टैरिफ़, ट्रंप और न्यायपालिका — शक्ति-संतुलन की कसौटी पर अमेरिकी लोकतंत्र

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


टैरिफ़, ट्रंप और न्यायपालिका — शक्ति-संतुलन की कसौटी पर अमेरिकी लोकतंत्र

अमेरिकी राजनीति में कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच तनाव कोई असामान्य घटना नहीं है, किंतु जब यह टकराव व्यापार नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रपति की वैध शक्तियों जैसे संवेदनशील प्रश्नों से जुड़ जाए, तब उसका प्रभाव व्यापक हो जाता है। आयात-शुल्क (टैरिफ़) को लेकर उभरे विवाद में यही परिदृश्य दिखाई देता है—जहाँ आर्थिक राष्ट्रवाद और संवैधानिक सीमाओं के बीच संतुलन की परीक्षा हुई।

ट्रंप प्रशासन की “America First” नीति का केंद्रीय तर्क यह था कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था ने अमेरिकी उद्योगों को क्षति पहुँचाई है। इसी आधार पर चीन, यूरोपीय संघ और अन्य देशों पर विभिन्न कानूनी प्रावधानों—Trade Expansion Act (Section 232), Trade Act (Section 301) और IEEPA—के अंतर्गत टैरिफ़ लगाए गए। इन कानूनों ने राष्ट्रपति को राष्ट्रीय सुरक्षा या अनुचित व्यापारिक प्रथाओं के संदर्भ में पर्याप्त विवेकाधिकार प्रदान किया। परंतु यहीं से एक बुनियादी संवैधानिक प्रश्न उभरा: क्या यह विवेकाधिकार असीमित है?

जब व्यापारिक संस्थाओं, उद्योग समूहों और कुछ राज्यों ने इन नीतियों को अदालतों में चुनौती दी, तो न्यायपालिका के सामने केवल आर्थिक प्रभाव का नहीं, बल्कि विधिक औचित्य का परीक्षण था। अमेरिकी संविधान की संरचना—Checks and Balances—यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी शाखा निरंकुश न हो। न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) इसी व्यवस्था का उपकरण है, जिसके माध्यम से न्यायालय यह जाँचते हैं कि कार्यपालिका ने कांग्रेस द्वारा प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग संविधान की भावना के अनुरूप किया है या नहीं।

यहाँ न्यायिक स्वतंत्रता का सिद्धांत निर्णायक बनता है। राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त न्यायाधीश—Neil Gorsuch, Brett Kavanaugh और Amy Coney Barrett—रूढ़िवादी वैचारिक पृष्ठभूमि से आते हैं, किंतु उनकी भूमिका नीतिगत निष्ठा की नहीं, बल्कि विधिक व्याख्या की है। कुछ मामलों में न्यायाधीशों द्वारा उठाए गए प्रश्न—राष्ट्रीय सुरक्षा की परिभाषा का दायरा, Non-Delegation Doctrine की सीमाएँ, तथा Due Process का पालन—यह संकेत देते हैं कि न्यायालय कार्यपालिका के तर्कों को स्वतः स्वीकार करने के बजाय संवैधानिक कसौटी पर परखते हैं।

निर्णयों के बाद ट्रंप की तीखी सार्वजनिक प्रतिक्रिया ने बहस को और तीखा कर दिया। न्यायपालिका की आलोचना, विशेषकर व्यक्तिगत टिप्पणियों के रूप में, लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा अवश्य है, परंतु यह संस्थागत मर्यादा की सीमा से जुड़ा विषय भी है। अमेरिकी लोकतंत्र में न्यायपालिका की वैधता इसी विश्वास पर आधारित है कि न्यायाधीश राजनीतिक दबाव से परे रहकर निर्णय लेते हैं।


इस प्रकरण का एक महत्वपूर्ण पहलू शक्ति-विभाजन का सिद्धांत है। व्यापार नीति संविधानतः कांग्रेस के अधिकार-क्षेत्र में आती है, किंतु व्यवहार में कांग्रेस ने कई दशकों में कार्यपालिका को व्यापक प्रत्यायोजन (Delegation) दिया है। यदि न्यायालय इस प्रत्यायोजन को अत्यधिक मानें, तो Non-Delegation Doctrine को नया जीवन मिल सकता है—जो विधायिका को अधिक स्पष्ट दिशानिर्देश देने के लिए बाध्य करेगा। यह बहस केवल ट्रंप काल तक सीमित नहीं, बल्कि भविष्य की प्रशासनिक शक्तियों के स्वरूप से भी जुड़ी है।


राजनीतिक स्तर पर टैरिफ़ नीति मतदाता आधार, औद्योगिक हितों और वैश्विक कूटनीति से जुड़ी रही। न्यायालय का हस्तक्षेप स्वाभाविक रूप से राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करता है, किंतु संस्थागत दृष्टि से यही हस्तक्षेप लोकतांत्रिक संतुलन का प्रमाण भी है। इतिहास में अनेक उदाहरण हैं जहाँ राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त न्यायाधीश अपेक्षाओं से भिन्न निर्णय देते रहे हैं—जो न्यायिक स्वतंत्रता की परिपक्वता को रेखांकित करता है।


वैश्विक संदर्भ में देखें तो व्यापार और न्यायिक समीक्षा का संबंध अन्य लोकतंत्रों में भी जटिल है। यूरोपीय संघ में व्यापारिक प्रतिबंधों पर न्यायिक परीक्षण सामान्य है, जबकि भारत में न्यायपालिका आर्थिक नीतियों में सीमित हस्तक्षेप के सिद्धांत का पालन करती है, परंतु संवैधानिक वैधता पर अंतिम शब्द रखती है। इस दृष्टि से अमेरिकी अनुभव एक व्यापक लोकतांत्रिक प्रवृत्ति का हिस्सा है।


अंततः, टैरिफ़ विवाद यह स्मरण कराता है कि संवैधानिक शासन में व्यक्ति या पद नहीं, बल्कि विधि सर्वोच्च होती है। राष्ट्रपति की शक्तियाँ व्यापक हो सकती हैं, परंतु वे न्यायिक समीक्षा से परे नहीं। न्यायाधीशों की नियुक्ति राजनीतिक प्रक्रिया का परिणाम है, परंतु उनका निर्णय विधिक विवेक का। यही द्वंद्व—और यही संतुलन—लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी है।