
यही वह बिंदु है जहाँ संकट की जड़ें दिखाई देती हैं। किसी भाषा का अस्तित्व अंततः उसके उपयोग पर निर्भर करता है। यदि भाषा घर, विद्यालय, बाज़ार और प्रशासन में प्रयोग से बाहर होने लगे, तो उसका भविष्य स्वाभाविक रूप से अनिश्चित हो जाता है। आज यह स्थिति अनेक भारतीय भाषाओं और बोलियों के साथ देखी जा रही है। युवा पीढ़ी, जो स्वाभाविक रूप से सामाजिक गतिशीलता और अवसरों की ओर उन्मुख होती है, अधिक प्रचलित भाषाओं को अपनाने लगती है। परिणामस्वरूप, मातृभाषाएँ भावनात्मक स्मृति तक सीमित रह जाती हैं और पीढ़ियों के बीच भाषाई हस्तांतरण टूटने लगता है।
भाषाओं के विलुप्त होने का यह संकट केवल भारत तक सीमित नहीं है। वैश्विक स्तर पर भी यूनेस्को और अन्य संस्थाएँ लगातार चेतावनी देती रही हैं कि विश्व की हजारों भाषाएँ जोखिम में हैं। तकनीकी विस्तार, प्रवासन, सांस्कृतिक एकरूपता और डिजिटल माध्यमों की भाषा-सीमाएँ इस प्रवृत्ति को तेज कर रही हैं। आधुनिक अर्थव्यवस्था दक्षता, एकरूपता और वैश्विक संवाद की माँग करती है, जो स्वाभाविक रूप से कुछ प्रमुख भाषाओं को बढ़त देती है। परंतु यह दक्षता अक्सर विविधता के ह्रास की कीमत पर आती है।
भारत में यह बहस और जटिल है, क्योंकि यहाँ भाषाई प्रश्न सीधे सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक अधिकार और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व से जुड़ता है। संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त भाषाएँ संस्थागत संरक्षण का लाभ उठाती हैं—शिक्षा, प्रशासन, मीडिया और साहित्य में उन्हें स्थान मिलता है। शास्त्रीय भाषा का दर्जा ऐतिहासिक गौरव और अकादमिक समर्थन प्रदान करता है। किंतु जिन भाषाओं को औपचारिक मान्यता नहीं मिली, वे अक्सर हाशिये पर चली जाती हैं। यह असमानता केवल नीति की सीमा नहीं, बल्कि भाषाई पारिस्थितिकी के असंतुलन का संकेत है।
भाषा संरक्षण की चुनौती का एक महत्वपूर्ण पहलू शिक्षा प्रणाली से जुड़ा है। अनुसंधान यह दर्शाते हैं कि बच्चे अपनी मातृभाषा में बेहतर सीखते हैं, क्योंकि भाषा केवल सूचना ग्रहण का माध्यम नहीं, बल्कि संज्ञानात्मक संरचना का आधार होती है। जब प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में होती है, तब समझ, आत्मविश्वास और बौद्धिक विकास अधिक सुदृढ़ होता है। इसके विपरीत, यदि शिक्षा पूरी तरह बाहरी भाषा में हो, तो सीखने की प्रक्रिया में दूरी और असुरक्षा की भावना उत्पन्न हो सकती है। बहुभाषी शिक्षा इसलिए केवल सांस्कृतिक संरक्षण नहीं, बल्कि शैक्षिक दक्षता का भी प्रश्न है।
डिजिटल युग ने भाषाओं के सामने नई संभावनाएँ और नई चुनौतियाँ दोनों प्रस्तुत की हैं। इंटरनेट और तकनीक ने वैश्विक संवाद को सहज बनाया, किंतु साथ ही भाषाई केंद्रीकरण को भी बढ़ावा दिया। अधिकांश डिजिटल सामग्री कुछ सीमित भाषाओं में उपलब्ध है। जिन भाषाओं की डिजिटल उपस्थिति कम है, वे आधुनिक संवाद से कटती जाती हैं। दूसरी ओर, तकनीक—विशेषकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता—भाषा संरक्षण का सशक्त उपकरण भी बन सकती है। डिजिटल अभिलेखीकरण, स्वचालित अनुवाद, भाषाई संसाधनों का निर्माण और लोक-साहित्य का संरक्षण अब पहले से अधिक संभव है। प्रश्न यह है कि क्या इन तकनीकी अवसरों का उपयोग भाषाई विविधता के संरक्षण हेतु व्यवस्थित रूप से किया जा रहा है?
भाषा का प्रश्न अंततः आर्थिक और सामाजिक संरचनाओं से भी जुड़ता है। भाषाएँ तभी जीवित रहती हैं जब वे सामाजिक उपयोगिता और प्रतिष्ठा से जुड़ी हों। यदि किसी भाषा में रोजगार, प्रशासन, साहित्य, मीडिया या तकनीक के अवसर न हों, तो उसका सामाजिक मूल्य घटने लगता है। संरक्षण का अर्थ केवल सांस्कृतिक स्मारक बनाना नहीं, बल्कि भाषा को जीवंत उपयोग में बनाए रखना है। भाषा को आधुनिक जीवन से जोड़ना—चाहे वह शिक्षा, डिजिटल माध्यम, रचनात्मक उद्योग या स्थानीय प्रशासन के माध्यम से हो—संरक्षण की वास्तविक रणनीति है
भाषाई संरक्षण की चर्चा में भावनात्मक पक्ष महत्वपूर्ण है, किंतु पर्याप्त नहीं। भाषा को केवल विरासत मानकर संरक्षित नहीं किया जा सकता; उसे वर्तमान और भविष्य में प्रासंगिक बनाना होगा। यह कार्य केवल सरकारों का दायित्व नहीं, बल्कि समाज, समुदायों, शिक्षण संस्थानों और तकनीकी जगत का साझा प्रयास है। स्थानीय समुदायों की भागीदारी विशेष रूप से आवश्यक है, क्योंकि भाषा का वास्तविक जीवन समुदाय के भीतर ही होता है।👇🏻
भारत की भाषाई शक्ति उसकी विविधता में निहित है। यह विविधता केवल सांस्कृतिक सजावट नहीं, बल्कि बौद्धिक संपदा और सामाजिक ऊर्जा का स्रोत है। भाषाएँ विभिन्न दृष्टियों, अनुभवों और ज्ञान प्रणालियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। यदि यह विविधता क्षीण होती है, तो राष्ट्र की सांस्कृतिक गहराई और बौद्धिक समृद्धि दोनों प्रभावित होती हैं
विकास और वैश्वीकरण अपरिहार्य हैं, परंतु उनके साथ संतुलन की आवश्यकता भी उतनी ही अनिवार्य है। भाषाई संरक्षण कोई अतीत-प्रेमी परियोजना नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्थिरता, सामाजिक समावेशन और बौद्धिक विविधता की दीर्घकालिक रणनीति है। यह स्मरण रखना होगा कि भाषा का प्रश्न अंततः मनुष्य की पहचान, गरिमा और अस्तित्व से जुड़ा है।
यदि भाषाएँ मौन होती चली गईं, तो विविधता का वह संगीत, जिसने भारतीय सभ्यता को अद्वितीय बनाया, धीरे-धीरे एकरूपता की नीरवता में विलीन हो जाएगा। संरक्षण इसलिए केवल सांस्कृतिक दायित्व नहीं—यह भविष्य के भारत की आत्मा को सुरक्षित रखने का प्रश्न है।
