प्रतिपक्ष की असहज आवाज़ और लोकतंत्र की बेचैनी
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
प्रतिपक्ष की असहज आवाज़ और लोकतंत्र की बेचैनी
लोकतंत्र का वास्तविक सौंदर्य सत्ता की स्थिरता में नहीं, असहमति की निर्भीकता में निहित होता है। संसद केवल कानून निर्माण का मंच नहीं, बल्कि सत्ता की निरंतर सार्वजनिक परीक्षा का स्थल है। यही वह स्थान है जहाँ प्रश्नों का स्वर जितना तीखा होता है, लोकतंत्र उतना ही जीवंत दिखाई देता है।
हाल के संसदीय घटनाक्रमों ने एक असुविधाजनक प्रश्न को जन्म दिया है — क्या हम असहमति से संवाद कर रहे हैं, या उससे व्यवस्थित असहजता अनुभव कर रहे हैं?
राहुल गांधी की संसदीय सक्रियता, उनके भाषणों की आक्रामकता, और सत्ता पक्ष की प्रतिक्रियाओं ने एक व्यापक विमर्श को जन्म दिया है। सत्ता के लिए विपक्ष का मुखर होना स्वाभाविक रूप से चुनौतीपूर्ण होता है; परंतु लोकतंत्र में चुनौती को संकट के रूप में देखना संस्थागत संतुलन के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता।
## बहुमत और वैधता का अंतर
संसदीय लोकतंत्र में बहुमत शासन की शक्ति प्रदान करता है, किंतु लोकतांत्रिक वैधता केवल संख्यात्मक प्रभुत्व से निर्मित नहीं होती। वैधता उस नैतिक धैर्य से उत्पन्न होती है, जिसके माध्यम से सत्ता आलोचना, व्यंग्य और असहज प्रश्नों को स्वीकार करती है।
यदि प्रक्रियात्मक औज़ार — विशेष मोशन, अनुशासनात्मक प्रावधान, या आचार-विवाद — राजनीतिक संघर्ष के प्रमुख उपकरण बनते प्रतीत हों, तो लोकतांत्रिक मानस में स्वाभाविक रूप से संदेह उभरता है।
## प्रश्नों से अधिक प्रश्नकर्ता?
लोकतंत्र का मूलभूत सिद्धांत यह है कि सत्ता से प्रश्न पूछना अवमानना नहीं, संवैधानिक आवश्यकता है। किंतु जब राजनीतिक विमर्श में प्रश्नों से अधिक प्रश्नकर्ता केंद्र में आ जाए, तब संस्थागत विमर्श की दिशा पर पुनर्विचार आवश्यक हो जाता है।
क्या समस्या प्रश्नों की प्रकृति है, या प्रश्न उठाने वाले व्यक्तित्व की राजनीतिक प्रभावशीलता? यह प्रश्न केवल एक नेता या दल तक सीमित नहीं। यह लोकतांत्रिक संस्कृति के स्वभाव से जुड़ा हुआ प्रश्न है।
## संसद की भूमिका: बहस बनाम प्रबंधन
संसद का उद्देश्य सहमति का औपचारिक निर्माण भर नहीं, बल्कि असहमति का वैध सह-अस्तित्व भी है। यदि विपक्ष की आवाज़ बार-बार प्रक्रियात्मक टकरावों में उलझती दिखे, तो यह स्थिति लोकतांत्रिक परंपरा के लिए आत्ममंथन का विषय बनती है।
लोकतंत्र में संस्थाएँ तब अधिक विश्वसनीय प्रतीत होती हैं जब वे असहजता को समाहित करती हैं, न कि जब वे उसे नियंत्रित करने का आभास देती हैं।
## राजनीतिक जोखिम और प्रतीकात्मकता
इतिहास बताता है कि निष्कासन, निलंबन या दंडात्मक कार्रवाई कभी-कभी राजनीतिक विमर्श को सीमित नहीं, बल्कि विस्तारित कर देती हैं। लोकतंत्र में दमन का हर औज़ार एक नई प्रतीकात्मक ऊर्जा को जन्म दे सकता है। "राजनीति में शक्ति का प्रयोग जितना दृश्यमान होता है, उसके परिणाम उतने ही अप्रत्याशित होते हैं।"
# लोकतंत्र की असली कसौटी
लोकतंत्र की मजबूती का आकलन इस बात से नहीं किया जाता कि सत्ता कितनी प्रभावशाली है, बल्कि इस बात से कि विपक्ष कितनी निर्भीकता से सत्ता को चुनौती दे सकता है।
यदि सदन में उठाए गए प्रश्नों का उत्तर तर्क, नीति और तथ्य से दिया जाता है, तो लोकतांत्रिक विश्वास सुदृढ़ होता है। परंतु यदि उत्तर का स्वर प्रक्रियात्मक कार्रवाई की ओर झुकता प्रतीत हो, तो विमर्श का संतुलन स्वाभाविक रूप से प्रभावित होता है।
# असहमति का स्थान
यह विमर्श व्यक्तियों का नहीं, लोकतांत्रिक सिद्धांतों का है। सवाल यह नहीं कि कौन सही है या कौन ग़लत। सवाल यह है कि क्या संसद में असहमति का स्वर सहजता से स्थान पा रहा है? क्योंकि अंततः लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति सत्ता नहीं, बल्कि वह स्थान है जहाँ सत्ता से असहमति व्यक्त की जा सके।
